आज के स्पॉट में सद्गुरु साझा कर रहे हैं अपने व्यक्तिगत जीवन की कुछ बातें, कुछ यादें जो जुड़ी हैं एक मदहोश कर देने वाले फूल से। आइए आप भी जानिए-
मेरी पूरी जिंदगी में सोन चंपक फूल से एक अजीब सा रिश्ता रहा है। तमिलभाषा में इसे ‘शेनबागम’ कहते हैं।
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विजी यह देखकर काफी रोमांचित थी कि पेड़ का पहला फूल पूर्णिमा के दिन खिला है। उसी रात को उसने दुनिया से जाने की तैयारी कर ली और फिर उसने दुनिया को अलविदा कह दिया।
आमतौर पर यह फूल पीले रंग का होता है, लेकिन कई जगहों पर इसमें हल्की लालिमा भी दिखाई देती है। इसकी महक काफी तीखी होती है, कई बार तो यह आपको मदहोश कर देती है। अगर आप अपने घरों में इसके कुछ फूल रख लीजिए तो आपका सिर चकराने लगेगा। यह मेरी मां का पसंदीदा फूल था। उनकी कोशिश रहती थी कि इस फूल के खिलने के मौसम भर कम से कम एक फूल घर में जरूर रहे।
इस आश्रम में आने से पहले मैं और विजी (सद्गुरु की स्वर्गवासी पत्नी) 12 साल तक बंजारों की तरह लगातार घूमते रहे। जब हम लोग यहां आए और घर बनाया तो विजी ने सबसे पहले खुद अपनी जिम्मेदारी लेकर सोन चंपक फूल का पौघा लगाया। उस वक्त उसने कहा था, ‘यह आपकी मां का प्रिय फूल था, इसलिए इस घर में सबसे पहला पौधा यही होना चाहिए।’ छह या आठ महीने में पौधा बड़ा हो गया, लेकिन उसमें कोई फूल नहीं आया। लेकिन फिर एक पूर्णिमा की सुबह पौधे में एक फूल आया। विजी ने बताया कि वह फूल तोड़ कर मेरी मां की तस्वीर पर रखना चाहती है। इस पर मैंने उससे कहा कि ‘चिंता मत करो। इसे पेड़ पर ही रहने दो। यह इसका पहला फूल है।’ विजी यह देखकर काफी रोमांचित थी कि पेड़ का पहला फूल पूर्णिमा के दिन खिला है। उसी रात को उसने दुनिया से जाने की तैयारी की थी और फिर उसने दुनिया को अलविदा कह दिया।
सोन चंपक फूल से जुड़े मेरे जीवन में और भी कई घटनाएं है।
इसके बारे में किंवदती है कि आज से छह हजार साल पहले अगस्त्य मुनि ने इस पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान लगाया, इसे आशीर्वाद दिया।
कनार्टक में ‘बिलीगिरी रंगनाबेट्टा’ नाम की पहाड़ी है, जिसे ‘बी. आर. हिल्स’ के नाम से भी जाना जाता है। प्रकृति और जंगली जीवों के लिहाज से यह एक शानदार जगह है। इस पहाड़ी से मेरा एक खास तरह का रिश्ता रहा है। दरअसल, जब मैं काफी छोटा हुआ करता था तो इन पहाड़ियों पर साइकिलिंग करने जाया करता था। मैंने इस जंगल में कैंप और ट्रेकिंग की है। यह पहाड़ी इलाका पूरी तरह से जंगली था, जो हाथियों, जंगली भैंसों, चीतों, भालुओं से भरा रहता था। एक दौर ऐसा भी था, जब वीरप्पन भी यहां रहा करता था। बीआर पहाड़ियों में एक जगह ऐसी है, जो ‘डोड्डा सोन चंपक’ कहलाती है, जिसका मतलब है- बड़े सोन चंपक। यहां सोन चंपक का पेड़ उम्रदराज होने के कारण काफी पुराना, बेढंगा, गांठदार और विशाल है। आम तौर पर सोन चंपक के पेड़ों की आयु बहुत ज्यादा नहीं होती।
एक दौर ऐसा भी था, जब वीरप्पन भी यहां रहा करता था।
लेकिन कहते हैं कि यह पेड़ छह हजार साल पुराना है और इसे अगस्त्य मुनि ने लगाया था। इसके बारे में किंवदती है कि आज से छह हजार साल पहले अगस्त्य मुनि ने इस पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान लगाया, इसे आशीर्वाद दिया।
संयोगवश मेरे और सोन चंपक फूल के बीच ऐसी कई घटनाएं घटी हैं। सच कहूं तो मेरे और इस पेड़ के बीच एक तरह का रोमांस रहा है।
Love & Grace