ऋचा: सद्‌गुरु, ध्यानलिंग स्थापित करने के विज्ञान के बारे में क्या कभी कुछ लिखा गया है?

सद्‌गुरु: दरअसल कहीं भी नहीं, सिवाय इसके कि ऋग्वेद में सिर्फ एक लाइन में इसका जिक्र हुआ है कि ध्यानलिंग सिर्फ एक गृहस्थ योगी द्वारा ही सफलतापूर्वक स्थापित किया जाएगा। कई योगियों ने इसके लिए कोशिश की, लेकिन यह सफल नहीं हुआ।

ऋचा: एक ध्यानलिंग बनाने के विज्ञान के बारे में यह सब जो ज्ञान आपके पास है, क्या ऐसा सिर्फ इसलिए है, क्योंकि आपके गुरु ने अपने दंड से आपके माथे को छुआ था?

सद्‌गुरु - हां, यह सब उस दंड से आया है। वे लोग जो ध्यानलिंग प्रतिष्ठा में शामिल थे और ध्यानलिंग की प्रतिष्ठा प्रक्रिया को अपनी आँखों से देखा, वे यह साफ तौर पर देख पाए कि इसमें बहुत सारी जटिल प्रक्रियाएं शामिल थीं, और मैं कोई ऐसा इंसान नहीं हूं, जिसे आध्यात्मिक शिक्षा मिली हो। मैं कुछ पढऩे के लिए कभी किसी के पास नहीं गया, लेकिन जिन लोगों ने मुझे उस वक्त देखा, वे यह साफ तौर पर जान गए कि मैं जो कर रहा था, उस बारे में मैं बिल्कुल स्पष्ट था, पूरी तरह से स्पष्ट। उस तरह की स्पष्टता नहीं जो विचारों से आती है, बल्कि वैसी स्पष्टता जो आंतरिक ज्ञान से पैदा होती है। जीवन के किसी भी आयाम के बारे में, जब भी जानने की जरूरत पड़ी, जवाब हमेशा मेरे भीतर होते थे। मेरे लिए जीवन हमेशा ऐसा ही रहा है।

ऋचा: सद्‌गुरु, जब कोई मंदिर बनाया जाता है, तो उसके आसपास एक गुह्य-मंदिर भी बनाया जाता है, ऐसा क्यों...?

सद्‌गुरु: गुह्य-मंदिर इसलिए बनाए जाते हैं, ताकि कोई मुख्य मंदिर की ऊर्जा का दुरुपयोग न कर सके। यही वजह है कि जब लोगों ने बहुत शक्तिशाली मंदिरों का निर्माण किया, उन्होंने उसकी बाहरी परकोटे पर एक गुह्य-मंदिर भी बनाया, ताकि जो लोग इस विद्या का अभ्यास करना चाहें, वे उसका इस्तेमाल कर सकते हैं। वे ऐसे काम के लिए मुख्य मंदिर का इस्तेमाल नहीं होने देना चाहते थे। गुह्य-मंदिर को प्रतिष्ठित करना एक पूरी तरह से अलग प्रकृति का काम है। वे लोग जो इस विद्या में माहिर हैं, वे इसे बहुत आसानी से कर सकते हैं, लेकिन ध्यानलिंग की स्थापना करना उनकी पहुंच के बाहर है। हमारा मकसद यह पक्का करना है कि ध्यानलिंग को कभी भी नकारात्मक मकसद के लिए इस्तेमाल न किया जाए, लेकिन साथ ही, हम गुह्य-विद्या को वंचित भी नहीं करना चाहते ताकि उसकी संभावना भी खुली रहे।

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