प्राण प्रतिष्ठा – पत्थर को भगवान बनाने का विज्ञान

ईशा लहर का दिसम्बर माह का अंक प्राण प्रतिष्ठा पर आधारित था। इस ब्लॉग में प्रस्तुत है दिसम्बर अंक की कुछ झलकें – चित्रों और सम्पादकीय स्तंभ के माध्यम से:

ईशा लहर सम्पादकीय स्तंभ

किसी भी व्यक्ति के विकास में एक अनुकूल वातावरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वातावरण कुछ ऐसा हो जहां तन को आराम, मन को चैन, दिल को सुकून और आत्मा को तृप्ति मिले। आधुनिक मानव ने भौतिक जगत में खूब तरक्की की है और अपने लिए इतनी सुख-सुविधाएं जुटाएं हैं, जितनी कि उसने पहले कभी कल्पना भी नहीं की थी। इससे इंसान को शारीरिक स्तर पर आराम तो मिला है, पर उसके दूसरे आयाम आज भी अतृप्त हैं, शायद पहले से कहीं अधिक अतृप्त।

अनुकूल वातावरण पैदा करने का एक अहम पहलू है, उस स्थान की गुणवत्ता, जहां हम रहते हैं या अपना समय गुजारते हैं। अगर किसी भवन की गुणवत्ता की बात करें तो आमतौर पर यह समझा जाता है कि इसकी गुणवत्ता तय होती है उसके शिल्प-कौशल और उसकी वास्तुकला से। शिल्प-कौशल भवन को खूबसूरत बनाने का कार्य करता है, जबकि वास्तुकला में भवन की ज्यामिति व दिशा पर जोर दिया जाता है। एक समय था जब वास्तुकला में खास तौर पर यह देखा जाता था कि पृथ्वी की विद्युत-चुम्बकीय शक्ति से मानवीय तंत्र को कैसे लाभ पहुंचाया जाए।

शिल्पविद्या और वास्तुकला के माध्यम से ऐसी खूबसूरत जगह तो बनाई जा सकती है, जो शरीर को आराम दे मन को भाये और दिल को सूकून दे, पर वह जगह आत्मा को तृप्त नहीं कर सकती। अगर इंसान को गहन अनुभव करवाना है, उसकी अंतरात्मा को छूना है, उसे पूर्णता का एहसास करवाना है तो स्थान की प्रतिष्ठा करनी होगी।

प्रतिष्ठित स्थान में बैठने मात्र से ऊर्जा प्रवाह शुरू हो जाता है

प्रतिष्ठा व प्राण-प्रतिष्ठा को अक्सर एक अंधविश्वास मान लिया जाता है। जबकि किसी स्थान को प्रतिष्ठित करना एक विज्ञान है, जिसके द्वारा उस स्थान की ऊर्जा को सूक्ष्म व तीव्र बनाया जाता है। जब हम किसी स्थान की प्रतिष्ठा करते हैं तो वहां की ऊर्जा कंपन से भरपूर व तीव्र हो जाती है। उस स्थान में बैठने मात्र से ही हमारी प्रणाली में ऊर्जा का ऊपर की ओर प्रवाह होने लगता है, शरीर में ऊर्जा का गमन निम्नतर चक्रों से उच्चतर चक्रों की ओर खुद ब खुद होने लगता है। आध्यात्मिक साधनाओं का मकसद भी यही है – ऊर्जा को निम्नतर चक्रों से उच्चतर चक्रों की तरफ ले जाना। इसलिए साधना में ऐसे प्रतिष्ठित स्थान बेहद सहायक होते हैं और साधकों के लिए वरदान साबित होते हैं।

केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, काशी और ज्योतिर्लिंग जैसे स्थानों की प्रतिष्ठा की गई है, इसलिए इन्हें तीर्थस्थल और धाम के रूप में जाना जाता है। ईशा योग में प्रतिष्ठित ध्यानलिंग का सानिध्य पाने के लिए विश्व के कोने-कोने से हर धर्म के लोग आते हैं। सद्‌गुरु कहते हैं अगर कोई मुझसे पूछे कि मेरा सपना क्या है तो मैं यही कहूंगा – ‘मैं इस पूरी धरती को प्रतिष्ठित करना चाहता हूं।’

प्राण-प्रतिष्ठा के इस विज्ञान को और विस्तार से आप तक पहुंचाने की कोशिश की है हमने इस बार। इस विज्ञान के तमाम पहलुओं के साथ इस अंक में आपको मिलेगा और भी कुछ नया। अपने नियमित स्तंभों में थोड़ा परिवर्तन करते हुए इस दिसंबर अंक के साथ हम तीन नये स्तंभ आपके लिए लेकर आ रहे हैं। ‘आधी रात सद्‌गुरु के साथ’- अंग्रेजी पुस्तक ‘मिड्नाइट विद द मिस्टिक’ का अनुवाद है, जिसे मशहूर अमेरिकी लेखिका शेरिल सिमोन ने लिखा है। इस रोचक पुस्तक के अंश को हम धारावाहिक के रूप में प्रकाशित करेंगे।

दूसरा स्तंभ है: ‘फेसबुक से’। सद्गुरु से फेसबुक पर लाखों लोग जुड़े हुए हैं और हर रोज उनकी कृपा व ज्ञान से अभिभूत होकर कई लोग आभार स्वरूप अपना अनुभव शब्दों में व्यक्त करते हैं। ऐसे ही कुछ बेबाक अनुभवों को आपसे साझा करने की कोशिश रहेगी इस स्तंभ में। तीसरा स्तंभ है ‘योगाभ्यास’ जिसमें हम योग के अभ्यास की कई बारीकियों को उजागर करेंगे। आशा है हमारी इन कोशिशों को भी पहले की ही तरह आपका स्नेह और सहयोग मिलता रहेगा। अपनी बेबाक राय और सहज प्रतिक्रियाओं से हमारा मार्गदर्शन करते रहें। हमें इंतजार है . . .

डॉ सरस


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