मध्यकालीन भारत में योग

मध्यकालीन भारत में योग
मध्यकालीन भारत में योग

Sadhguruपिछले ब्लॉग में आपने पढ़ा प्राचीन काल के योगियों के बारे में। प्राचीन भारत में पतंजलि काल को योग का ‘क्लासिकल पीरियड’ माना जाता है। पतंजलि के कुछ सदियों बाद (800-1800 ईसवी), योग के विकास ने एक दिलचस्प मोड़ लिया। इस काल में बहुत से गुरु सामने आए जिन्होंने सामाजिक जरूरतों से खुद को ज्यादा से ज्यादा जोडऩा शुरू कर दिया। योग धीरे-धीरे सामूहिक आंदोलनों में परिणत हो गया।

अब कुछ महान विशेषज्ञ शरीर की गुप्त क्षमताओं की खोज में लग गए। योगियों की पिछली पीढिय़ों ने शरीर पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था। इस काल को योग के इतिहास में धीरे-धीरे घटते महत्व का काल माना जा सकता है, क्योंकि योग के महान आध्यात्मिक लक्ष्य अब ज्यादा से ज्यादा साधारण और सांसारिक होने लगे।

मत्स्येंद्रनाथ लगभग छह सौ सालों तक अपने भौतिक शरीर में रहे और लोग उन्हें खुद शिव से कम नहीं समझते थे। उन्होंने कनफटा योगियों की परंपरा स्थापित की।
यहां तक कि गूढ़ और गोपनीय ज्ञान को भी लिखा गया और बिना किसी विवेक के बांटा गया। शारीरिक हठ योग अभ्यासों की लोकप्रियता बढऩे लगी। इसने तंत्र योग की कई शाखाओं और विचारधाराओं को भी जन्म दिया, जिसकी एक पद्धति हठ योग है। एक मजबूत, लचीला और टिकाऊ शरीर विकसित करना योग का एक प्रमुख लक्ष्य बन गया।

 

रसविद्या के प्रभाव में आकर योग गुरुओं की नई जमात ने अभ्यासों की एक पद्धति शुरू की जिसका लक्ष्य शरीर को फिर से युवा करना और उसका जीवन-काल बढ़ाना था।

 

इस काल के प्रमुख योगी और संत थे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, गोरखनाथ (नाथ पंथ), ब्रह्मेंद्र सरस्वती आदि।

 

  • आदि शंकराचार्य (8वीं सदी):

शंकर आज के केरल राज्य में जन्मे थे। वह बचपन से ही प्रतिभाशाली और असाधारण विद्वान थे। उनमें लगभग अलौकिक क्षमताएं थीं। दो वर्ष की उम्र से ही वह धाराप्रवाह संस्कृत बोल और लिख सकते थे। चार साल की उम्र में, उन्हें वेद कंठस्थ थे और बारह साल की उम्र में उन्होंने संन्यास लेकर अपना घर छोड़ दिया था। इतनी कम उम्र में भी उनके शिष्य बन गए थे और उन्होंने आध्यात्मिक विज्ञान को फिर से स्थापित करने के लिए देश भर में भ्रमण किया।

संस्कृत में उनकी कृतियां अद्वैत वाद की स्थापना करती हैं। उन्होंने ब्रह्म-सूत्र, प्रमुख उपनिषदों और भगवद गीता पर बहुत सी टीकाएं लिखीं। उन्होंने योग तारावली की रचना की, जिसमें हठ योग के बारे में बताया गया है, और सौंदर्य लहरी की रचना की जिसमें कुंडलिनी योग को समझाया गया है। उन्होंने पतंजलि योग सूत्रों पर भी टीकाएं लिखी हैं।

  • रामानुजाचार्य (11वीं सदी):

उन्होंने तंत्र-सार नामक किताब लिखी, जिसमें कुंडलिनी योग के बारे में बताया गया है। उन्होंने विशिष्ट अद्वैत दर्शन प्रस्तुत किया।

  • हठ योग काल:

हठ योग की अवधि 9वीं सदी से 18वीं सदी तक मानी जाती है। इसका विकास 14वीं सदी के दौरान अपने चरम पर था। हठ योग के संस्थापक आदिनाथ थे। विभिन्न हठ योगी और योग पर उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें निम्नलिखित हैं:

 

1.      मत्स्येंद्रनाथ (9वीं सदी) – काल ज्ञान निर्णय

2.     गोरखनाथ (9वीं सदी) – गोरक्षा शतक

3.    चौरंगीनाथ (11वीं सदी) – चौरंगी शतक

4.     स्वात्माराम (14वीं सदी) – हठ प्रदीपिका

5.     घेरांद (15वीं सदी) – घेरांद संहिता

6.     श्रीनिवास भट्ट (17वीं सदी) – हठ रत्नावली

  • गोरखनाथ:

नाथ परंपरा सबसे महान योग परंपराओं में से एक रही है। भारतीय योगिक संस्कृति के इतिहास में गोरखनाथ एक महत्वपूर्ण योगी थे जो कई तरह से खास थे। वह बहुत ही सिद्ध योगी थे जो लगभग एक हजार साल पहले हुए थे। उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे। मत्स्येंद्रनाथ लगभग छह सौ सालों तक अपने भौतिक शरीर में रहे और लोग उन्हें खुद शिव से कम नहीं समझते थे। उन्होंने कनफटा योगियों की परंपरा स्थापित की। कनफटा योगियों की विशेषता होती है उनके कानों में बड़े-बड़े कुंडल, जो सौर और चंद्र ऊर्जाओं के प्रतीक होते हैं। नाथ योगियों की एक और खास विशेषता होती है- नाड़ी जो एक तरह की रस्मी सीटी होती है जिसे योगी एक काले ऊनी जनेऊ पर धारण करते हैं। यह प्रतीक नाद-अनुसंधान अभ्यास से संबंधित है जिसका उद्देश्य ध्वनि तरंगों के साथ काम करना है। जनेऊ की डोरी इड़ा और पिंगला नाडिय़ों से संबंधित होती है। योग और तंत्र कुछ प्रबंधों को पारंपरिक रूप से महायोगी गोरक्षनाथ और उनके अनुयायियों की देन माना जाता है।

  • सदाशिव ब्रह्मेंद्र सरस्वती :

सदाशिव ब्रह्मेंद्र एक निर्काया योगी थे, यानी उन्हें अपने शरीर का कोई होश नहीं रहता। जब उन्हें शरीर का कोई होश ही नहीं था, तो उनके जीवन में कपड़े और बाकी चीजें पहनने का सवाल ही नहीं उठता था। तो वह नंगा रहते थे। वह जैसे थे, उसी तरह विचरण करते थे। एक दिन वह चलते-चलते राजा के उद्यान में पहुंच गए। राजा वहां नदी के तट पर अपनी रानियों के साथ विश्राम कर रहा था। सदाशिव बिना कपड़ों के इन महिलाओं के सामने चले गए। राजा बहुत क्रोधित हो गया। यह कौन मूर्ख है, जो मेरी रानियों के सामने इस तरह चला आ रहा है? उसने अपने सैनिकों से कहा, ‘पता करो कि यह मूर्ख कौन है!’ सैनिकों ने उसे पुकारा। वह पीछे नहीं मुड़े, चलते रहे। सैनिक क्रोधित हो गए। वे उनके पीछे दौड़े और एक तलवार से उन पर वार किया। उनका दायां हाथ अलग होकर नीचे गिर पड़ा। वह फि र भी चलते रहे।

उनका हाथ नीचे गिर पड़ा, फिर भी उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा, बस चलते रहे। अब सब लोग आतंकित हो गए। उन्हें समझ आ गया कि यह कोई आम इंसान नहीं है।  उसके हाथ काट देने पर भी वह चलता रहता है। फि र वे उनके पीछे दौड़े, राजा और हर कोई उनके पैरों पर गिर पड़ा। वे उन्हें वापस लाए और उस बगीचे में उन्हें सम्मान के साथ बिठाया। आज भी आप नेरूर में उनकी समाधि देख सकते हैं, जो बहुत ही शक्तिशाली जगह है।

  • भक्ति योग काल :

12वीं सदी से 16वीं सदी के दौरान भक्ति योग लोकप्रिय था। भक्ति पर प्रसिद्ध ग्रंथ नारद भक्ति सूत्र उस समय लोकप्रिय था। सूरदास, तुलसीदास, पुरंदर दास, कनक दास, विट्ठल दास, मीराबाई कुछ प्रसिद्ध भक्ति योगी थे। उन्होंने भक्ति के गीत लिखते और गाते हुए भक्ति योग को लोकप्रिय बनाया। दक्षिण भारत के नयनार, अल्लामा महाप्रभु, बासवन्ना और अक्का महादेवी का नाम भक्ति आंदोलन के महान संतों में लिया जाता है।

अगले ब्लॉग में पढ़ें आधुनिक काल के योगियों के बारे में…


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