ईशा लहर सितम्बर 2017 : बुद्धि वरदान या अभिशाप


सद्‌गुरुईशा लहर का सितम्बर अंक मन के अनेक पहलूओं पर प्रकाश डालता है। इस अंक में आप जान सकते हैं बुद्धि, चित्त, मानस, अहंकार – मन के इन चारों आयामों के बारे में …

 ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ – यह बात महज एक कहावत ही नहीं है, बल्कि पीढिय़ों के अनुभव से जन्मी ऐसी उक्ति है, जो शरीर के पर मन की ताकत को सहज ही समझा जाती है। जीवन के भौतिक कार्यों को करने में निस्संदेह हम अपने शरीर का ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वही भौतिक शरीर तब हमारा साथ नहीं देता, जब हमारा मन बहुत उदास होता है। दूसरी तरफ हर्ष और उल्लासभरा मन एक कमजोर और रुग्ण शरीर से भी कठिन कार्य करवा लेता है। मन की इस अद्भुत क्षमता का हम सब ने अपने जीवन में कभी न कभी अनुभव जरूर किया होगा।

एक बार एक अहंकारी राजा जंगल में शिकार करते हुए अपना मार्ग भटक गए। राजा बिल्कुल अकेले थे, तभी उनके सामने अचानक एक शेर आ गया। राजा घबरा गए और वहां से भागने लगे। भागते-भागते उन्हें एक कुटिया दिखाई दी, जहां एक साधु अपनी साधना में बैठे थे। राजा भागकर साधु के पैरों में गिर पड़े और बोले – ‘महात्मन, मुझे शेर से बचा लीजिए।’ साधु ने अपनी आंखें खोलीं और बोले, ‘हे राजन, आप एक शेर की ताकत से डर गए और आपने उस मन की ताकत को नहीं समझा, जो चालीस शेरों के बराबर होती है।’

आपको पता होगा कि पुराने समय में ‘मन’ को वजन की एक इकाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो चालीस सेर के बराबर होता था, और एक सेर लगभग 900 ग्राम के बराबर होता था। सौभाग्य से यह शक्तिशाली मन इस धरती पर सिर्फ एक ही प्राणी को मिला है, वह है मनुष्य। लेकिन आज मनुष्य अपने मन की इस शक्ति को ही नहीं समझ पा रहा है। क्योंकि वह न तो अपने शरीर के प्रति सचेतन है, न ही अपने मन के प्रति।

मन मानव जाति को मिला एक वरदान है, जिसे अपनी अज्ञानता की वजह से इंसान ने अभिशाप बना लिया है। मन के कई आयाम हैं, जैसे बुद्धि, अहंकार, मानस, चित्त आदि, जिनको अनुभव करने के लिए हमें अपनी चेतना को बढ़ाना होगा। अगर आपकी पहुंच मन के सबसे भीतरी आयाम – चित्त, तक हो गई, तो आप अपनी विशुद्ध चेतना के संपर्क में आ जाते हैं। फिर काफी हद तक आप अपने मन के स्वामी बन जाते हैं। इस बार के अंक में हमने इस जटिल मन के सारे आयामों को समेटने की कोशिश की है। मन को समझना, अपनी उच्चतर चेतना की दिशा में एक छोटा सा कदम हो सकता है। आप मन के विभिन्न आयामों को अनुभव करते हुए, अपनी चित्त के जरिए अपनी परम चेतना तक पहुंच सकें, इस कामना के साथ यह अंक आपको समर्पित है।

– डॉ सरस

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