भारतीय संस्कृति : हम क्यों जलाते हैं दीया?

बिजली के बल्बों के लोकप्रिय होने से पहले तक तेल के दीये दुनिया की विभिन्न परंपराओं और संस्कृतियों का एक हिस्सा थे। तेल के दीये का सबसे शुरुआती जिक्र करीब 4500 से 3300 ई.पू. ताम्रपाषाण काल में मिलता है। आज उनका इस्तेमाल कुछ ही घरों तक सीमित रह गया है, जो अक्सर सिर्फ देखने में अच्छा लगने के लिए जलाए जाते हैं।

सद्‌गुरु बता रहे हैं कि यह साधारण तेल का दीया रोशनी और सुंदरता के लिए इस्तेमाल किए जाने से कहीं अधिक मायने रखता है। देखिए कि आप अपने घर में ऊर्जा और सकारात्मकता का वातावरण कैसे बना सकते हैं।

सद्‌गुरु:

प्रकाश हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है, क्योंकि हमारे देखने के उपकरण यानी हमारी आंखें बनाई ही ऐसी गई हैं। अगर हमारी आंखें उल्लू की तरह होतीं, तो रोशनी हमारे लिए बहुत कीमती नहीं होती।

आज आपके पास बिजली की रोशनी है, इसलिए आप दीया के होने पर आश्चर्य कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ कुछ सौ वर्ष पहले की स्थिति की कल्पना कीजिए, घर में दीये के बिना कोई काम नहीं हो सकता था। ऐतिहासिक रूप से, दीया दो वजहों से हमारे घरों का एक जरूरी अंग था। पहला- तब बिजली के बल्ब नहीं थे। दूसरा- घर जैविक सामग्रियों से बनते थे, इसलिए लोग बड़ी-बड़ी खिड़कियां नहीं बना सकते थे। आम तौर पर पुराने जमाने के घर अंदर से अंधकारमय होते थे। आज भी आपने देखा होगा कि गांवों के पुराने घरों और झोपड़ियों के भीतर आम तौर पर अंधेरा होता है। इसलिए दिन के समय भी दीया जलाकर रखा जाता था और उसके आस-पास पूजा का एक स्थान बना दिया जाता था।

क्या आप जीवन में कभी अलाव के आस-पास बैठे हैं? अगर हां, तो आपने देखा होगा कि अलाव के पास सुनाई गई कहानियों का लोगों पर बहुत अधिक असर होता है। क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है? प्राचीन समय के कहानी सुनाने वाले यह बात समझते थे।

यह परंपरा का एक हिस्सा है कि सही वातावरण बनाने के लिए, आपको सबसे पहले दीया जलाना होता है। आज हम अपनी समस्याओं के कारण यह नहीं कर सकते, इसलिए हम बिजली के बल्बों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन आपमें से जो लोग दीया जलाते हैं, अगर आप सिर्फ उसके आस-पास रहें तो एक फर्क महसूस करेंगे। आपको किसी ईश्वर को मानने की जरूरत नहीं है। जरूरी नहीं है कि उसे अंधकार में जलाया जाए, जरूरी नहीं कि दीये से देखने में मदद मिले लेकिन क्या आपने ध्यान दिया है कि वह एक फर्क लाता है? क्योंकि आप जिस क्षण एक दीया जलाते हैं, सिर्फ लौ ही नहीं, बल्कि लौ के चारो ओर स्वाभाविक रूप से एक अलौकिक घेरा या आभामंडल बन जाता है।

जहां भी आभामंडल होगा, संवाद बेहतर होगा। क्या आप जीवन में कभी अलाव के आस-पास बैठे हैं? अगर हां, तो आपने देखा होगा कि अलाव के पास सुनाई गई कहानियों का लोगों पर बहुत अधिक असर होता है। क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है? प्राचीन समय के कहानी सुनाने वाले यह बात समझते थे। अलाव के पास सुनाई जाने वाली कहानियां हमेशा सबसे प्रभावशाली कहानियां होती हैं। वहां पर ग्रहणशीलता अपने चरम पर होती है।

इसलिए अगर आप कोई शुरुआत करना चहाते हैं, या एक खास माहौल बनाना चाहते हैं, तो दीया जलाया जाता है। इसके पीछे यह समझ है कि जब आप एक दीया जलाते हैं, तो रोशनी देने के अलावा, वह उस पूरे स्थान को एक अलग किस्म की ऊर्जा से भर देता है। तेल का दीया जलाने के कुछ खास प्रभाव होते हैं। दीया जलाने के लिए कुछ वनस्पति तेलों, खासकर तिल का तेल, अरंडी का तेल या घी इस्तेमाल करने पर, सकारात्मक ऊर्जा उत्तपन्न होती है। उसका अपना ऊर्जा क्षेत्र होता है।

अगर आप कोई शुरुआत करना चहाते हैं, या एक खास माहौल बनाना चाहते हैं, तो दीया जलाया जाता है। इसके पीछे यह समझ है कि जब आप एक दीया जलाते हैं, तो रोशनी देने के अलावा, वह उस पूरे स्थान को एक अलग किस्म की ऊर्जा से भर देता है।

अग्नि खुद कई रूपों में प्रकाश और जीवन का एक स्रोत है। प्रतीकात्मक रूप में हमने हमेशा से अग्नि को जीवन के स्रोत के रूप में देखा है। कई भाषाओं में आपके जीवन को ही अग्नि कहा गया है। आपके भीतर “जीवन की अग्नि” आपको सक्रिय रखती है। इस पृथ्वी पर जीवन का जो मूल कारण है- सूर्य, वह भी अग्नि का एक पिंड ही तो है। चाहे आप बिजली का बल्ब जलाएं, या किसी भी तरह के चूल्हे पर खाना पकाएं, या आपके कार का अंदरूनी इंजिन, सब कुछ आग ही तो है। इस दुनिया में जीवन को चलाने वाली हर चीज अग्नि है।  इसलिए अग्नि को जीवन का स्रोत माना गया है। यह अपने आस-पास ऊर्जा का एक घेरा भी बनाता है और सबसे अधिक यह जरूरी माहौल बनाता है। इसलिए जब आप अपने दिन की शुरुआत से पहले एक दीया जलाते हैं, तो इसकी वजह यह होती है कि आप वही गुण अपने अंदर लाना चाहते हैं। यह एक प्रतीक है, आपकी अपनी आंतरिक प्रकृति का आह्वान करने का एक तरीका है।


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