ईशा लहर मार्च 2018 - अध्यात्म और विज्ञान का मिलन
ईशा लहर के मार्च अंक में हमने विज्ञान और योग के बीच की समानताओं की चर्चा की है। जानते हैं कि कैसे योग के अनुसार समय ही इस सृष्टि का मूल है, और कैसे आधुनिक विज्ञान की गुरुत्वाकर्षण तरंगे इस बात की पुष्टि कर रहीं हैं।

बाहरी और भीतरी प्रकृति को जानने, अनुभव करने और अपने लिए खुशहाली पैदा करने की इंसान की चेष्टा ने अध्यात्म और विज्ञान को जन्म दिया। भीतरी प्रकृति के मंथन से जहां अध्यात्म का जन्म हुआ, वहीं बाहरी प्रकृति पर शोध से विज्ञान ने जन्म लिया। हालांकि दोनों का लक्ष्य एक ही है, पर नजरिये और खोज के साधन अलग-अलग हैं।
इंसान की जिज्ञासा का कोई अंत नहीं है
विज्ञान से इंसान नई-नई तकनीकें बनाने लगा। इन तकनीकों की वजह से उसने कुछ हद तक बाहरी प्रकृति को अपने वश में कर लिया और उसका जीवन सुख-सुविधाओं से भर गया। इन्हीं तकनीकों से उसने कई यंत्र बनाये, जिन्होंने प्रकृति के सूक्ष्म आयामों तक उसे पहुंच दिलाई - उन आयामों की जानकारी दी, जिनके बारे में उसकी इंद्रियों को कोई बोध नहीं था। जिज्ञासावश, उसने कई ग्रहों और उपग्रहों की यात्रा की और ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने की कोशिश की। पर उसकी जिज्ञासा बुझी नहीं, रहस्य और अधिक गहराते गये... संयोगवश, जब इंसान अंदर की ओर मुड़ा और अपने अंतर में झांका तो उसे एक खास तरह की तृप्ति का एहसास हुआ। उसने अपनी भीतरी प्रकृति का मंथन किया। इस मंथन से अध्यात्म का उदय हुआ। उसने अपने अंदर यह स्पष्ट रूप से देखा कि उसका शरीर रूपी पिंड इस ब्रह्मांड का ही एक छोटा-सा नमूना है। अगर वह खुद को जान लेता है, तो ब्रह्मांड को भी जान जाता है, क्योंकि ब्रह्मांड उससे अलग नहीं है, उसी का विस्तार है। इस ज्ञान से वह तृप्त हो गया, उसके सारे संदेह मिट गये, अब रहस्य उसके लिए रहस्य नहीं रहे।
आध्यात्मिक यात्रा को खुद अनुभव करना होगा
अंतर्ज्ञान से इंसान को अपनी परिपूर्णता का एहसास हुआ। उसके भीतर ज्योति व शक्ति का संचार हुआ और उसका जीवन दिव्य हो गया। पर यह यात्रा व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित होती है, यह व्यक्तिपरक होती है। अपने भीतर की यात्रा खुद करनी पड़ती है। इसमें ऐसे मानक नियम या सूत्र नहीं होते, जिनको प्रयोगशाला में साबित किया जा सके। नतीजतन, जब भी किसी ज्ञानी ने इसकी व्याख्या करने की कोशिश की, लोगों को समझ में कम आया और भ्रांतियां ज्यादा फैल गईं, जिससे कट्टरपंथी पैदा हो गए। धर्म के नाम पर सबसे ज्यादा युद्ध हुए, करोड़ों लोगों की जिंदगियां तबाह हुईं और यह सिलसिला आज भी जारी है। दूसरी तरफ अपनी बेलगाम इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश में इंसान ने विज्ञान की नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल करके इस धरती का खूब दोहन किया। दोहन इस कदर हुआ है कि इससे हुए नुकसान की भरपाई करना एक बेहद कठिन कार्य है। आज विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। इनको एक दूसरे के सहारे की जरूरत है। मानवता के उज्ज्वल भविष्य के लिए दोनों को एक दूसरे का आलिंगन करना होगा। विश्व के कल्याण में विज्ञान तभी कारगर होगा, जब तकनीकों का इस्तेमाल पूरी जागरुकता में सचेतन होकर किया जाएगा। अध्यात्म इंसान को सच्ची खुशहाली तभी दे पाएगा जब हम अपनी रुढि़वादी मान्यताओं व विश्वास से ऊपर उठकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आत्मसात करें। विज्ञान और अध्यात्म के मिलन की शुभकामनाओं के साथ हम आपको भेंट कर रहे हैं यह अंक...
- डॉ सरस
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