याल्बंग के जादुई पहाड़
इस हफ्ते के स्पॉट में सद्गुरु हमें एक नयी कविता भेज रहे हैं। यह कविता उन्होंने कैलाश की चढ़ाई के दौरान लिखी है। याल्बंग नाम के शहर में पड़ाव के समय लिखी गयी यह कविता पहाड़ों की जादुई भव्यता का वर्णन करती है।

इस हफ्ते के स्पॉट में सद्गुरु ने हमें एक नयी कविता भेजी है। यह कविता उन्होंने कैलाश यात्रा के दौरान लिखी है। याल्बंग नाम के शहर में पड़ाव के समय लिखी गयी यह कविता पहाड़ों की जादुई भव्यता का वर्णन करती है।
ऊबड़ खाबड़ पर्वतों की चोटियां
ऊंचाई से देखती हैं मुझे कुछ ऐसे
मानो देखता है एक चेहरा जो है,
चिरयुवा और स्थित-प्रज्ञ
जो गढ़ा हुआ है पत्थरों में
किन्तु है हमेशा परिवर्तनशील।
Subscribe
किन शाश्वत हाथों व आँखों ने गढ़ी होंगी
ऐसी दोषयुक्त-उत्कृष्ट कृतियां.
जो मैदानी सुविधाओं के आगे,
कर चुके हैं समर्पण
वो नहीं कर पाते सत्कार और आलिंगन
पहाड़ की तुच्छ चढाइयों का भी.
ये चढ़ाइयां विशाल संभावनाएं हैं
उन योगियों-तपस्वियों के लिए
जो त्याग चुके हैं
जीवन के भोग-विलास।
किन्तु तुम हो जाओ गर मदहोश एक बार
पहाड़ों के आगोश में,
तो खींचता है उसका आकर्षण
न केवल खोजियों व साहसियों को
अपितु ऋषियों, रहस्यवादियों, मनीषियों को भी
पर्वतों व घाटियों की भूलभुलैया में रहना
वैसा ही है जैसे फिर से लौटना
गर्भ में, जहां जीवन का होता है निर्माण
जो है सृजन का स्रोत
जादू, उन्माद, चमत्कार - सब कुछ संभव है
इन पहाड़ों की भूलभुलैया में।