जन्म-जन्मान्तर बीत गए...
इस हफ्ते के स्पॉट में सद्गुरु एक कविता के माघ्यंमा से साझा कर रहे हैं अपने जन्मी जन्मां तर के संघर्ष, कोशिश और परिपूर्णता के बारे में।

7 जुलाई 2014
थाई एयरवेज
गुरु की इच्छा और मेरी चाहत
से हुआ स्फुरित अडिग व अटल संकल्प
एक संकल्प
जिसने तोड़ दिया दुनिया की सारी बाधाएं व पाश
जिन्हें रचा-पोसा था अज्ञानियों व तथाकथित ज्ञानियों ने।
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उद्देश्य-पूर्ति की परिपूर्णता का ज्ञान
लगता है जैसे खिला हृदय में पूर्णिमा का चांद
टपकती है जिससे निरे-अस्तित्व की शीतल-शोभा।
अगाध जीवन की कोमलता मुझे भर देती है सिहरन से
विचार व स्मृतियाँ भर देते हैं मेरी आँखों में आंसू
इतने सारे हो - तुम, तुम्हारे संघर्ष, तुम्हारी खुशी, तुम्हारा प्रेम,
तुम्हारी प्रतिबद्धता, तुम्हारा समर्पण, सबसे बढ़कर ‘जानने’ की तुम्हारी तड़प
ओह,इतनी कोमलता – मुझे मार ही न डाले
किन्तु जियूंगा मैं - इन सबके लिये
जन्म-जन्मान्तर बीत गए ...