कैसे पैदा करें ओजस

ओजस
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सद्‌गुरुपिछले हफ्ते सद्‌गुरु ने बताया था कि अगर आप अपने चारों ओर खूब ओजस पैदा कर लें तो आपका जीवन सहज हो जाता है। इस हफ्ते सद्‌गुरु बता रहे हैं कि हम ओजस पैदा कैसे करते हैं और हम ओजस को खो कैसे देते हैं।

सद्‌गुरु: आम तौर पर हमारा खाया हुआ अधिकतर भोजन भौतिक शरीर में रूपांतरित हो जाता है। इसका एक छोटा-सा हिस्सा ही ओजस का रूप ले पाता है। क्रिया के द्वारा हम इस अनुपात को बदलने की कोशिश करते हैं – हम चाहते हैं कि आपके भोजन का एक बड़ा हिस्सा ओजस में रूपांतरित हो जाये। एक साधक बड़े पैमाने पर ओजस का निर्माण करता है। क्रिया योग का लक्ष्य यही है कि इस शरीर रूपी कारखाने मे बदलाव लाया जा सके। ऐसा किया जा सके कि यह कारखाना जिस भोजन को मानव देह और मल में रूपांतरित करता है, उसी भोजन को यह एक अत्यंत सूक्ष्म उर्जा में रूपांतरित करने लगे ताकि आप चैतन्य को पाने योग्य बन सकें।

जब किसी व्यक्ति का ओजस-प्रभामंडल बहुत विशाल होता है तो स्वर्गिक और दिव्य मानी जाने वाली हर वस्तु मानो उसके लिए आम हो जाती है। ऐसी वस्तुओं को आप आसानी से महसूस कर सकते हैं क्योंकि आपकी ऊर्जा बहुत सूक्ष्म रूप ले लेती है। ओजस की गुणवत्ता, उसकी तीव्रता और उसकी मात्रा ही एक व्यक्ति को दूसरे से अलग करती है। किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति इतनी सशक्त और रूपांतरणकारी और किसी दूसरे की इतनी कमजोर इसलिए महसूस होती है क्योंकि उनके ओजस में अंतर होता है।

क्यों कम होता है ओजस?

बड़ी निराशा की बात है कि अभी लोग ऊर्जा और ओजस के ऊंचे स्तरों तक नहीं पहुंच पा रहे क्योंकि उनमें आवश्यक संतुलन, तैयारी और अनुशासन की कमी है या वे अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि जीवन के किस आयाम को कितनी प्राथमिकता दी जाये। बहुत-से लोग ऐसे हैं जो अपने अनुभव के स्त र पर काफी खुले हुए हैं और ऊर्जा की ऊंची संभावनाओं तक पहुंचने में निश्चित रूप से सक्षम हैं, लेकिन आधुनिक जीवन-शैली ने लोगों को बहुत अधीर बना दिया है। लोग कहीं पर टिक नहीं पा रहे हैं- नौकरी हो या शिक्षा, रिश्तें हो या उनकी प्राथमिकताएं वे इधर-उधर भटकते रहते हैं। इस भटकाव में व्यक्ति की ऊर्जा भी अस्थिर हो जाती है। 

 आप जो ध्यान करते हैं वह केवल आपके लिए नहीं होता। यदि पच्चीस लोग सचमुच में ध्यानमग्न हो जाएं तो पूरे शहर में शांति फैल जाएगी, बिना यह जाने की कारण क्या है।

ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिनका उपयोग आप अपने ओजस के विकास को रोकने या नष्ट करने के लिए कर सकते हैं। गलत रवैया, नकरात्मक विचार, बुरी भावनाओं और नाना प्रकार के मानसिक क्रियाकलापों से ऐसा हो सकता है। कुछ खास तरह के शारीरिक कार्य, अत्यधिक कामुकता, अत्यधिक खान-पान, बेहद उत्तेजक पदार्थों के सेवन और दूषित वातावरण में रहने से भी ऐसा हो सकता है। क्रियाओं और अभ्यास के माध्यम से आप अपनी ऊर्जा-टंकी भर तो लेते हैं लेकिन धीरे-धीरे उसको रिसाते जाते हैं। इसीलिए इतना समय लगता है। यदि आप अपनी टंकी के इन छेदों को बंद करना जानते हों तो अचानक आप पायेंगे कि आपने अपने चारों ओर ऊर्जा का विशाल संचय कर लिया है।

ओजस बढ़ाना ही लक्ष्य है

आध्यात्मिकता का अर्थ है ऐसी क्रियाओं में लगना जो आपके ओजस को बढ़ाए और आपके जीवन की बुनियादी चीजों मे बदलाव लाए। और इस तरह से आप अपने भीतर अनुभूति और आनंद की एक ऐसी उँचाई पा सकें जहाँ न केवल आपको बल्कि आपके आसपास सभी को परमानंद का अनुभव हो। आप जो ध्यान करते हैं वह केवल आपके लिए नहीं होता। यदि पच्चीस लोग सचमुच में ध्यानमग्न हो जाएं तो पूरे शहर में शांति फैल जाएगी, बिना यह जाने की कारण क्या है। उनके साथ जो हो रहा है उसे बिना जाने ही वे स्थिरता का अनुभव करने लगेंगे। आप जितना गहरा ध्यान लगायेंगे उतना ही आप सबके कल्याण का साधन बन पायेंगे।

अच्छे विचार बोल देने भर से सच्ची शांति नहीं आती और लोगो का भला नहीं होता। जब लोगों के चारों ओर एक खास तरह की ऊर्जा का मंडल होगा, जब उनका ओजस इतना विशाल होगा कि सैकड़ो लोग उनकी परछाईं में बैठ कर उसका अनुभव कर सकें तभी वास्तव में परम कल्याण होगा।


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