गुरु सामान क्यों बेच रहे हैं?
17 फरवरी 2016 को एक सम्मेलन में निकुंज डालमिया ने सद्गुरु के साथ बातचीत की। निकुंज डालमिया ईटीनाउ के, जो इकोनॉमिक टाइम्स का एक हिस्सा है, चीफ एडिटर हैं। पेश है उस बातचीत के संपादित अंश की पहली कड़ी:

निकुंज डालमिया: जब मैं बीस साल की उम्र के आसपास रहा होऊंगा तो उस समय किसी गुरु की परिभाषा होती थी - एक ऐसा इंसान जिसकी दाढ़ी हो और जो योग और ध्यान सिखाता हो। आज नई परिभाषा है - एक ऐसा पुरुष, जिसकी दाढ़ी है, जो योग, ध्यान सिखाता है, साथ ही साबुन, शैंपू और पाउडर भी बेचता है।
सद्गुरु : अगर आपने दांत साफ नहीं किए हैं, तो मैं आपको एक ब्रश दूंगा। अगर आप नहीं जानते कि ध्यान कैसे लगाया जाए, तो मैं आपको ध्यान करना सिखाऊंगा। अगर आप नहीं जानते कि जीवन की बुनियादी चीजें कैसे की जाएं तो मैं आपको उसके बारे में बताऊंगा। मुझे इसमें कोई विरोधाभास(एक दूसरे का उलटा होना) नहीं दिखता।
बाबा रामदेव एक शानदार उदाहरण हैं
भारत में आर्थिक सफलता का मतलब यह नहीं है कि स्टॉक मार्केट में कोई जबरदस्त हाथ मारा जाए। आर्थिक सफलता का मतलब है कि देश के सवा सौ करोड़ लोग कम से कम सभ्य तरीके से रह सकें, क्योंकि हम लोग ऐसे हालात में रह रहे हैं, जहां लगभग साठ करोड़ लोग आज रात भूखे पेट सोने को विवश हैं। तो मुझे लगता है कि इस कोशिश में हर किसी की एक जिम्मेदारी है। मैं जानता हूं कि आप यहां किसका जिक्र कर रहे हैं - बाबा रामदेव, नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध(बाद के सालों में) में किराए की साइकिल पर घूमते थे, जिस पर वह किराए का एक बर्तन रखकर उसमें पचास किलो च्यवनप्राश भरकर घर-घर घूमकर बेचते थे। मेरी अभी उनसे तीन दिन पहले ही बात हुई थी। उन्होंने कहा, ‘सद्गुरु इस साल मेरी कंपनी का टर्नओवर पांच हजार करोड़ होने जा रहा है।’ मैंने कहा कि यह तो बड़ी अच्छी बात है। इस पर वह बोले, ‘आप मेरे यहां आइए और मेरी यूनिट जरूर देखिए।’ मैंने कहा कि बेशक मैं आऊंगा और देखूंगा।
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गुरु की यह छवि जो आज बहुत से लोगों के दिमाग में है, वह कैंलेंडर में दिखने वाले चित्रों की वजह है, जिसमें आपको सफेद दाढ़ी वाला एक इंसान दिखता है, जिसका चेहरा हमेशा गंभीरता से लटका हुआ रहता है। अगर आप इस देश के इतिहास पर नजर डालें तो आप देखेंगे कि गुरुओं ने हर तरह की चीजें की हैं। उन्होंने राजनीति की, उन्होंने व्यवसाय किया, उन्होंने युद्ध लड़े। उन्होंने यह सब इसलिए नहीं किया, क्योंकि वे ये सब करना चाहते थे, बल्कि इसलिए किया, क्योंकि वो उस समय की जरूरत थी। मुझे लगता है कि आज एक ऐसे सफल उद्यम का उदाहरण सामने रखना बहुत जरूरी है, जो निजी लाभ के लिए न हो। मुझे लगता है कि बाबा उसके एक शानदार उदाहरण हैं।
विश्व के बाजार में तेल की स्थिति
निकुंज डालमिया: हम आर्थिक बाजार के मुद्दे पर आते हैं। आज चीन में समस्या है और साथ ही आज कर्ज बाजार की भी अपनी एक समस्या है। आज तेल की कीमतें भी नीचे जा रही हैं। तो मेरा सवाल है कि ऐसे समय में जब सैकड़ों खरबों डॉलर की संपत्ति बर्बाद हो रही है, तो इंसान मानसिक रूप से कैसे इस स्थिति से निपटे।
सद्गुरु : संपत्ति कभी नष्ट नहीं होती, बशर्ते आप इस पर बमबारी न कर दें। आपके मन में संपत्ति की जो सोच है, वो ऊपर नीचे होती रहती है। जो लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, वो हो सकता है कि कुछ खास स्तर पर नुकसान, परेशानी या ऐसा ही कुछ महसूस करें। जहां तक कच्चे तेल के दाम नीचे जाने की बात है तो हम लोग लंबे समय से इसकी कीमतों को लेकर चिल्लाते रहे हैं। अगर इसकी कीमत नीचे जा रही है तो हमें इस पर हायतौबा नहीं मचानी चाहिए, हमें इसका जश्न मनाना चाहिए। मुझे लगता है कि ये अभी और नीचे जाएंगी। मैं जानता हूं कि लोग इसे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कई तरह के भू-राजनैतिक मुद्दे हैं, जहां कोई किसी पर विश्वास नहीं करता, इनके और नीचे जाने की संभावना है और मुझे लगता है कि वह भारत के लिए अच्छा होगा।
मैंने सुना है कि इस क्षेत्र के कुछ बड़े खिलाड़ी बाजार की कीमतों के उतार-चढ़ाव से निकलना चाहते हैं। वे तेल एक निश्चित कीमत पर बेचना चाहते हैं। मान लीजिए कि ईरान भारत के लिए कीमत तय करता है और कहता है कि भारत के लिए तेल की कीमत तीस डॉलर प्रति बैरल रहेगी, भले ही बाजार में इसकी कीमत कुछ भी हो। चाहे वो कीमत ऊपर जाए, या नीचे जाए – आप उतने ही पैसे दीजिए। कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। खासकर ईरान ऐसा करने जा रहा है, क्योंकि वह लंबे समय से बाजार से बाहर है और वह देख रहा है कि तेल के बाजार में उसके प्रतिद्वंदी का दबदबा बढ़ता जा रहा है। प्रतिद्वंदी भी ऐसा जो सिर्फ आर्थिक प्रतिद्वंदी नहीं है, एक देश के तौर पर वे लोग वास्तव में धर्म के आधार पर बंटे हुए हैं। इसलिए वे उस बाजार में अपना योगदान नहीं देना चाहते, जहां किसी और का दबदबा हो और वही उसके फायदे उठा ले जाए।
तो खासी उम्मीद है कि आने वाले सालों में कुछ ऐसा होगा जो बहुत से लोगों के लिए एक सरप्राइज होगा, जो एक स्थिरता लेकर आएगा, खासकर विकासशील देशों के लिए। क्योंकि तब हमें पता रहेगा कि अगले एक साल, दो साल या तीन सालों में हम किस कीमत पर तेल खरीदने जा रहे हैं।