अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए शरीर से नहीं, जीवन से पहचान बनाएं
हमारे जीवन के दो पहलू हैं – एक हमारा शरीर और दूसरा हमारे भीतर का जीवन। एक शरीर के रूप में अपने पहचान बनाने से हमारी क्षमताएं कई सीमाओं में बंधी रहती हैं। लेकिन अगर हमारी पहचान जीवन के रूप में बन जाए तो हम क्षमता के एक अलग स्तर पर काम कर सकते हैं।
प्रसून जोशी: सदगुरु, देखने में आता है कि इस शरीर को बचाने की कोशिश में लोग बेवकूफी की हद तक चले जाते हैं। मिस्रवासियों ने ममी बना डाली। अपने यहां अमृत की बातें भी सुनने को मिलती हैं। मतलब यह कि किसी भी तरह से हो, हम इस शरीर को मरने नहीं देना चाहते, चाहे यह काम विज्ञान के जरिये करें, धर्म के जरिये करें या तंत्र-मंत्र से करें। मानव सभ्यता में इस शरीर को मरने से बचाने के लिए न जाने कौन-कौन से तरीके आजमाए गए हैं। इतना ही नहीं लोग ये भी चाहते हैं कि वे अपने पीछे अपना नाम, यश, वंश, रचनाएं, शिक्षा और सिद्धांत आदि छोड़ के जाएं, ताकि उन्हें याद रखा जाए। आखिर क्यों लोग अपने पीछे इतना कुछ छोडऩा चाहते हैं, मरने के बाद भी इनके सहारे जीना चाहते हैं?
हमारी शरीर के साथ बहुत गहरी पहचान है
सद्गुरु: आप हमेशा इस कोशिश में लगे रहते हैं कि कैसे अपने आपको ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित रखा जाए। आपके इर्द-गिर्द अगर चार-पांच लोग हैं, आपको अच्छा महसूस होता है। जरा देर के लिए अकेले बैठना पड़ जाए तो आपको दिक्कत होने लगती है। यह आपके मन का स्वभाव नहीं है, यह आपके शरीर का स्वभाव है जो लंबा समय गुजरने के बाद एक मानसिक प्रक्रिया में बदल चुका है। दरअसल यह खुद को बचाए रखने की प्रकृति ही है, क्योंकि शरीर को बचाना जरुरी है। अगर आप मनमाने ढंग से इस शरीर का इस्तेमाल करेंगे तो यह टूट जाएगा। एक भी बेवकूफी से भरा काम आपने किया तो यह टूट जाएगा।
तो इसी वजह से हम ये सब चीजें बनाने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन शरीर के साथ हमारा यह जरूरत से ज्यादा लगाव इसलिए है, क्योंकि हमने अपने शरीर के साथ ही अपनी पहचान स्थापित कर रखी है। एक बार अगर किसी चीज के साथ आपने अपनी पहचान स्थापित कर ली तो आपका मन हमेशा उसी चीज के इर्दगिर्द काम करता रहेगा क्योंकि मन की प्रकृति ही कुछ ऐसी है। कल को एक और व्यक्ति आपके जीवन में आ जाता है, अब आप एक दूसरे शरीर के साथ पहचान स्थापित कर लेते हैं।
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ऐसे में किसी दूसरे जीवन से जुड़ना मुश्किल होगा
शारीरिक संबंध इसीलिए होते हैं। जब मैं शारीरिक संबंध कहता हूं तो मेरा मतलब केवल आपके जीवनसाथी से नहीं है। मेरा मतलब जीवनसाथी के साथ ही सभी अन्य बायोलॉजिकल संबंधों से भी है, अर्थात आपके संबंध अपने माता पिता से हो सकते हैं, बच्चों से हो सकते हैं। वो सारे रिश्ते जिसे आप खून का रिश्ता कहते हैं, उनसे आपका संबंध एक तरह से शारीरिक संबंध ही है। ये संबंध बहुत मजबूत और उलझाने तथा फंसाने वाले इसलिए बन जाते हैं, क्योंकि ये संबंध बायोलॉजिकल होते हैं और जो सूचनाएं आपके शरीर के डी.एन.ए. में दर्ज हैं, वे कई और शरीरों में भी दर्ज हैं। अगर आप इन सबके साथ अपने अंतर में कहीं गहराई में, जरूरत से ज्यादा जुड़ाव पैदा कर लेंगे तो कहीं न कहीं आप केवल उन्हीं लोगों से, जिनसे आपके रक्त-संबंध हैं, जुड़ पाएंगे। किसी दूसरे जीवन पर आप उचित ध्यान नहीं दे पाएंगे। यह बहुत सारे लोगों का और हमारे देश का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। धृतराष्ट्र के समय से लेकर आज तक हम इस सिंड्रोम से पीडि़त हैं।
हमें इंसानी मशीन को समझना होगा
प्रसून जोशी: तो यह इच्छा....
सद्गुरु : यह केवल इच्छा नहीं है। देखिए, खुद को एक इंसान के रूप में देखने के बजाय एक ‘मेकेनिज्म’ यानी रचना-तंत्र के तौर पर देखिए। एक हार्डवेयर है, एक सॉफ्टवेयर है। सॉफ्टवेयर जो अंदर है, वह बस ऐसे ही अंदर नहीं है, यह लेन-देन भी कर रहा है। आमतौर पर हिंदी फिल्मों में जुड़वां बच्चों की जो कहानी दिखाई जाती है, लगभग उन सभी फिल्मों में वो अलग हो जाते हैं और बाद में उनका आमना-सामना होता है।
दो शरीर आपस में कैसे बातचीत कर सकते हैं, आज इस पर बहुत काम हो रहा है। अगर आप बायोलॉजी के स्तर पर संचार कर रहे हैं, तो इससे एक खास किस्म का बंधन बनता है। दूसरी तरफ जब हम बीज की बात कर रहे हैं, तो जो बीज इस सृष्टि के रचयिता ने हमारे भीतर रोपा है, जो बीज जीवन की प्रक्रिया है, अगर आप उस स्तर पर जाकर संचार स्थापित करते हैं, तो इसकी कोई सीमा नहीं है और यह ज्यादा स्पष्ट भी होगा। इसमें वायुमंडलीय प्रदूषण कम होगा। सबसे बड़ी बात यह कि यह सूचनाओं को उलझाने वाला नहीं होगा। यह आपकी चेतना की एक खास स्तर की स्पष्टता होगी। तो अगर कोई अपनी पहचान इस एकत्र किए गए शरीर के बजाय अपने भीतर मौजूद वृहद जीवन के साथ स्थापित करता है तो अचानक एक जबर्दस्त बदलाव होगा। हमारे साथ ऐसे काफी लोग हैं। मैं आपको ऐसे लोग दिखा सकता हूं।
जीवन के रूप में पहचान बनने पर बढ़ जाती हैं क्षमताएं
एक बार आश्रम में हमने एक बिजनेस इवेंट का आयोजन किया था। मुंबई के कुछ बड़े बिजनेस लीडर उसमें मौजूद थे। वे सब इस बारे में बात कर रहे थे कि कैसे वे आई.आई.टी. और आई.आई.एम. के क्रीम बच्चों को उठा लेते हैं। मैंने उनसे कहा – “आप लोग ऐसा कर रहे हैं, लेकिन मैं तो ऐसी किसी संस्था में जाकर लोगों को नहीं उठा सकता। मेरे पास तो बस जो भी आ जाए, मैं तो बस इंतजार करता रहता हूं। मेरे पास यह विकल्प नहीं है कि मैं यह कह सकूं कि यह सबसे होशियार लड़का है, मुझे यही चाहिए। मेरे यहां जो भी आ जाए, उसका स्वागत है। हो सकता है ये वही लोग हों, जिन्हें आपने छोड़ दिया हो।” आप देखेंगे कि एक खास समय के बाद हम उन लोगों को ही बेहद प्रभावशाली बना देंगे, जिन्हें सभी कंपनियों ने छोड़ दिया था। वे लोग उच्च स्तर की दक्षता के साथ हर स्तर पर काम करने के काबिल होंगे और वह भी पूरे आनंद के साथ। क्योंकि कुछ खास किस्म की प्रक्रियाओं और दीक्षाओं के जरिए उनके अंदर एक ऐसा बदलाव लाया जाता है, कि वे अपने शरीर के साथ पहचान स्थापित करना कुछ हद तक कम कर के, जीवन के दूसरे पहलुओं की ओर मुड़ जाते हैं। अचानक आप पाएंगे कि वे लोग थोड़े से समय के बाद ही जीनियस की तरह व्यवहार कर रहे हैं और बड़े महत्वपूर्ण कामों को भी आसानी से कर सकने योग्य हो चुके हैं।
एक मजेदार बात बताता हूं आपको। अमेरिका के कुछ डॉक्टरों का एक दल मेरे पिता से मिलने गया। मेरे पिता डॉक्टर हैं और उनका ऐसा मानना है कि अगर आप डॉक्टर नहीं बने तो आप बेकार हैं। आप जानते ही हैं, उस पीढ़ी के लोग कुछ ऐसा ही सोचते हैं। जब मैं दस साल का था, तभी मैंने उनसे साफ-साफ कह दिया था कि मैं डॉक्टर बिल्कुल नहीं बनूंगा, आप अपनी उम्मीदें न पालें। खैर, अटलांटा के डॉक्टरों का वह ग्रुप उनसे मिलने पहुंचा। उन्होंने पिताजी से पूछा - कृपया हमें सद्गुरु के बचपन के बारे में कुछ बताएं। नवासी साल के मेरे पिताजी बोले - वह बड़ा मंदबुद्धि और आलसी था, लेकिन इन दिनों बहुत बड़ा जीनियस हो गया है। तो सभी मंदबुद्धि और आलसी बच्चे मेरे पास आते हैं, लेकिन...।