सवाल सही का नहीं, वाजिब होने का है

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एक बहुर सुंदर कहानी है। विष्णु की दो धर्मपत्नियां – भाग्य की देवी लक्ष्मी और दुर्भाग्य की देवी अलक्ष्मी दोनों खुद को सबसे सुंदर समझती थीं। एक दिन दोनों ने भगवान विष्णु से पूछा, “हम दोनों में सबसे सुंदर कौन है?” विष्णु ने लक्ष्मी से कहा, “जब आप आती हैं तब सबसे सुंदर लगती हैं.” फिर उन्होंने अलक्ष्मी से कहा, “जब आप जाती हैं तब सबसे सुंदर लगती हैं।” मतलब यह कि भाग्य आ रहा है और दुर्भाग्य जा रहा है, क्या दोनों ही सबसे सुंदर नहीं हैं? अब आप कहेंगे, “ओह! यह तो हाजिरजवाबी है, लेकिन सही जवाब क्या है? सचमुच में सबसे सुंदर कौन है?” सिर्फ किसी स्त्री के सौंदर्य के लिए ही नहीं, अस्तित्व की किसी भी चीज के लिए सही जवाब जैसी कोई बात नहीं होती। बस एक उचित या वाजिब जवाब होता है। तो यह एक उचित जवाब है। जीवन सही होने के बारे में नहीं है, यह उचित या वाजिब के संबंध में होता है।

तो फिर क्या करना सही होगा? कुछ भी करना सही नहीं है। सवाल यह है कि क्या करना उचित होगा। तभी आप जीवन के संपर्क में हो सकते हैं। अगर आप सही चीजें करते रहेंगे तो निपट बेवकूफ ही साबित होंगे। अगर आप यह सोचते रहेंगे कि क्या सही है तो आप या तो नास्तिक हो जायेंगे या आस्तिक। नास्तिक बेहद बेवकूफ होते हैं और आस्तिक महान बेवकूफ,  क्योंकि दोनों सही हैं – यही तो समस्या है। अगर कोई जिंदगी के सही होने की तलाश में लगा रहता है तो वह बंजर और वीरान हो जाता है। मूल रूप से जीवन उचित वा वाजिब के संबंध में  है। यदि आप सही होने की तलाश में हैं तो हो सकता है आप एक अच्छा व्यक्ति बन जायें। पर  आप कभी जीवन को नहीं जान पाएंगे। स्वयं को अच्छा समझने वाले लोगों के पास नैतिकता होती है, उनके अपने उसूल होते हैं, उनकी अपनी ईमानदार नीतियां होती हैं। वे इस नैतिकता, इन उसूलों, इन ईमानदार नीतियों से चिपके रहते हैं, क्योंकि इससे उनको अपने ऊंचे होने का अहसास होता है। जो स्वयं को अच्छा समझते हैं वे इस पूरी दुनिया को हमेशा नीचा ही देखते हैं। यह दुनिया को चूकने का शर्तिया तरीका है। ऊंचाई से देखने पर सबसे सुंदर स्त्री भी बहुत सुंदर नहीं दिख पायेगी। चूंकि आप लगातार नीची नजर से देख रहे हैं इसलिए हर चीज बदसूरत और काली दिखेगी – बशर्ते वे गंजे और चमकदार न हों। (हंसी)

 सवाल यह है कि क्या करना उचित होगा। तभी आप जीवन के संपर्क में हो सकते हैं।

अच्छे लोग हर जगह होते हैं; हमारे आश्रम में भी हैं। उनके अपने उसूल हैं, अपनी मर्यादाएं हैं, वे बहुत नैतिक हैं। वे यहां सालों रहेंगे, पर हर घटना से बिलकुल अछूते रह जाएंगे। आप चाहे जो करें उनको कोई फर्क नहीं पड़ता, वे अपनी अच्छाई के दायरे में अनछुए रहेंगे। वे उम्मीद के सहारे जीते हैं, उनको बताया गया है कि अच्छे लोग स्वर्ग जाते हैं।

आप अपनी नैतिकता, अपने उसूलों, अपनी ईमानदार नीतियों, अपनी मर्यादाओं के साथ जो कुछ भी करने की कोशिश कर रहे हैं वह जीवन को आसान बनाने के लिए है; एक ऐसे स्थान में व्यवस्था ढूंढ़ने के लिए है जहां आप नहीं समझ पा रहे कि शरू कहां से है और इसका अंत कहां। जीवन-प्रक्रियाएं आपके लिए इतनी अव्‍यवस्थित और असहनीय हैं कि आप अपनी स्वयं की मर्यादाएं, अपनी स्वयं की ईमानदार नीतियां और अपने खुद के उसूल बना कर एक मूर्खतापूर्ण व्यवस्था लाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आप जीवन में अपनी खुद की मूर्खतापूर्ण व्यवस्था ले आयेंगे तो आप अस्तित्व की भव्य व्यवस्था को नहीं देख पायेंगे – जो व्यवस्थित तो है ही नहीं। दरअसल व्यवस्थित होने की जरूरत भी नहीं, अस्तित्व स्‍वयं में एक संपूर्ण व्यवस्‍था है।

tanakawho@Flickr

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