ईशा लहर अप्रैल 2018 – कैसे तय करें अपना धर्म और कर्म?
ईशा लहर के अप्रैल अंक में हमने धर्म और अधर्म के बीच के फर्क की चर्चा की है। सद्गुरु बताते हैं कि धर्म का असली अर्थ उस तरीके से जीवन जीना है, जो हमें अपनी परम प्रकृति के पास ले जाए। और अगर हम अपना कल्याण चाहते हैं तो हमें अपना धर्म तय करना बहुत जरुरी है। पढ़ते हैं इस माह का सम्पादकीय स्तम्भ...

धर्म एक भीतरी प्रक्रिया है
समाज में धर्म पर निरंतर चर्चाएं होती रहती हैं। जब हम धर्म की बात करते हैं, तो इसे धर्मग्रंथों से, महापुरुषों से जोड़कर देखा जाता है। पर धर्म, धर्मग्रंथों या महावाक्यों का विषय नहीं है, यह एक आंतरिक प्रक्रिया है। धर्म हमेशा व्यक्तिगत होता है। व्यक्ति का धर्म उसकी आंतरिक स्पष्टता की उपज होता है। जब हम स्वयं के करीब पहुंचते हैं, तो उस निकटता में एक तरह की स्पष्टता पैदा होती है और तब यह बोध होता है कि एक इंसान के रूप में हमें जीवन में क्या करना है, कैसे आगे बढ़ना है। और यही बोध हमारा धर्म बन जाता है। जैसे ही हमें अपने धर्म का बोध होता है, अपने कर्मों को लेकर हमारे अंदर स्पष्टता आ जाती है। इंसान के धर्म और कर्म उसके स्वभाव व क्षमता से गहराई में जुड़े होते हैं। हमारा धर्म हमें एक स्पष्ट दिशा देता है, हमें जीवन के चक्रों में उलझने से बचाता है। जब बिना उलझे, स्पष्टता के साथ हम एक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो जीवन में तृप्ति और आनंद का एहसास होता है। आनंद और तृप्ति का यह एहसास हमें जीवन के परम धर्म - परम मुक्ति की ओर अग्रसर करता है।
हर इंसान के लिए एक धर्म
हमें अपने जीवन में कई तरह की मुश्किलों, भ्रम और भटकन का सामना करना पड़ता है। इंद्रियों की प्रकृति कुछ ऐसी होती है कि ये सांसारिक विषय-वस्तुओं में लिप्त रहना चाहती हैं, ये लोभ, मोह, मद, काम, क्रोध इत्यादि में बेबस हो उलझ जाती हैं। इस सांसारिक भंवर में फंसकर इंसान कई बार असहाय होकर बिखर जाता है। इसीलिए हर इंसान को एक धर्म की जरूरत होती है। अपने धर्म के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण हमें जीवन के हर मोड़ पर, हर तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए दृष्टि और सामर्थ्य देता है। जब तक इंसान अपने धर्म की डोर नहीं पकड़ लेता, वह निखरता नहीं है, उसका जीवन कभी पूर्ण रूप से खिलता नहीं है। इस कामना के साथ कि आप भी अपने धर्म को समझकर अपने कर्मों की दिशा सुनिश्चित कर सकें, धर्म के विभिन्न आयामों को समेटता यह अंक हम आपको समर्पित करते हैं।
- डॉ सरस
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