चाँद और सूरज गढ़ते हैं हमारा जीवन – ईशा लहर अप्रैल 2016

इस माह के ईशा लहर अंक में हम चाँद के अध्यात्मिक महत्व के बारे में चर्चा कर रहे हैं। पूर्णिमा, अमावस्या और इनके बीच ई सभी कलाओं का फायदा हम अपने आध्यात्मिक उत्थान के लिए कैसे उठा सकते हैं, जानें इस अंक में…

चाँद सदियों से कवियों, शायरों, गीतकारों, चित्रकारों, प्रेमियों, यहां तक कि आध्यात्मिकता की राह के राहगीरों को भी प्रेरणा देता रहा है। यूं तो उसकी रोशनी भी अपनी नहीं है, लेकिन देने के मामले में उसने कभी कृपणता नहीं दिखाई। चांद न केवल प्रेरणा देता रहा है, बल्कि सदा से यह कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र भी रहा है। इस धरती पर शायद ही कोई ऐसी संस्कृति होगी, कला की शायद ही कोई ऐसी विधा होगी, सभ्यता का शायद ही ऐसा कोई प्रतिमान होगा, जहां चांद की झलक न मिले। मिले भी क्यों नहीं, जब रात के वक्त सूर्य अपनी समस्त किरणों को समेट आसमान खाली कर चुका होता है, चांद ही होता है जो पूरी प्रकृति में न केवल सबसे आकर्षक होता है, बल्कि अपनी उपस्थिति से पूरी प्रकृति को खूबसूरत और मनमोहक बना देता है।

कल्पना कीजिए उस दौर की जब इस पृथ्वी पर बिजली नहीं थी, किसी भी इंसान के लिए तब क्या संभव हो पाता आसमान की इस सबसे खूबसूरत हस्ती को अनदेखा कर पाना? और जिसे अनदेखा नहीं  किया जा सकता, उसे जानना बेहद जरुरी हो जाता है। इसी वजह से इस आकाशीय पिंड ने हमेशा से इंसानी दिमाग में कौतूहल जगाया है। और इसी कौतूहल ने इंसान को चांद तक पहुंचा भी दिया। चंद्रमा की खूबसूरती और उसका प्रभाव इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वह हर दिन एक सा नहीं होता। उसका हर रूप जिसे उसकी कला कहते हैं, अलग-अलग प्रभाव डालता है – यह प्रभाव भौतिक और अभौतिक दोनों सृष्टि पर अलग तरह का होता है। भौतिक सृष्टि पर इसके प्रभाव का अध्ययन वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों के अध्ययन का क्षेत्र रहा है, तो अभौतिक सृष्टि पर इसके प्रभाव को समझने की कोशिश दार्शनिकों, दिव्यदर्शियों और पराविद्या में रुचि रखने वालों ने की।

न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सार्वभौमिक नियम का प्रतिपादन तो बहुत बाद में किया, जबकि हमारी संस्कृति में इंसान के ऊपर भौतिक पिंडों के प्रभाव का अध्ययन बहुत पहले शुरु हो चुका था। ज्योतिषियों और खगोलविदों ने न केवल खगोलीय पिंडों का जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का पता लगाया, बल्कि यह भी बताया कि कैसे उन प्रभावों को कम या अधिक किया जा सकता है। योग में इसके लाभदायक प्रभावों को समझते हुए उन्हें बढ़ाने और उनसे लाभ उठाने की कोशिश भी की जाती रही है। इसकी वजह से आध्यात्मिकता और चंद्रमा का आपस में गहरा संबंध रहा है। चंद्रमा अपनी पूर्ण अनुपस्थिति यानी अमावस्या से लेकर अपनी पूर्ण उपस्थिति यानी पूर्णिमा तक की यात्रा में कैसे एक साधक को प्रभावित करता है और कैसे उसे लााभ पहुंचा सकता है, इसे बहुत ही स्पष्ट और सुंदर तरीके से सद्‌गुरु ने समय-समय पर समझाया है।

चांद की सभी कलाओं को एक रात में निहार लेना जिस तरह संभव नहीं, उसी तरह चांद से जुड़े सभी पहलुओं को एक अंक में समेटना तो संभव नहीं था, लेकिन कुछ रोचक व लाभदायक बातों को सहेजने और आप तक पहुंचाने की कोशिश की है हमने इस बार। इस कामना के साथ कि आप अपने मन के आकाश में धवल चांदनी का उजास भर आध्यात्मिकता की नई ऊंचाइयां हासिल करें, मैं हरिवंश राय बच्चन की  कुछ पंक्तियां आपके साथ साझा करती हूं, जो मुझे हमेशा स्फूर्ति और प्रेरणा से भर देती हैं:

कुछ अंधेरा, कुछ उजाला, क्या समा है!

कुछ करो, इस चांदनी में सब क्षमा है

किंतु बैठा मैं संजोए आह मन में

चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।

– डॉ सरस

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