क्या मृत्यु में मदद करने के लिए प्रशिक्षण पाना संभव है?

क्या मृत्यु में मदद करने के लिए प्रशिक्षण पाना संभव है?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु से एक साधक ने प्रश्न पूछा कि अगर वे मृत्यु के समय मदद के लिए लोगों को प्रशिक्षित कर सकें तो इससे लोगों को बहुत लाभ मिलेगा – क्योंकि आज की पीढ़ी में ये ज्ञान लुप्त हो चुका है। सद्‌गुरु बता रहे हैं कि मृत्यु की परिस्थिति को संभालने के लिए किन सावधानियों के जरूरत है।

प्रश्न : सद्‌गुरु, मौत के वक्त लोगों की मदद करने के लिए अगर आप हमें प्रशिक्षित कर सकें तो यह मानवता की बड़ी सेवा होगी। मैं अपने माता-पिता वाली पीढ़ी के बारे में तो कह सकता हूं कि उनमें से ज्यादातर लोगों के पास विकृत जानकारी ही है। हम लोगों को प्रोफेशनल सलाह दे सकते हैं।

सद्‌गुरु : इस तरह की और भी कई चीजें हैं जिनके बारे में बात की जा सकती है। सिर्फ जन्म और मृत्यु ही क्यों? सबसे बढक़र जीवन है, इस जीवन को बेहतर बनाने के लिए भी बात की जानी चाहिए।

स्थिति 1 – ये न्यूक्लियर रिएक्टर में जाने जैसा है

मुझे डर इस बात का है कि कहीं हम प्रोफेशनल देवता बनाने न शुरू कर दें। क्या आप जानते हैं प्रोफेशनल देवताओं के बारे में? इन दिनों देवता भी व्यवसायिक हो गए हैं। लोग दूसरों को ठीक करना चाहते हैं, लेकिन फीस लेकर।

आप इसे दूसरी तरह से भी देख सकते हैं। अगर आप ऑपरेशन थिएटर में जाना चाहते हैं तो आपको एक खास तरह की शुद्धता के साथ जाना पड़ता है। आप इसे सफाई कह सकते हैं, मैं इसे शुद्धता कह रहा हूं।
लोग बहुत सारे काम करना चाहते हैं, लेकिन फीस लेकर। अगर मैं आपके लिए भोजन और घर की व्यवस्था कर दूं तो क्या आप पैसे के बारे में सोचे बिना जीवन भर लोगों की मदद कर सकते हैं? अगर ऐसा है तो मौत जैसे पहलुओं पर काम करना सार्थक है। अगर आप हमेशा पैसे के बारे में सोचते हैं तो आपको उस दिशा में नहीं जाना चाहिए। आप बस काम कीजिए और पैसे कमाइए, जिंदगी गुजारिए, खाइए, बच्चे पैदा कीजिए और मर जाइए। आपके लिए यही सही होगा, क्योंकि आप यह सब बिना जरूरी सुरक्षा के कर सकते हैं। यह कुछ ऐसा ही होगा कि आप किसी न्यूक्लियर रियक्टर में बिना जरुरी सुरक्षा के घुस जाएं, दिखेगा कुछ भी नहीं, सब कुछ सामान्य लगेगा, आप जाएंगे और वापस आ जाएंगे, लेकिन निश्चित रूप से आप बीमार पड़ जाएंगे। वहां जो भी लोग जाते हैं वे एक खास सुरक्षा के साथ जाते हैं। आप इसे दूसरी तरह से भी देख सकते हैं। अगर आप ऑपरेशन थिएटर में जाना चाहते हैं तो आपको एक खास तरह की शुद्धता के साथ जाना पड़ता है। आप इसे सफाई कह सकते हैं, मैं इसे शुद्धता कह रहा हूं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जिस मरीज का पेट या दिल आप खोल रहे हैं, वह जिंदा नहीं बचने वाला।

स्थिति 2 – सर्जरी शुरू करने से पहले सफाई जरुरी है

भारत में शल्य चिकित्सा यानी सर्जरी बहुत पहले से होती रही है। सुश्रुत ने पांच हजार साल पहले सर्जरी की थी। कोई बेहोशी की दवा या इंजेक्शन नहीं, कोई ऑपरेशन थिएटर नहीं, एक पेड़ के नीचे ही उन्होंने सर्जरी की और वह भी पूरी तरह कामयाब।

आप इसे दूसरी तरह से भी देख सकते हैं। अगर आप ऑपरेशन थिएटर में जाना चाहते हैं तो आपको एक खास तरह की शुद्धता के साथ जाना पड़ता है। आप इसे सफाई कह सकते हैं, मैं इसे शुद्धता कह रहा हूं।
जाहिर है वह कोई पहले शख्स नहीं थे। हां, वह काफी मशहूर सर्जन थे। उनसे पहले भी लोग सैकड़ों सालों से इस तरह का काम करते होंगे और इसी वजह से वह इतने बड़े विशेषज्ञ बन पाए। सुश्रुत जब सर्जरी करते थे, तो पेड़ के नीचे गौ मूत्र छिडक़ देते थे, जो वहां एंटीसेप्टिक का काम करता था। शायद आपको पता होगा कि गाय के मूत्र में पेनिसिलिन होता है, इसीलिए वह उसे आसपास छिडक़ने के बाद ही सर्जरी किया करते थे। उन्हें काफी कामयाब सर्जन माना जाता था, क्योंकि उन्होंने कई चमत्कारिक सर्जरी को अंजाम दिया। फिर भी उनकी सफलता दर दस, बीस या हद से हद पच्चीस फीसदी रही होगी। आज बुरे से बुरे सर्जन की सफलता की दर भी नब्बे से पंचानबे फीसदी होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह सुश्रुत से बेहतर है, बल्कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसके पास स्थितियां बेहतर और अधिक अनुकूल हैं। उसके पास ऑपरेशन थिएटर है, जो पूरी तरह से साफ-सुथरा है।

दोनों स्थितियों से बचने के लिए भक्ति जरुरी है

तो ये दो स्थितियां हैं – एक में आप खुद दांव पर लग जाते हैं और दूसरे में आप किसी और को दांव पर लगा देते हैं। अच्छे ऑपरेशन थिएटर की तरह आपके जीवन में भी साफ-सफाई बनी रहे, इसके लिए जरूरी है कि आप जो भी करें, उसमें एक खास किस्म की पवित्रता हो।

इसके लिए सबसे अच्छी तकनीक यही है कि कोई भी काम करने से पहले आप ऐसी गणनाएं दिमाग से निकाल दें कि इससे मुझे क्या मिलेगा।
इसके लिए सबसे अच्छी तकनीक यही है कि कोई भी काम करने से पहले आप ऐसी गणनाएं दिमाग से निकाल दें कि इससे मुझे क्या मिलेगा। अगर आपने सिर्फ यह विचार अपने दिमाग से हटा दिया तो समझिए आपका नब्बे फीसदी आध्यात्मिक कार्य पूरा हो गया। यही भक्ति का मतलब है।

भक्ति का मतलब यही है कि आपने अपने दिमाग से यह बात हटा दी है कि मेरा क्या होगा। ‘मेरा क्या होगा’ का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि आपको भूखे रहना पड़ सकता है- ज्यादा से ज्यादा आप मर जाएंगे। तो अगर मैं यह सुनिश्चित कर दूं कि आपको दो वक्त का भोजन मिलता रहे, पहनने के लिए आपके पास कपड़े हों और रात गुजारने के लिए छत आपके पास हो, तो क्या आप पैसे के बारे में सोचना बंद कर सकते हैं? तभी हम आपको दूसरों के जन्म, मृत्यु या ऐसी ही दूसरी चीजों को संभालने की इजाजत दे सकते हैं, नहीं तो आपको इस विषय को छूना भी नहीं चाहिए। अगर आप प्रोफेशनल देवता हैं तो आपको इन विषयों को छूना भी नहीं चाहिए, क्योंकि यह ठीक नहीं होगा।

 


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