क्या गुरु परंपरा बीते युग की बात है?

क्या गुरु परंपरा बीते युग की बात है?

सद्‌गुरुकुछ लोगों द्वारा माना जता है कि गुरु पुराने युग में होते थे, और अब गुरुओं का युग खत्म हो गया। ऐसा ही प्रश्न सद्‌गुरु से पूछा गया, जानते हैं सद्‌गुरु का उत्तर

प्रश्न : सद्‌गुरु, शायद आपको पता होगा कि पश्चिम के देशों में गुरु के पूरे विचार को लेकर ही काफी विरोध जैसी स्थिति रही है। बहुत सारे ऐेसे मामले हुए हैं, जहां किसी गुरु या टीचर के तमाम अनैतिक आचरण सामने आए हैं।

वे अपने देश में भी तो अपना धंधा कर सकते हैं, लेकिन उनका धंधा स्थानीय लोगों के बीच चलता नहीं, क्योंकि सबको पता होता है कि असल में वे कौन हैं।
कभी सेक्स के मामले तो कभी पैसे और ताकत के नाम पर लोगों के साथ गलत व्यवहार किया गया है। पश्चिमी देशों के कई लोगों का कहना है कि गुरुओं का युग खत्म हो गया। गुरु परंपरा बीते जमाने की बात है और अब हमें किसी ऐसी नई चीज की तलाश करनी है जो उस परंपरा को पीछे छोड़ दे। जो लोग ऐसी बातें करते हैं, उनसे आप क्या कहेंगे?

सद्‌गुरु : इसमें कोई दो राय नहीं कि पीछे कई शर्मनाक घटनाएं हुई हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं जीवन के हर क्षेत्र में होती हैं। अगर समाज में भ्रष्ट लोग हैं, तो हर स्तर पर भ्रष्टाचार होगा। हर तरफ , हर व्यवसाय में, जीवन के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार है, लेकिन जब बात आध्यात्मिक क्षेत्र की होती है, तो यह बहुत कठोर महसूस होता है, क्योंकि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भरोसा सबसे अहम चीज होती है। और जब वह भरोसा टूटता है, तो निश्चित रूप से जबरदस्त निराशा होती है। आप अभी इसी निराशा की बात कर रही हैं। ऐसी घटनाओं की प्रतिक्रिया गहरी निराशा के तौर पर सामने आती है, लेकिन केवल प्रेस और मीडिया में हालत इतनी बिगड़ी दिखाई देती है। आम लोगों के बीच तो मुझे ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता।

भारत और अमेरिका में कचरे का आदान-प्रदान हो रहा है

देखिए, भारत में भी लोग अमेरिका के बारे में जो राय बनाते हैं, वह उन बी-ग्रेड फिल्मों को देखकर बनाते हैं, जो हॉलिवुड से आ रही हैं। अमेरिका से वही चीजें भारत आ रही हैं, जो सबसे खराब हैं।

वे अपने देश में भी तो अपना धंधा कर सकते हैं, लेकिन उनका धंधा स्थानीय लोगों के बीच चलता नहीं, क्योंकि सबको पता होता है कि असल में वे कौन हैं।
इसी तरह दुर्भाग्यवश भारत से भी केवल कचरा ही वहां जा रहा है। ऐसा नहीं है कि अच्छी फिल्में नहीं बन रही हैं, लेकिन यहां जो आ रहा है, वह अमेरिका का कचरा होता है, और यहां का कचरा वहां पहुंच रहा है। दरअसल, जो कचरा होता है, वह स्थानीय लोगों के बीच अपनी जगह नहीं बना पाता, इसलिए उसे कहीं और जाकर अपने लिए जगह तलाशनी पड़ती है। आजकल आप देखिए, अमेरिका से न जाने कितने तरह के ‘हीलर’ यानी चिकित्सक भारत आ रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे कैंसर जैसी बीमारियों को भी ठीक कर सकते हैं। ऐसे ही भारत से भी न जाने कितने लोग अमेरिका जा रहे हैं और ऐसे ही दावे कर रहे हैं। मैं पूछता हूं कि हीलर्स का यह आदान-प्रदान क्यों? वे अपने देश में भी तो अपना धंधा कर सकते हैं, लेकिन उनका धंधा स्थानीय लोगों के बीच चलता नहीं, क्योंकि सबको पता होता है कि असल में वे कौन हैं।

आपकी कोशिशें बेकार जा सकती हैं

अब बात करते हैं कि गुरु क्या है? गुरु बस एक तरह का जीवंत रोडमैप यानी राह दिखाने वाला है।

क्या आप ऐसा सोचते हैं कि पिछली बार जब मैंने किसी से रास्ता पूछा था तो उसने मुझे गलत रास्ता बताकर भटका दिया था, इसलिए अब मैं किसी से भी रास्ता या दिशा पूछूंगा ही नहीं, अब मैं अपने आप ही सब कुछ करूंगा?
अब सवाल है कि मैं इस रोडमैप का इस्तेमाल करूं या इसे इसलिए फेंक दूं, क्योंकि पिछली बार किसी ने मुझे गलत रोडमैप दे दिया था? एक बार किसी ने गलत रोडमैप दे दिया तो क्या इसका मतलब यह है कि मैं कभी रोडमैप का इस्तेमाल ही नहीं करूंगा? हां, आप रोडमैप से अगले स्तर यानी जी.पी.एस. के इस्तेमाल की ओर जा सकते हैं। जी.पी.एस. से मेरा मतलब है ‘गुरु पोजिशनिंग सिस्टम।’

अगर आप किसी अपरिचित क्षेत्र में यात्रा कर रहे हैं तो आपके हाथ में रोडमैप जरूर होना चाहिए। क्या आप ऐसा सोचते हैं कि पिछली बार जब मैंने किसी से रास्ता पूछा था तो उसने मुझे गलत रास्ता बताकर भटका दिया था, इसलिए अब मैं किसी से भी रास्ता या दिशा पूछूंगा ही नहीं, अब मैं अपने आप ही सब कुछ करूंगा? अगर ऐसा सोचते हैं तो जीवन में आपकी कोशिशें बेकार जा सकती हैं, क्योंकि जब आप किसी अनजान क्षेत्र में यात्रा कर रहे होते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि आपकी मंजिल अगले ही कदम पर होती है और आप उसके लिए पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर वहां तक पहुँचते हैं, और फिर भी अपनी मंजिल को नहीं पाते।

भीतरी और बाहरी परिस्थितियों का अंतर

भीतरी और बाहरी परिस्थितियों में एक बेहद सूक्ष्म सा अंतर होता है – सबसे पहले इंसान को यह समझना होगा। यही एक अंतर है जिसे वे जानते हैं।

मुझे अपने और आपके बीच का फ र्क नहीं पता और इसी कारण मैं पूरी दुनिया में फैला हूं। तो अंदर और बाहर का जो फर्क जानने की शक्ति आपमें अभी है, अगर आपको आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हो गई तो आप इस काबिलियत को भी खो देंगे।
अभी दुनिया भर में एक चलन है। अगर लोग इस दुनिया से परे कुछ देखना चाहते हैं तो वे ऊपर की ओर देखने लगते हैं। ऊपर देखने या नीचे देखने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि आपको पता है आप एक गोल धरती पर खड़े हैं। आप उत्तरी ध्रुव पर नहीं हैं। यह धरती गोल है और घूम भी रही है, तो जब भी आप ऊपर की ओर देखेंगे तो जाहिर है गलत दिशा में ही देखेंगे। कहने का मतलब यह है कि किसी को नहीं पता कि इस सृष्टि में ऊपर किधर है और नीचे किधर। कहीं ऐसा नहीं लिखा है कि यह साइड ऊपर है। किसी को नहीं पता कि क्या आगे है और क्या पीछे। किसी को नहीं पता कि कौन सा उत्तर है और कौन सा दक्षिण। यह हम लोगों का आपस में रचा हुआ एक तरह का षडयंत्र है। हमने ऐसा मान लिया है कि यह दिशा ऊपर है और यह दिशा नीचे, लेकिन वास्तविकता क्या है, यह किसी को नहीं पता। केवल एक चीज है जिसे लेकर इंसान निश्चित हो सकता है कि क्या अंदर है और क्या बाहर है। यही एक मात्र अंतर है जो आप जानते हैं। लेकिन अगर आज आपको ज्ञान की प्राप्ति हो गई तो आप इस फर्क को समझने की शक्ति भी खो देंगे। अभी यही मेरी समस्या है। मुझे अपने और आपके बीच का फर्क नहीं पता और इसी कारण मैं पूरी दुनिया में फैला हूं। तो अंदर और बाहर का जो फर्क जानने की शक्ति आपमें अभी है, अगर आपको आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हो गई तो आप इस काबिलियत को भी खो देंगे।

भीतर घटती हुई चीज़ें, बाहर होती प्रतीत होती हैं

तो इस पूरी प्रक्रिया से एक खास मार्गदर्शन के साथ गुजरने की जरूरत है, नहीं तो एक छोटी सी चीज को समझने में आपका पूरा जीवन लग जाएगा।

अगर पहले किसी ने उसे गलत रास्ता दिखा दिया तो अगली बार उसे थोड़ा सचेत रहने की जरूरत है, लेकिन अगर कोई मदद मौजूद है तो उसे नकार देना ठीक नहीं है।
अभी आप अपने आसपास जो भी देख रहे हैं, ऐसा लगता है कि ये चीजें आपके आसपास हैं, लेकिन अगर आप पेड़ को देख रहे हैं या आप मुझे बोलते हुए सुन रहे हैं, तो उस पेड़ की छवि या बोली गई आवाज आपके भीतर ही घटित हो रही है। यह सब कुछ आपके भीतर जिस तरह से घटित हो रहा है, उसी तरह से आप इसे समझते हैं। जो आप देखते हैं, वह आपके मन में बनी उस वस्तु की छवि है। यह छवि प्रकाश के उस वस्तु पर पड़कर परावर्तित होने से बनी है। तो आप जो भी देखते हैं, वह आपके भीतर ही घटित हो रहा है, आप जो सुनते हैं, वह भी आपके भीतर ही घटित हो रहा है, प्रकाश और अंधकार सब आपके भीतर ही है। दुख और सुख, कष्ट और आनंद सब कुछ आपके भीतर ही है। आपने जो भी महसूस किया है, वह सब आपके भीतर ही घटित हुआ है। अपने से बाहर जाकर तो आपने कभी कुछ भी अनुभव नहीं किया है।

इस तरह इंसान चीज़ों को उसी तरह से जानता है, जिस तरह वे उसके भीतर घटित होती हैं। लेकिन उसे लगता है कि वह सब बाहर हो रहा है। उसके अनुभव का स्रोत और आधार उसके भीतर ही है, लेकिन उसे लगता है कि वह बाहर है। तो जब वह ऐसे भ्रम की स्थिति में है, तो बेहतर यही है कि वह किसी ऐसे शख्स की मदद ले जो उस रास्ते पर चल चुका है। अगर पहले किसी ने उसे गलत रास्ता दिखा दिया तो अगली बार उसे थोड़ा सचेत रहने की जरूरत है, लेकिन अगर कोई मदद मौजूद है तो उसे नकार देना ठीक नहीं है। अगर वह मदद नहीं ली गई तो बस केवल समय की बर्बादी होगी, इसके सिवाय कुछ भी नहीं होगा। पश्चिमी समाज को इस बारे में सोचने की जरूरत है। अगर आपने एक या दो खराब सेब देख लिए तो इसका मतलब यह तो नहीं कि आप सेब खाना ही छोड़ देंगे।


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