ऐब्नॉर्मल बच्चे हैं या हमारा सिस्टम है?

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प्रश्न
मैं एक हाई स्कूल टीचर हूं और आपसे जानना चाहता हूं कि बच्चों के साथ कुछ गलत न कर बैठूं इसका मैं ख्याल कैसे रखूं और उनको प्रेरित कैसे करूं। मेरी क्लास के पचास फीसदी बच्चे रिटालिन गोली खाते हैं, क्योंकि उनको एडीडी(अटेंशन डेफिसिट डिसॉर्डर यानी एकाग्रता की कमी की समस्या) या एडीएचडी (‌अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिव डिसॉर्डर यानी अतिसक्रियता के साथ एकाग्ररता की समस्या) बताया गया है। इस बारे में आपकी क्या सलाह है?

सद्‌गुरु
इतने सारे डाक्टरों, मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों के बीच मुझे नहीं लगता कि आजकल कोई ‘नॉर्मल’ बच्चा पैदा भी हो रहा है। आजकल बच्चे ‘सामान्य’ हैं ही नहीं, क्योंकि वो कुछ भी करें एक ठप्पा उनके लिए तैयार है। अगर वे खूब सक्रिय हो कर धमाचौकड़ी करते रहते हैं, तो उन पर अतिसक्रिय या हाइपरएक्टिव होने का ठप्पा लगा दिया जाता है – एडीएचडी। अगर वे थोड़े आराम से काम करते हैं, तो उनको कुछ और नाम दे दिया जाता है। वे चाहे जैसे हों एक ठप्पा उन पर लगा दिया जाता है, बल्कि जोर से ठोक दिया जाता है, जिसे वे पूरी जिंदगी छुड़ा नहीं पाते। कोई तेज दौड़ सकता है, कोई लंगड़ाता है, कोई कुछ और करता है – यह सब सामान्य है। इंसान ऐसे ही तो होते हैं। वे असामान्य सिर्फ इसलिए लगते हैं, क्योंकि हम उन सभी को एक ही खांचे में फिट करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह तो आपके सफर के बैग जैसी बात हो गई। एयरपोर्ट पर उनके पास मापने का जो साधन होता है, उसमें आपके बैग को फिट होना पड़ता है; फिट नहीं हुआ, तो कुछ एयरलाइन आपको बैग साथ नहीं ले जाने देते। शायद ही किसी का बैग उसमें फिट होता हो; वैसे मुझे यकीन है कि आतंकी जरूर सही साइज का बैग लाते हैं। पर आम यात्रियों के बैग इसमें फिट नहीं होते, क्योंकि सफर पर जाते वक्त लोगों को कई चीजों की जरूरत पड़ती है – छोटी–मोटी ना जाने कितनी चीजें, उपर से कुछ-कुछ खरीद भी लेते हैं– इस तरह बैग फूलता जाता है और फिट नहीं होता। तो फिर ये तमाम लोग असामान्य हुए।

चूंकि हम हर किसी को एक जैसी स्कूली पढ़ाई दे रहे हैं, इसलिए हम सोचते हैं कि हर किसी को डाक्टर, इंजिनियर या ऐसा ही कुछ बनना होगा। बेचारे बच्चे कैसी यातना भुगत रहे हैं!

क्या आपने कोई आम का पेड़ देखा है, जो हर तरह से ठीक हो? इसी तरह क्या आपने कोई ऐसा इंसान देखा है, जो हर तरह से ठीक और पूरा हो? अगर वे मशीन से बने हुए न हों, तो फिर आप जिसे परिपूर्ण कह सकें ऐसा होने का सवाल ही नहीं उठता। हर तरह से पूरे होने की हमारी सोच कितनी उलझी हुई है! हमारी सोच ये हो गई है कि अगर हम हर किसी को एक ही खांचे में फिट कर सकें, तो वे हर तरह से ठीक और पूरे हैं। चूंकि हम हर किसी को एक जैसी स्कूली पढ़ाई दे रहे हैं, इसलिए हम सोचते हैं कि हर किसी को डाक्टर, इंजिनियर या ऐसा ही कुछ बनना होगा। बेचारे बच्चे कैसी यातना भुगत रहे हैं! इसी वजह से लगता है मानो किसी को एडीडी है और किसी को एडीएचडी। वरना इनमें से हर बच्चा कुछ-न-कुछ करने के काबिल है। कुछ तो शायद बस यूं ही खुशी में इतने मगन हो जाएं कि हो सकता है वे कुछ भी न करें।

कभी जंगल के हिरण को ज़रूर देखिए। सुबह लगभग साढ़े आठ बजे यहां आपको हिरणों के झुंड दिखाई देंगे। बड़े आराम से वे चरते हैं, दौड़ते-भागते और उलांचे भरते हैं, पर काम कुछ नहीं करते। बैलगाड़ी खींचता हुआ बैल उनको देख कर कहेगा, ‘ये फालतू और निकम्मे हिरण कुछ भी नहीं करते’। क्या करें? हाथी भी तो कुछ नहीं करता। वह उलांचे नहीं भरता, बस सामने आई हर चीज को गुस्से से उलट-पुलट देता है। ठीक ही तो है। उनको ऐसा ही होना चाहिए। बदकिस्मती से हम सब एक मशिनी समाज बना रहे हैं। हमें अब इंसानों की जरूरत नहीं; हमें नटों व- बोल्टों की जरूरत है जो हमारे बनाये गये ढांचे में फिट हो जाएं। हम कुछ हद तक कामयाब हो गये हैं, क्योंकि हमारे पास बहुत-सारे ‘नट’ हैं।

इस कारण से हर कोई असामान्य लगता है। जिन पचास फीसदी लोगों को आप असामान्य समझ रहे हैं, शायद वही सामान्य इंसान हैं। बाकी पचास फीसदी लोग मशीन बन गए हैं। मैं ऐसी बढ़ी-चढ़ी राय नहीं देना चाहता, मगर दुर्भाग्य से हम इसी रास्ते जा रहे हैं। हम जीने के बारे में नहीं, सिर्फ उत्पादकता की सोच रहे हैं, इसलिए हम ऐसी मशीनें बनाने में लगे हुए हैं, जो उत्पादन को और बढ़ा सकें। इसलिए अगर कोई भी मशीन अगर उतना उत्पादन नहीं कर पाती जितना आप सोचते हैं, तो अचानक वह असामान्य लगने लगती है। जरूरी तो नहीं कि हम सबमें बराबर की काबिलियत हो। कुछ चल सकते हैं, कुछ रेंग सकते हैं और कुछ उड़ सकते हैं; ठीक ही तो है। हम यह बेकार का फितूर क्यों पाले हुए हैं कि अगर कोई कम-से-कम इतना कर लेता है, तो वह एक सामान्य इंसान है? यह सीमा तय करना जरूरी नहीं है। एक बच्चे पर किसी तरह का ठप्पा लगा देना एक  गुनाह है, क्योंकि उस बेचारे को तो पता ही नहीं कि आप कौन-सा वाहियात खेल खेल रहे हैं, और उस पर कोई ठप्पा लग गया, तो जिंदगी भर उस पर लगा रहेगा। आप दरअसल अपने बच्चे को पड़ोसी के बच्चे के साथ तौल रहे हैं।

दरअसल हमें इंसानी शरीर और इंसानी दिमाग का उसकी पूरी काबिलियत तक विकास करना होगा और साथ ही उसके सही इस्तेमाल के लिए जरूरी संतुलन भी बनाना होगा।

हमारी शिक्षा व्यवस्था रातों रात तो बदलने वाली नहीं है, लेकिन फिलहाल कम-से-कम आप तो अपने बच्चों पर लेबल लगाना छोड़ सकते हैं। ठीक है कि वह वो काम नहीं कर पाता जो दूसरे कर लेते हैं। आप नहीं जानते कि वह क्या कर सकता है। मैं एक बात बताना चाहूंगा। अमेरिका से कुछ डाक्टर आए। वे मैसूर में थे और मुझे बताए बगैर उन्होंने मेरे पिता जी से मिलने का फैसला कर लिया। ये डाक्टर अपने गुरु के उन दिनों के बारे में जानने को उत्सुक थे, जब वे गुरु नहीं थे। मेरे पिताजी की नजरों में कामयाबी का मतलब था डाक्टर बनना। पूरी जिंदगी उनका बस एक ही सपना था कि डाक्टर बनना है और वे डाक्टर बन गये। उनका सपना था कि उनके चारों बच्चे भी डाक्टर बन जाएं। पर एक-एक कर के सबने उनका सपना चूर कर दिया; मैं उनकी आखिरी उम्मीद था। मैं जब ग्यारह-बारह साल का हुआ, तो मैंने एलान कर दिया, “ऐसा किसी हाल में नहीं हो सकता।”  अमेरिकी डॉक्टरों ने मेरे पिताजी से पूछा, ‘हमें सद्गुरु के बचपन के बारे में कुछ बताइए।’ मेरे पिताजी थोड़ा सोच कर बोले, ‘वह तो बड़ा ढीला और सुस्त दिमाग का बच्चा था। लेकिन अब वह एक जीनियस बन गया है।’

हो सकता है आपकी क्लास में पचास फीसदी बच्चे जीनियस हों और आप इस सच को नहीं देख पा रहे हों। वे ‘ए’ और ‘बी’ के जोड़ से ‘सी’ बनाने के आपके  तरीके को समझ नहीं सकते। यह उनकी समझ के बाहर है। उनके लिए इसका कोई मतलब भी नहीं है। भला ‘ए’ और ‘बी’ का जोड़ ‘सी’ के बराबर क्यों है? सिर्फ इसलिए कि ऐसा कोई कह रहा है? संभव है वह इस बात में अपना दिमाग न लगा पाए, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसके दिमाग के भीतर क्या हो रहा है! आप नहीं जानते वह क्या देख रहा है। अगर आप उसे उन चीजों के लिए लताड़ कर शर्मिंदा कर देते हैं जो वह नहीं देख पाता, तो वह उन चीजों के बारे में कभी आपसे कुछ नहीं कहेगा जो वह देख पा रहा है। आप नहीं जानते कि ऐसा कर के आप क्या खो रहे हैं। हो सकता है वह ऐसी चीज देख रहा हो, जो आज तक किसी ने नहीं देखा हो।

इंसान का विकसित दिमाग इतना कुछ कर सकता है, जो शायद शिक्षा कभी न कर पाए। क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि हमें शिक्षा की जरूरत ही नहीं है? नहीं, ऐसा नहीं है। दरअसल हमें इंसानी शरीर और इंसानी दिमाग का उसकी पूरी काबिलियत तक विकास करना होगा और साथ ही उसके सही इस्तेमाल के लिए जरूरी संतुलन भी बनाना होगा। प्रश्न उठ सकता है कि किस काम में इस्तेमाल के लिए? जरूरी नहीं कि यह किसी खास काम के लिए हो। अगर इंसान ठीक-ठाक होशो-हवास में चले, सचेत हो कर जिंदगी जिए तो काफी है। जिंदगी का मकसद महज जिंदगी है। जिंदगी को उसके सारे पहलुओं में महसूस करने में ही जीवन की तृप्ति है। यह तभी संभव हो पाएगा जब हम शिक्षकों या पुरोहितों, पंडितों या पोथियों की उन हिदायतों और कट्टर विचारों को वैसे ही नही मान लेंगे जैसे दूसरे मानते आ रहे हैं, बल्कि सच की तलाश करेंगे। 

प्रेम व प्रसाद,

 

Honza Soukup @flickr

 


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