कहीं आप बुढ़ापे से डर तो नहीं रहे?

कहीं आप बुढापे से डर तो नहीं रहे?

बुढ़ापे का नाम सुनते ही कई लोगों के मन में एक बेचारगी, एक विवशता का भाव आ जाता है। आखिर क्यों है ऐसा? क्या सचमुच बुढ़ापा ऐसा ही है? क्या है तरीका अपने बुढ़ापे को संभालने और संवारने का, जानते हैं सद्‌गुरु से –

सद्‌गुरु:

बुढ़ापा कोई दुर्भाग्य या विपदा नहीं है। यह अवस्था कई रूपों में एक बहुत बड़ा वरदान हो सकती है क्योंकि आपके पास पूरे जीवन का अनुभव होता है। जब आप बच्चे थे, तो सब कुछ बहुत खूबसूरत था लेकिन आप बड़े होने के लिए बेचैन थे, क्योंकि आप जीवन को अनुभव करना चाहते थे। जब आप जवान हुए, तो आपके हारमोन्स ने आपकी बुद्धि का अपहरण कर लिया। बहुत कम लोग अपनी बुद्धि को हारमोन्स के चंगुल से निकाल कर विकसित कर पाने में और जीवन को साफ-साफ देख पाने में सक्षम होते हैं। बाकी लोग उसी में फंसे रहते हैं।

अगर आप खुद को अनुभव के दूसरे आयाम में ले जाएं, तो शरीर को संभालना एक आसान काम हो जाता है। और तब बुढ़ापा और यहां तक कि मृत्यु भी एक आनंदमय अनुभव हो सकता है।

जब आप वृद्धावस्था तक पहुंचते हैं, तो सारी लालसाएं खत्म हो चुकी होती हैं और जीवन का पूर्ण अनुभव आपके पास होता है। आप एक बार फिर से बच्चों की तरह हो जाते हैं, लेकिन अब आपके पास जीवन के अनुभव से जन्मा विवेक होता है, समझ होती है। यह आपके जीवन का बहुत उपयोगी और बढ़िया हिस्सा हो सकता हे, लेकिन दुर्भाग्यवश अधिकतर लोग अपने बुढ़ापे को झेल रहे हैं, क्योंकि वे अपने शरीर की देखरेख और तंदुरुस्‍ती की प्रक्रिया पर ठीक से ध्यान नहीं देते। भारत में प्राचीन काल में वृद्धा-अवस्था का मतलब वनप्रस्थ आश्रम होता था, जब वृद्ध वन में चले जाते थे और वहां आनंदपूर्वक रहते थे। लेकिन आजकल वृद्धावस्था का मतलब ‘अस्पताल-आश्रम’ हो गया है।

अगर आप अपनी तंदुरुस्‍ती की प्रक्रिया का अच्छी तरह ध्यान रखें, तो बुढ़ापा आपकी ज़िंदगी का एक अद्भुत हिस्सा हो सकता है। यह बेहद अनमोल है कि एक तरफ तो जीवन का पूर्ण अनुभव साथ है और आप एक बार फिर से बच्चा बन गए हैं।

सब कुछ गुजर जाने के बाद बुढ़ापे में बहुत कम लोग मुस्कुरा पाते हैं, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे अपने जीवन में सिर्फ अपने भौतिक शरीर को जानते थे। शरीर के क्षीण होने के साथ, वे निराश होने लगते हैं। भले ही कोई बीमारी न हो, कोई खतरनाक कैंसर न हो, पर उम्र हर दम आपको बताती है कि यह हमेशा के लिए नहीं है। अगर आप खुद को अनुभव के दूसरे आयाम में ले जाएं, तो शरीर को संभालना एक आसान काम हो जाता है। और तब बुढ़ापा और यहां तक कि मृत्यु भी एक आनंदमय अनुभव हो सकता है।

 


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