ईशा लहर का यह जनवरी अंक खेल और अध्‍यात्‍म पर आधारित है। इस ब्लॉग में प्रस्तुत है जनवरी अंक की कुछ झलकें – चित्रों और सम्पादकीय स्तंभ के माध्यम से:

आइए जीवन को खेलें

जीवन में कभी झुलसाते थपेड़ों से बेहाल होकर तो कभी सृष्टि के अनूठे सौंदर्य से अभिभूत होकर हमारे मन में कई गूढ़ सवाल उठते हैं, जैसे - ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई? जीवन का मकसद क्या है? क्या ईश्वर का अस्तित्व है? आदि। और तब हमें किसी ऐसे शख्स की जरूरत महसूस होती है जो इनका सही-सही जवाब देकर हमारे मन की गुत्थियों को सुलझा दे।

एक ऐसे ही प्रश्न के उत्तर में रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि ईश्वर ने संसार की रचना खेल-खेल में की। साधकों की एक मंडली ने जब सदगुरु से यह जानना चाहा कि भगवान ने यह सृष्टि क्यों बनाई तो सदगुरु मुस्कुराए और बोले, ‘एक दिन भगवान के पास करने के लिए कोई काम नहीं था। इसलिए वे कंचों से खेल रहे थे। तब एक कंचा इधर की तरफ गिर पड़ा और वह पृथ्वी बन गया। दूसरा कंचा इस पृथ्वी को छू कर ऊपर उछला और वो सूरज बन गया। एक और छोटा-सा कंचा चांद बन गया और कई दूसरे कंचे जिन पर वे नियंत्रण खो बैठे, वे आकाश में तारे बन गए।’ यह कहकर सदगुरु हंसने लगे।

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हमारे ग्रंथों में लिखा है, ‘ईश्वर अकेला था। एक दिन वह अपने अकेलेपन से ऊब गया और सोचा कि अब मैं जरा खेलूं। और फिर उसने खेल-खेल में ही इस सृष्टि की रचना कर दी।’

ग्रंथों और गुरुओं ने हमेशा सृष्टि की रचना को खेल की उपमा देकर समझाया। भले ही यह तथ्य न हो, परंतु यह सत्य है। सृष्टि की रचना को समझाने के लिए खेल की उपमा सबसे सटीक है। क्योंकि खेल और अध्यात्म दोनों बहुत गहराई में जुड़े हैं।

अध्यात्म क्या है? आइए जरा गौर करें। अध्यात्म हमारा वह आयाम है जो आनंदपूर्ण होता है, जहां कोई भेद-भाव नहीं होता, जो भूत व भविष्य से बेपरवाह है, जिसमें एक बेफि क्री और मस्ती होती है। खेल भी बहुत कुछ ऐसा ही है। हम खेलते ही इसलिए हैं, क्योंकि उसमें आनंद है। एक तरह की बेफि क्री और मस्ती भी है। ऊंच-नीच, धर्म, संप्रदाय और रंगों का कोई भेद-भाव नहीं होता। चूंकि खेल के मैदान में सबकुछ दांव पर लगा होता है, इसलिए भूत व भविष्य की परवाह नहीं होती। आध्यात्मिक उसे माना जाता है जो बाहरी परिस्थितियों से अछूता अपने अंदर समभाव की स्थिति में होता है। एक कुशल खिलाड़ी वह है जो हार व जीत की परवाह किए बिना अपने खेल में मशगूल होता है।

जीवन के थपेड़ों से झुलसकर इंसान गंभीर हो जाता है, अपनी जीवंतता खो देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि वह अपने विचारों, सिद्धांतों और नैतिकताओं का गुलाम बन जाता है। अपने मन की तुच्छ कल्पनाओं में खोकर विशाल सृष्टि के सान्निध्य से वंचित रह जाता है। अगर जीवन को हम खेल मानकर उसमें एक खिलाड़ी की तरह भाग लें तो जीवन सहज व जीवंत हो उठता है और सृष्टि व सृष्टा से हमारा तालमेल हो जाता है। अगर आप रोजाना अपने काम में कुछ घंटे खेलपूर्ण रहने की कोशिश करें तो पाएंगे कि विचार में स्पष्टता आती है, भावनाएं सुखद हो जाती हैं और शरीर बेहतर तरीके से काम करने लगता है, जिससे ध्यान एक कुदरती प्रक्रिया बन जाती है। जब आप क्रीड़ापूर्ण होकर काम करते हैं तो उसमें उलझते नहीं, जब आप उलझते नहीं तो कर्म संचित नहीं होता और जीवन की प्रक्रिया मुक्तिदायक बन जाती है। अब आप जो भी काम करते हैं वह कर्म नहीं, योग बन जाता है। जब हम दिनभर योग में स्थित होकर काम करने लगते हैं तो जीवन सहज, जीवंत और प्रवाहमय हो जाता है।

नूतन वर्ष आपके आंगन में चरण रख चुका है। इसके स्वागत में, बल्कि इसके साथ खेलने के लिए आप खुद को पूरी तरह तैयार कर पाएं, इसी सोच के साथ हमने इस अंक में आलेखों को सजाया है। विश्वास है आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी। आपके जीवन में एक बेफि क्री हो, आप पूरी तरह अपने जीवन को खेल के रूप में जी पाएं। नववर्ष की इन्हीं शुभकामनाओं के साथ यह अंक हम आपको सौंपते हैं।

 

-- डॉ सरस

 

 
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