भारत बन सकता है एक बार फिर जगत गुरु

भारत बन सकता है एक बर फिर से जगत गुरु

सद्‌गुरुजगत गुरु बनने के लिए कुछ ऐसा करने की जरुरत है, जिससे इस देश की चेतना एक ख़ास तरीके से काम करे क्योंकि हमारे देश का गौरव इसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों में छिपा है। और हमारे नेतृत्व को इस बात को पकड़ने की जरुरत है…

ऐसे वैज्ञानिक तरीके जो सभी के लिए काम करें

आज भारत के लोगों के सामने जबरदस्त संभावना, जिम्मेदारी व विशेषाधिकार है। भारत सफलता का एक नया आयाम दुनिया के सामने लाने में सक्षम है। भारत दुनिया को बता सकता है कि मानव कल्याण के लिए सफलता के प्रतिमान क्या हैं।

इससे पहले कि व्यक्ति दुनियावी उपलब्धियों के लिए कदम बढ़ाए, उसे अपने भीतरी कल्याण के एक खास बोध को हासिल करना जरूरी है। अगर ऐसा हो पाता है, तभी लोग अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से निकल कर किसी बड़े मकसद या दृष्टिकोण के लिए काम कर पाएंगे।
हमारे पास इसे कर दिखाने के लिए आवश्यक भीतरी तकनीक और बुद्धि है। हमें इस दुनिया को सुंदर बनाना है, लेकिन इसके लिए हमें न तो दुनिया को जीतने की जरूरत है और न ही उसे हथियाने की, बस हमें उन्हें मुग्ध करके अपनी ओर खींचना होगा, और उन्हें एक खूबसूरत हार की तरह गले लगाना होगा। आधुनिक दौर में जो देश बहुत प्रभावशाली हैं, वो अपने भीतर एक मायूसी और मोहभंग के भयानक दौर से गुजर रहे हैं। जबकि इस देश ने भीतरी कल्याण के तौर-तरीकों में महारत हासिल कर रखी है। हमें उन वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी है कि जो सबके कल्याण के लिए काम कर सकते हैं। इससे पहले कि व्यक्ति दुनियावी उपलब्धियों के लिए कदम बढ़ाए, उसे अपने भीतरी कल्याण के एक खास बोध को हासिल करना जरूरी है। अगर ऐसा हो पाता है, तभी लोग अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं से निकल कर किसी बड़े मकसद या दृष्टिकोण के लिए काम कर पाएंगे।

नैतिकता नहीं चेतनता से समाधान संभव है

भारत मानव के कल्याण हेतु दुनिया को जो दे सकता है, वह अलुतनीय है। यह कहीं और संभव नहीं है, क्योंकि यहां हजारों सालों से इसे पाला-पोसा और संवारा जा रहा है।

अगर आप लोगों पर नैतिकता लादेंगे तो पहले लोग वही काम करेंगे और फिर वे उसके अपराधबोध से ग्रसित होंगे। लेकिन फिर उससे उबरने के लिए वह मंदिरों में कुछ चढ़ावा चढ़ाएंगे और वापस उसी चीज या काम को करने लगेंगे। आज लोग यही कर रहे हैं।
लेकिन फिलहाल देश पर एक खास तरह का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि आध्यात्मिकता का यह सूत्र धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है और इस पतन से निपटने के लिए हमारे पास कोई नैतिकता का ढांचा भी नहीं है। अगर हम आध्यात्मिकता को खो देते हैं तो हमसे ज्यादा अनैतिक लोग व देश कोई और नहीं होगा, क्योंकि हममें तो पश्चिम की तरह अपराध बोध भी नहीं है। एक संस्कृति के तौर पर भारत में कोई नैतिकता नहीं है। इस देश में कभी भी हमारा जोर नैतिकता और सिद्धांतों पर नहीं रहा। अगर आप पश्चिमी देशों में चले जाइए तो वहां नैतिकता का सख्त भाव होता है। हालांकि यह और बात है कि वे इस नैतिकता को हमेशा तोड़ते रहे हैं। फि र भी उनके समाज में नैतिकता का एक भाव स्थापित है। लेकिन अपने यहां हममें नैतिकता का कोई भाव नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह भाव आज गायब हो गया है, बल्कि यह हमेशा से ही नहीं था। हमने नैतिकता को हमेशा मानव चेतना के लिए एक बंधन माना। हमने कभी अपने जीवन, अपने समाज और अपने आसपास की दुनिया को नैतिकता से नहीं चलाना चाहा। नैतिकता का मतलब है कि आप चीजों को दोहराने लगेंगे। अगर आप किसी चीज को बार-बार दोहराएंगे तो आप एक चक्र में फंस जाएंगे। और अगर आप चक्र में फंस गए तो जाहिर है कि फि र आप कहीं नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए हमने मानव चेतना को ऊपर उठाने का जोखिम लिया। हमारी आबादी के एक हिस्से ने खुद को नैतिकता सिखाने की बजाय मानव चेतना को जगाने में लगा दिया। हालांकि यह जोखिम भरा रास्ता जरूर है, लेकिन अंतत: मानवता को संभालने का यही एकमात्र रास्ता है। अगर आप लोगों पर नैतिकता लादेंगे तो पहले लोग वही काम करेंगे और फिर वे उसके अपराधबोध से ग्रसित होंगे। लेकिन फिर उससे उबरने के लिए वह मंदिरों में कुछ चढ़ावा चढ़ाएंगे और वापस उसी चीज या काम को करने लगेंगे। आज लोग यही कर रहे हैं। दुनिया में बड़े पैमाने पर धर्म आज ऐसे ही हो गए हैं।

हमारे भगवान भी नैतिकता नहीं चेतनता के शिखर पर थे

अगर एक बार आपने नैतिकता तय कर दी और कहा- ‘यह मत करो, वह मत करो’, तो लोग जरूर उसे करेंगे। क्योंकि यह हमारे मन का स्वभाव है। आपका मन वही करेगा, जिसके लिए आपने उसे मना किया है।

वे नैतिक रूप से उचित थे ही नहीं। दरअसल, उन्हें कभी लगा ही नहीं कि उन्हें उस तरह से होना है। लेकिन वे मानव चेतना के चरम पर थे।

इस देश में ‘तुम्हें यह नहीं करना’ जैसी चीजें नहीं हैं। यहां कभी कोई आपसे नहीं कहेगा कि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं? हम आपको सिर्फ इतना बताते हैं कि आपको ‘कैसा होना चाहिए’ और यह सिखाना सबसे मुश्किल है। अगर आप एक खास तरह से रह रहे हैं तो हमें आपको यह बताने की जरूरत नहीं है कि ‘यह करो और वह मत करो।’ आप खुद वही करेंगे, जो उस स्थिति में सबसे उचित होगा। जबकि दुनिया में बाकी जगहों पर आपको बताने की कोशिश की जाती है कि क्या सही है और क्या गलत? इस देश व इस संस्कृति में हम कभी आपको नहीं बताते कि क्या सही है और क्या गलत। हम सिर्फ इतना ही बताते है कि किसी स्थिति विशेष में या अब क्या करना उचित है? लेकिन कल क्या उचित होगा, यह उससे अलग हो सकता है। यह बुनियादी अंतर है। आप देखेंगे कि आप भगवान के जिस रूप की भी, चाहे राम, कृष्ण या शिव, की पूजा करते हैं, उन्हें आप नैतिक रूप से उचित व्यक्ति नहीं कह सकते। वे नैतिक रूप से उचित थे ही नहीं। दरअसल, उन्हें कभी लगा ही नहीं कि उन्हें उस तरह से होना है। लेकिन वे मानव चेतना के चरम पर थे।

आध्यात्मिकता को जीवन का अंग बनाना होगा

लेकिन इस चेतना को बांटना या विस्तार करना इतना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत कुछ करना पड़ता है और यह सर्वश्रेष्ठ रूप से तभी काम करती है, जब यह विस्तृत रूप से फैली हो।

हम लोग बस कुछ ऐसे पश्चिमी कायदों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारे लिए अनजान हैं। यह हमारे लिए कतई काम नहीं करेंगे, क्योंकि ये उनके लिए भी काम नहीं कर पाए।
अगर यह माहौल में हर तरफ हो, अगर माता-पिता, पड़ोसी और पूरा माहौल इस तरह का हो, तो बच्चे खुद-ब-खुद एक खास चेतना के साथ बड़े होंगे। एक तरह से यह वाकई शर्म की बात है कि हमें लोगों को उनकी आध्यात्मिकता के बारे में याद दिलाना पड़ता है। हम चाहते हैं कि आध्यात्मिक प्रक्रिया जीवंत संस्कृति का हिस्सा बन जाए। जिस तरह से एक मां अपने बच्चे को दांत साफ करना सिखाती है, हम चाहते हैं कि इस मामले में भी ऐसा ही हो। मां को इसका पता भी न चले और वह अपने बच्चे को उतनी ही सहजता से आध्यात्मिक प्रक्रिया सिखा दे जैसे वह उसे बाकी सारी चीजें सिखाती है। कुछ पीढ़ी पहले तक इस संस्कृति में यह चीज बेहद आम बात थी। यह हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हुआ करती थी। फिर यह आसान हो गया। लेकिन अपने यहां आज हम ऐसे चौराहे पर आकर खड़े हो गए हैं, जहां पर मानव चेतना के उत्थान के लिए पर्याप्त काम नहीं हो रहा है। साथ ही, हमारे पास लेशमात्र भी नैतिकता नहीं है। हम लोग बस कुछ ऐसे पश्चिमी कायदों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारे लिए अनजान हैं। यह हमारे लिए कतई काम नहीं करेंगे, क्योंकि ये उनके लिए भी काम नहीं कर पाए।

नेतृत्व को इस चीज़ को पकड़ने के जरुरत है

अगर हम कुछ देसी चीज या कहें कुछ मौलिक करना चाहते हैं – इस देश के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए, तो हमें आप पर नियम-कायदे नहीं थोपने चाहिए कि ‘तुम ये मत करो’।

अपने देश के नेतृत्व को उस चीज को पकडऩे की जरूरत है, जो वाकई इस देश को आपस में बांधे हुए है।
क्योंकि लोग अक्सर पहला मौका मिलते ही नैतिकता की अनदेखी करने की कोशिश करेंगे। हम ऐसी कोशिश करें कि मानव चेतना एक खास तरीके से काम कर सके, क्योंकि आपके पास यही एकमात्र सुरक्षित या परम सुरक्षित तरीका है। अपने देश के नेतृत्व को उस चीज को पकडऩे की जरूरत है, जो वाकई इस देश को आपस में बांधे हुए है। अपने देश के अतीत का गौरव इसकी आध्यात्मिक संभावनाओं और उसकी उपलब्धियों में छिपा है। आध्यात्मिकता जो धार्मिक संप्रदायों से परे है, आध्यात्मिकता जो मानव के जानने की सहज उत्कंठा का प्रतिफल है – उस मूलभूत खोज और जानने की उत्कंठा को पुनस्र्थापित करके ही इंसान अनुभव और मुक्ति हासिल कर सकता है। इससे उसे व्यक्तिगत रूप से वो ताकत मिलेगी, जिसकी मदद सेे वह राष्ट्र-निर्माण में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकेगा।


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