धुन्ध का इंद्रजाल
इस हफ्ते के स्पॉट में सद्गुरु ने लिखी है एक कविता - धुंध का इंद्रजाल

पर्वतीय ओस की बूंदों का जादू
बूंदें हैं बड़ी नाजुक व लचीली,
लटकती पत्तियों की नोकों से,
त्रिन-त्रिन पर फिसलती हुई....
बूंदें - मकड़जाल पर झूलती हुई
जैसे हों दीप्तिमान हीरों का हार
इतना नाजुक हार जैसे कि हो अनश्वर..
सुन्दर इतना जैसा होता सिर्फ एक फन्दा ही;
फन्दा एक अभागे कीट के लिए,
किन्तु महल उस शानदार मकड़े का
जो बुनता है एक ब्रह्मांड, कुशलता का एक ताना-बाना
जो तय करता है ‘नियति’ उन दीन-हीन जीवों की,
जो हैं भोजन व क्रीड़ा की वस्तु
उस शानदार मकड़े की
जो करता है कुशल कारीगरी
अपनी अनेक टांगों से
उसके पंगु बनाने वाले खेल से
छलकती है उसकी तौहीनी
उन दीन-हीन द्विपादीय प्राणियों के प्रति
पंगु बनाने वाला वह खेल
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जिसमें मकड़ा अपने दश्पादों पर नाच नाच कर
बुनता है आकर्षक, आमंत्रित करता जाल
जाल – आशा व मृत्यु का
मृत्यु उनके लिए जो मृतक पर खाते हैं तरस,
जो नहीं समझते जीवन के बंधन और मृत्यु की आजादी को।
एक मात्र कोशिश जो करने योग्य है –
वो है मृत्यु, जिसके बाद न हो कोई पुनर्जन्म
ऐसी मृत्यु जो हो पूर्ण इतनी कि मुक्त कर दे
स्व-अस्तित्व की जरूरत से
जब हो जाओ तुम मुक्त , जाल बुनने की जरूरत से।
जाल बुनने वाला नहीं निकल सकता जाल से बाहर
फंसा रहता है वो भी अपने ही फंदे में।
सच है - फंदे बिना नहीं कुछ भी संभव
कार्य – पोषण – क्रीड़ा – कुछ भी नहीं,
तो बनाएं ऐसा फन्दा जो हो बना
हृदय के प्रेम, दर्द व परमानन्द के धागों से
फंदे की सज्जा न हो हीरे-जवाहरातों से
वरन परमानन्द की बूंदों से
जिन्हें महक पाएगा एक प्रेम-पूर्ण हृदय ही।
ऐसा फन्दा जो हो सराबोर जीवन-रस से इतना
कि बहा दे वह मृत्यु-भय को
जीवन का ऐसा सैलाब जो मृत्यु लांघकर
असीम को छूता हो – अभी और यहीं
ऐसा मधुर जीवन-जाल, जब तुम छोड़ो
तो जीवन-बूँदें न गिरें मृत्यु की ओर
वरन हो जाएं विलीन असीम में।
आंखों पर छाया धुंध बनाता है ऐसा ककून –
कि सुखदाई लगता है अंधापन -
फूल-पत्तियाँ, प्रकाश व परछाई –
सुन्दर व आकर्षक काया
इनका रूप व सौंदर्य ही है सब कुछ
धुंधली-दृष्टि पैदा करती ऐसी माया।
इस धुंध की ओट से होकर
या तो तुम जलो, झुलसो और रास्ता बनाओ
या
ओ मेरे प्रिय, कर लो इतना विश्वास,
स्वहृदय में निहारो मेरी आत्मा को,
प्रेम से थाम लो मेरा हाथ –
बन जाओ परमानंद की फुहार
बहा ले जाएगा यही तुम्हेँ असीम अनंत में...