आध्‍यात्‍िमक खोज : बचपन में हुआ मृत्यु से सामना

आधी रात – सद्‌गुरु के साथ

इस अंक से हम शुरु कर रहे हैं एक धारावाहिक  ‐ ‘आधी रात – सद्‌गुरु के साथ’ जो मशहूर अंग्रजी पुस्तक ‘मिड्नाइट विद द मिस्टिक’ का हिंदी अनुवाद है। इस अंग्रेजी पुस्तक की लेखिका हैं इंग्लैंड में जन्मी और अमेरिका में पली-बढ़ी शेरिल सिमोन। उत्सुक व खोजी स्वभाव वाली शेरिल एक आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं। तीस साल की खोज के बाद उनकी मुलाकात एक दिन सद्‌गुरु से होती है। अमेरिका में एक झील के किनारे आधी रात में जलती अलाव के सामने उन्होंने सद्‌गुरु से सात रातों तक  कई ज्वलंत प्रश्न पूछे जिसका सद्‌गुरु ने बहुत विस्तार में उत्तर दिया और अंतत: इस चर्चा ने एक पुस्तक का रूप ले लिया। पेश है उसका पहला अंश…

बचपन से रही सत्‍य को जानने की इच्‍छा

जब से मैंने होश संभाला है मैं जिज्ञासु ही रही हूं। उस समय मुझे पता नहीं था। सोचती थी मुझमें सिर्फ  जानने की ललक है। एक बच्ची होने के बावजूद मुझे यह गवारा नहीं होता था कि जिन सवालों को मैं एकदम बुनियादी मानती हूं मुझे उनका जवाब भी नहीं मालूम। हम कहां से आये हैं? हम यहीं क्यों आये हैं? एक बीज से कोई पेड़ कैसे उग जाता है और किसी पेड़ पर कोई बीज कैसे आ जाता है? कुछ नहीं होने पर भी उसमें से कोई चीज कैसे तैयार हो जाती है? आगे चल कर सवाल और गहराने लगे। मौत के बाद क्या होता है? क्या कोई ईश्वर या सृजक है? मेरे अस्तित्व का वास्तविक रूप क्या है? मैं जीवन के सारे रहस्य उजागर करना चाहती थी।

शेरिल के बचपन के दिन

कुछ पल बातें करने के बाद वे मुझे उसके सोने के कमरे में ले गये। एक मृत व्यक्ति के कमरे में जा कर कुछ अजीब-सा लग रहा था। मैंने शेल्फ  पर उसके खिलौनों, गुडिय़ों, तथा गेम्स को सलीके से रखा हुआ देखा। उसकी आलमारी का दरवाजा खुला हुआ था मानो उसने स्कूल जाने के लिए अपनी ड्रेस निकाली हो।
मैं लेक्सिंग्टन, मैसाच्युसेट्स (न्यू इंगलैंड) में पली-बढ़ी थी, एक खूबसूरत ऐतिहासिक शहर, उपनिवेशों के वास्तुशिल्प वाला जहां सडक़ से थोड़ी दूर विशाल, हरे-भरे लॉन पर घर बने होते थे। यह धनी बच्चों वाला एक धनी शहर है और यहां के स्कूलों में शिक्षा की एक पुरस्कृत और प्रगतिशील पद्धति है। मेरे पिता एक सफ ल उद्यमी और कारोबारी थे, मेरी मां घर संभालती थी। लेक्सिंग्टन के स्कूल प्रांत में सबसे अच्छे माने जाते थे। मेरे पिता के यहां रहने का फैसला करने के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था। जो लोग अपने बच्चों को निजी बोर्डिंग स्कूलों में नहीं भेजना चाहते थे वे लेक्सिंग्टन में रहते थे। हार्वर्ड के कई प्रोफेसर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और डॉक्टर यहां रहते थे। यह न्यू इंग्लैंड का एक सुंदर ऐतिहासिक शहर है, खूबसूरत और सुरक्षित।

मौत से पहला सामना

मौत से मेरा पहला सामना तब हुआ जब मैं पहली कक्षा में थी (लेक्सिंग्टन आने से पहले, जब हम मैसाच्युसेट्स के माल्डेन में रहते थे)। मुझे याद है वह वसंत ऋतु की गुनगुनी धूप वाला खुशनुमा दिन था। जाड़े के लंबे मौसम के बाद एक नयी मौसमी शुरुआत से मन बल्लियों उछल रहा था, तभी एकाएक प्रिंसिपल साहब हमारे कमरे में आ धमके और हमारी सारी खुशी काफूर हो गयी। उन्होंने बड़ी संजीदगी से सबको बताया कि हमारी कक्षा की एक छात्रा की मृत्यु हो गयी है और वह कभी इस दुनिया में वापस नहीं लौटेगी। उस समय मैं जानती ही नहीं थी कि मृत्यु का क्या अर्थ होता है। मुझे याद है उस समय मेरे मन में कई सवाल उठे थे, ‘उसकी मृत्यु हो गयी’ का क्या मतलब है? वह कहां गयी होगी? उसे इस तरह एकाएक यहां से कैसे ले गये होंगे? वह हमेशा के लिए कैसे चली गयी? ये सब सवाल मुझे खाये जा रहे थे। कोई भी, और-तो-और मेरे माता-पिता भी (जिनको लेकर मैं सोचती थी कि उनको सब-कुछ पता होना चाहिए था), मेरे इन सवालों का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पा रहे थे।

मृत लड़की के माता पिता से मुलाक़ात

किसी तरह और मुझे नहीं मालूम किस तरह, क्योंकि वह जगह हमारे घर से और जिस इलाके में घूमने-फि रने की मुझे इजाजत थी (मुझे सिर्फ  उतने ही क्षेत्र में रहना पड़ता था जिसके अंदर मुझे अपनी मां की शर्मिंदा करनेवाली कान-फाडू सीटी की आवाज सुनाई पड़ सके), उससे बाहर बहुत दूर थी, मैं उस स्वर्गवासी लडक़ी के घर पहुंच गयी। वह कोने के एक विशाल प्लॉट में बना न्यू इंग्लैंड शैली का पारंपरिक दोमंजिला मकान था। मैंने एक लड़कियों वाली साइकिल को मकान की दीवार पर टिका देखा। मैंने सोचा शायद यह उसी की साइकिल है। उसके माता-पिता दोनों घर पर ही थे। इससे मुझे हैरत हुई, क्योंकि मेरे पिता कभी भी दिन में घर पर नहीं होते थे। उन्हें भी मुझे देख कर अचरज हुआ पर उन्होंने मुझे अंदर बुला लिया। कुछ पल बातें करने के बाद वे मुझे उसके सोने के कमरे में ले गये। एक मृत व्यक्ति के कमरे में जा कर कुछ अजीब-सा लग रहा था। उसके कमरे का रंग सफेद था, उसके बिस्तर पर गुलाबी रंग की चादर थी और दरवाजे-खिड़कियों पर मेल खाते सफेद-गुलाबी पर्दे लगे हुए थे। मैंने शेल्फ  पर उसके खिलौनों, गुडिय़ों, गेम्स तथा स्टफ्ड एनिमल्स को सलीके से रखा हुआ देखा। उसकी आलमारी का दरवाजा खुला हुआ था मानो उसने स्कूल जाने के लिए अपनी ड्रेस निकाली हो।

मृत्यु ने उलझन में डाल दिया

मैंने वहां खड़े-खड़े उसके माता-पिता से वो सारे सवाल पूछ डाले जो मेरे मन में कौंध रहे थे। उसे क्या हुआ और वह कहां चली गयी, इस बारे में वे मुझे जरूर कुछ बता सकेंगे। आखिर वे उसके मां-बाप थे। याद नहीं मैंने उनसे क्या-क्या पूछा और उन्होंने मुझे क्या-क्या बताया। बस मुझे सिर्फ इतना याद है कि वे मेरे साथ बड़ी अच्छी तरह पेश आये थे और और मेरा वहां आना उन्हें अच्छा लगा था। पर ऐसा लग रहा था मानो उस घर की कोई महत्वपूर्ण चीज खो गयी है। जैसे कि घर में एक बहुत बड़ी कालकोठरी बन गयी हो। जब मैंने वहां से चलने की कोशिश की तो मुझे लगा मानो उसके माता-पिता मुझे अपनी तरफ  खींच रहे हों। वे मुझे वहां रोके रखने की तरह-तरह से कोशिश कर रहे थे। कभी कहते बेटा, ये खा लो, ये पी लो न, थोड़ी देर टेलीविजऩ देख कर मन क्यों नहीं बहला लेती! मुझे उनके लिए बहुत दुख हो रहा था लेकिन अंधेरा होने को था और यदि मैं घर न पहुंचती तो भारी मुसीबत में पड़ जाती। वहां मुझे कोई जवाब नहीं मिला, मिला तो सिर्फ  एक गहरा खालीपन और बहुत-कुछ खो देने के अंतहीन दुख का ऊंचा पहाड़।

अंग्रेजी पुस्तक ‘मिड्नाइट विद द मिस्टिक’ का अंश… जारी


संबन्धित पोस्ट


Type in below box in English and press Convert



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *