भारत सरकार ने आदियोगी को ‘अतुल्य भारत’ का हिस्सा बनाया
भारत सरकार ने आदियोगी को अतुल्य भारत स्थानों की सूचि में शामिल कर लिया है। जानते हैं आदियोगी की विशेषता और प्रभाव के बारे में।
पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार ने, कोयंबटूर में ईशा योग केंद्र में स्थित आदियोगी की 112 फीट ऊँची भव्य आकृति को ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ (अतुल्य भारत) के डेस्टीनेशन(स्थान) के तौर पर शामिल किया है। ‘आदियोगी के भव्य चेहरे में शांति, जीवंतता और मादकता एक साथ दिखाई देती है। अब उसे भी ‘अतुल्य भारत’ अभियान का हिस्सा बना दिया गया है। इस प्रसंग (प्रोजेक्ट) से जुड़े सभी लोगों को हार्दिक बधाई।’ सद्गुरु ने अपने ताज़ा ट्वीट में यह जानकारी दी।
इससे पहले गिनीज़ बुक में आदियोगी को स्थान मिल चुका है
इस महत्वपूर्ण आकृति को ‘अतुल्य भारत’ की सूची में स्थान मिलना कोई पहली ऐसी घटना नहीं है, इससे पहले मई 2017 में, इसे दुनिया की सबसे विशालतम अर्ध प्रतिमा के रूप में, ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में भी शामिल किया जा चुका है। इस प्रतिमा को इस तरह बनाया गया है कि इसे बहुत कम रख-रखाव की ज़रूरत पड़ती है। आदियोगी को बनाने का मक़सद केवल यह नहीं था कि एक प्रतिमा बनाई जाए। हम योग विज्ञान के माध्यम से, आत्म रूपांतरण के लिए एक प्रेरक बल का निर्माण करना चाहते थे। आदियोगी के महत्व के बारे में बताते हुए सद्गुरु ने कहा, “यह ज़रूरी है कि इस धरती पर अगली पीढ़ी विश्वासियों की नहीं, बल्कि खोजियों की हो। जो दर्शन, विचारधाराएँ और मत, तर्क और वैज्ञानिक प्रामाणिकता(वैज्ञानिक प्रूफ) की कसौटी पर खरे नहीं होंगे, वे आने वाले दशकों में ख़ुद ही ख़त्म हो जाएंगे। और तब मुक्ति की चाह तेज़ हो जाएगी। जब वह चाहत बढ़ने लगेगी, तो आदियोगी और योग विज्ञान और भी महत्वपूर्ण हो जाएंगे।”
आदियोगी का विज्ञान
यौगिक परंपरा में, आदियोगी को योग का स्त्रोत माना जाता है। पंद्रह हजार साल से भी पहले, सभी धर्मों से भी पहले, वे पहले योगी थे जिन्होंने अपने सात शिष्यों, जिन्हें सप्तर्षि कहा जाता है, को योग विज्ञान का ज्ञान सौंपा। उन्होंने ऐसे 112 तरीक़े दिए, जिनके ज़रिए इंसान अपनी सीमाओं से उठ कर, परम स्वभाव तक पहुँच सकता है। आदियोगी के अद्भुत मुख के साथ ही योगेश्वर लिंग की स्थापना की गई है। इस ऊर्जा रूप की प्रतिष्ठा, महाशिवरात्रि 2017 से ठीक पहले, सद्गुरु द्वारा की गई थी। आदियोगी के आसपास लाखों की संख्या में लोगों के बैठने और ध्यान करने के लिए पर्याप्त जगह है। यह स्थान आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह 11 डिग्री के अक्षांश(लेटीट्यूड) पर स्थित है - यह भौगोलिक स्थिति, आध्यात्मिक साधना करने वालों के लिए बहुत ही सहायक मानी जाती है।
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