भाव स्पंदन कार्यक्रम – दिखाये उस पार की झलक

भाव स्पंदन

आध्यात्म के मार्ग पर होने वाले अनुभव साधकों के भीतर गहरे परिवर्तन ला सकते हैं। ईशा के कार्यक्रमों में से एक प्रमुख कार्यक्रम – भाव स्पंदन साधकों को ऐसा ही एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव पाने का मौका देता है। आज के ब्लॉग में जानते हैं इस कार्यक्रम के बारे में, और सुनते हैं एक प्रतिभागी के भाव स्पंदन के निजी अनुभव ‌- 

एक बार देख लेने पर वह जान लेता है कि – उसे एक दिन दीवार फांद के दूसरी तरफ जाना ही है, यह देखने के लिये कि वहां क्या है।
भाव स्पंदन कार्यक्रम चार दिन और तीन रात का आवासीय कार्यक्रम है। यह उनके लिए है, जो किसी एक प्राथमिक कार्यक्रम – ‘इनर इंजिनियरिंग’ या फिर ‘ईशा योग कार्यक्रम’ (हिन्दी या तमिल) में भाग ले चुके हैं’। इस ध्यान कार्यक्रम को सद्‌गुरु ने डिजाइन किया है। यह ध्यान कार्यक्रम अगले स्तर का है, जो लोगों को एक ऐसा अवसर देता है, जहां वे शरीर और मन की सीमाओं से परे, चेतना के ऊंचे आयामों का अनुभव करते हैं। भाव स्पंदन कार्यक्रम में असीम प्रेम और आनंद का अनुभव किया जा सकता है।

सद्‌गुरु कहते हैं, ‘योग की सारी प्रक्रिया अपनी ऊर्जा को इस तरह तीव्र बनाने के लिए है। जिससे आपकी उर्जा धीरे-धीरे आपकी शारीरिक सीमाओं को लांघकर आपको उससे परे का अनुभव कराए। ईशा योग कार्यक्रम आपके मन को तैयार करता है। क्रिया और आसन आपके शरीर और ऊर्जा को तैयार करते हैं, ताकि आप अपनी शारीरिक सीमाओं से परे देख सकें, और सबको अपने एक हिस्से के रूप में स्वीकार कर सकें। यह सिर्फ एक तैयारी है, ताकि जब ऊर्जा जागृत होने लगे, तब मन रुकावट पैदा न करे। इस तरह से यह अभ्यास धीरे-धीरे आपका विकास करेगा।

भाव स्पंदन इस दिशा में एक उल्लास से भर देने वाला अनुभव है। हम इसके द्वारा लोगों को बहुत शक्तिशाली अनुभव से गुजारते हैं, ताकि आगे चलकर यह उनकी आध्यात्मिक खोज का आधार बने। भाव स्पंदन ऐसा है, जैसे किसी को ऊपर उछाल कर दीवार के पार दिखालाया जाये। वह अपनी क्षमता से परे को अनुभव करता है। एक बार देख लेने पर वह जान लेता है कि – उसे एक दिन दीवार फांद के दूसरी तरफ जाना ही है, यह देखने के लिये कि वहां क्या है।’ 

भाव स्पंदन का एक अनुभव:

पहली बार अहसास हुआ कि किस तरह मैंने अपने आप को खुद की बनी सीमाओं में ही बांध रखा है।
जुलाई 2010 में भाव स्पंदन कार्यक्रम में भाग लेने के बाद मेरे जीवन को एक नई दृष्टि मिली। अभी तक आनंद परमानंद जैसे शब्द जो सिर्फ सुने थे, उनका अनुभव किया। वह कुछ और ही अनुभव था, न खुशी न गम… एक अलग तरह की अनुभूति थी वह, जिसमें आंखों से आंसू बह रहे थे और रोम-रोम झूम रहा था। कुछ पल तो ऐसा लगा कि मानो मैं कोई सपना देख रही हूँ। ऐसा लगा कि जैसे कोई बांध टूट गया… पहली बार अहसास हुआ कि किस तरह मैंने अपने आप को खुद की बनी सीमाओं में ही बांध रखा है।

लेकिन सबसे अनूठा पल वह था, जब मैंने अपने सामने खड़ी एक महिला को अपने हिस्से के रूप में अनुभव किया। ये तर्क नहीं… जीवित अनुभव है…. जैसे जैसे कार्यकम आगे बढ़ा, सिर्फ वह महिला ही नहीं हरेकचीज… पेड़, फूल, जमीन, दीवारें सब कुछ मुझे अपने ही हिस्से महसूस होने लगे। इस अनुभव के बाद जीवन के हर पल में एक नई उमंग है, ऊर्जा की एक नई तरंग है…

आंचल मोरे, मुम्बई


संबन्धित पोस्ट


Type in below box in English and press Convert



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *