शारीरिक संबंध – एक से ही क्यों?

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सद्गुरुसमाज में वैवाहिक रिश्ते से बाहर के संबंधों में हो रही वृद्धि को देखते हुए एक सरल सा सवाल एक जिज्ञासु के मन में उठता है – कि शारीरिक संबंध किसी एक से रखने और अनेक से रखने में क्या आध्यात्मिक फर्क आएगा? आइए इस कौतुहल का उत्तर जानते हैं…


जिज्ञासु :
क्या ईश्वर चाहता है कि इंसान एक ही साथी के साथ जीवन बिताए? क्या एक समर्पित रिश्ते में होना किसी व्यक्ति के लिए बेहतर है?
सद्‌गुरु :

आपके शरीर की याददाश्त की तुलना में आपके दिमाग की याददाश्त बहुत कम है। अगर आप किसी चीज या किसी इंसान को एक बार छू लें, तो आपका दिमाग भूल सकता है मगर शरीर नहीं । जब लोग एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो मन उसे भूल सकता है, मगर शरीर कभी नहीं भूलेगा।
हो सकता है कि ईश्वर का आपके लिए कोई इरादा न हो। सवाल यह है कि आपके लिए समझदारी वाली बात क्या है? इसके दो पहलू हैं – एक सामाजिक पहलू है। आम तौर पर हमेशा समाज को स्थिर या मजबूत रखने के लिए ‘एक पुरुष – एक स्त्री’ की बात की गई। दुनिया के कई हिस्सों में, जहां ‘एक पुरुष-कई स्त्रियां’ की बात की गई, वहां समाज को स्थिर रखने के लिए सख्ती से शासन चलाना पड़ा। मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊंगा।

दूसरा पहलू यह है कि अस्तित्व में सभी पदार्थों की स्मृति या याददाश्त होती है। आपके शरीर को अब भी जीवंत तरीके से याद है कि एक लाख वर्ष पहले क्या हुआ था। जेनेटिक्स याददाश्त ही तो है। भारतीय संस्कृति में इस भौतिक याददाश्त को ऋणानुबंध कहा गया है। आपकी याददाश्त ही आपको अपने आस-पास की चीजों से बांधती है। मान लीजिए कि आप घर गए और भूल गए कि आपके माता-पिता कौन हैं, तो आप क्या करेंगे? यह खून या प्यार का असर नहीं होता, यह आपकी याददाश्त होती है जो बताती है कि यह व्यक्ति आपकी मां या पिता है। याददाश्त ही रिश्तों और संबंधों को बनाती है। अगर आप अपनी याददाश्त खो बैठे, तो हर कोई आपके लिए पूरी तरह अजनबी होगा।

जब भी आप किसी ऐसे इंसान को देखते हैं, जिसके साथ आप जुड़ना नहीं चाहते, तो सिर्फ ‘नमस्कार’ करें क्योंकि जब आप दोनों हाथों को साथ लाते हैं , तो यह शरीर को याददाश्त ग्रहण करने से रोक देता है।

आपके शरीर की याददाश्त की तुलना में आपके दिमाग की याददाश्त बहुत कम है। अगर आप किसी चीज या किसी इंसान को एक बार छू लें, तो आपका दिमाग भूल सकता है मगर शरीर में वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। जब लोग एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो मन उसे भूल सकता है, मगर शरीर कभी नहीं भूलेगा। अगर आप तलाक लेते हैं, तो चाहे आप अपने साथी से कितनी भी नफरत करते हों, फिर भी आपको पीड़ा होगी क्योंकि शारीरिक याददाश्त कभी नहीं खो सकती।

चाहे आप थोड़ी देर तक किसी का हाथ पर्याप्त अंतरंगता से पकड़ें, आपका शरीर कभी उसे नहीं भूल पाएगा क्योंकि आपकी हथेलियां और आपके तलवे बहुत प्रभावशाली रिसेप्टर यानी ग्राहक हैं। जब भी आप किसी ऐसे इंसान को देखते हैं, जिसके साथ आप जुड़ना नहीं चाहते, तो सिर्फ ‘नमस्कार’ करें क्योंकि जब आप दोनों हाथों को साथ लाते हैं (या अपने पैर के दोनों अंगूठों को साथ लाते हैं), तो यह शरीर को याददाश्त ग्रहण करने से रोक देता है।

इसका मकसद शारीरिक याददाश्त को कम से कम रखना है, नहीं तो आपको अनुभव के एक भिन्न स्तर पर ले जाना मुश्किल हो जाएगा। जो लोग भोगविलास में अत्यधिक लीन होते हैं, उनके चेहरे पर एक खास मुस्कुराहट होती है, जिसमें एक धूर्तता भरी होती है, उसमें कोई खुशी नहीं होती। उससे छुटकारा पाने में बहुत मेहनत लगती है क्योंकि भौतिक याददाश्त आपको इस तरीके से उलझा देती है कि आपका दिमाग उसे समझ भी नहीं पाता। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप अपने शरीर को जिन चीजों के संपर्क में लाते हैं, उनके प्रति जागरूक होना सीखें।

शारीरिक संबंध बनाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए

बहुत ज्यादा अंतरंगता की कीमत हर जगह चुकानी पड़ती है – जब तक कि आप यह नहीं जानते कि इस शरीर को खुद से एक दूरी पर कैसे रखें। जिसने यह दूरी बनानी सीख ली, वैसे इंसान को कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या करता है। मगर ऐसे इंसान का ऐसी चीजों की ओर कोई झुकाव नहीं होता। वह शरीर की सीमाओं और विवशताओं से मजबूर नहीं होता – वह अपने शरीर को एक साधन या उपकरण की तरह इस्तेमाल करता है। वरना, अंतरंगता को कम से कम तक रखना सबसे अच्छा होता है। इसलिए हमने कहा कि एक के लिए एक, जब तक कि उनमें से किसी एक की मृत्यु नहीं होती और दूसरा पुनर्विवाह नहीं कर लेता। लेकिन अब तो हालत यह है कि 25 साल का होने से पहले, आप 25 साथी बदल चुके होते हैं – इसकी कीमत लोग चुका रहे हैं – अमेरिका की 10 फीसदी जनसंख्या डिप्रेशन या अवसाद की दवाओं पर निर्भर है। उसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनमें स्थिरता की कमी होती है क्योंकि उनका शरीर भ्रमित होता है।

अब तो हालत यह है कि 25 साल का होने से पहले, आप 25 साथी बदल चुके होते हैं – इसकी कीमत लोग चुका रहे हैं – अमेरिका की 10 फीसदी जनसंख्या डिप्रेशन या अवसाद की दवाओं पर निर्भर है।
शरीर को स्थिर याददाश्त की जरूरत होती है – लोग इसे महसूस करते हैं। हो सकता है कि कोई पति या पत्नी बौद्धिक रूप से महान न हो, हो सकता है कि वे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हों, फिर भी वे साथ रहने के लिए कुछ भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाएंगे क्योंकि कहीं न कहीं वे यह समझते हैं कि इससे उन्हें अधिक से अधिक आराम और खुशी मिलती है। इसकी वजह यह है कि आपकी शारीरिक याददाश्त आपकी मानसिक याददाश्त से कहीं अधिक आपके जीवन पर असर डालती है। अभी आप जैसे हैं, वह आपकी शारीरिक याददाश्त से तय होता है, आपकी दिमागी याददाश्त से नहीं। दिमागी याददाश्त कल सुबह दिमाग से निकाल फेंकी जा सकती है मगर आप अपनी शारीरिक याददाश्त को नहीं फेंक सकते। इसके लिए आपके अंदर बिल्कुल अलग तरह के आध्यात्मिक विकास की जरूरत होगी।

 शरीर की याददाश्त होती है

आधुनिक विज्ञान यह कहता है, और योग प्रणाली में हम हमेशा से यह बात जानते रहे हैं कि पंचतत्वों जैसे जल, वायु, धरती, आदि में काफी जबरदस्त याददाश्त होती है। अगर मैं किसी ऐसी जगह जाता हूं, जो ऊर्जा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, तो मैं उसके बारे में लोगों से नहीं पूछता – मैं बस किसी पत्थर पर अपने हाथ रख देता हूं। इससे ही मुझे उस जगह की सारी कहानी पता चल जाती है। वैसे ही जैसे किसी पेड़ के छल्ले आपको उस जगह की इकोलॉजी का इतिहास बता देते हैं। पत्थरों में तो उससे भी बेहतर याददाश्त होती है।

आम तौर पर कोई पदार्थ जितना ठोस होता है, याददाश्त को बरकरार रखने की उसकी काबिलियत उतनी ही बेहतर होती है और बेजान चीजों में सजीव चीजों से बेहतर याददाश्त होती है। आज की तकनीक इसे साबित भी कर रही है – आपके कंप्यूटर में आपसे बेहतर याददाश्त है। मानव दिमाग याददाश्त के लिए नहीं है – वह अनुभव के लिए है। निर्जीव या बेजान चीजें अनुभव नहीं कर सकतीं – वह बस याद रख सकती हैं। देवी-देवताओं और दूसरी प्रतिष्ठित वस्तुओं को इसलिए बनाया गया क्योंकि वे याददाश्त के शक्तिशाली रूप हैं।

बेजान चीजों में सजीव चीजों से बेहतर याददाश्त होती है। आज की तकनीक इसे साबित भी कर रही है – आपके कंप्यूटर में आपसे बेहतर याददाश्त है। मानव दिमाग याददाश्त के लिए नहीं है – वह अनुभव के लिए है।
भारत में एक ऐसा समय था, जब आप किसी शिव मंदिर में बिना कपड़ों के ही प्रवेश कर सकते थे। देश में अंग्रेजों के आने और इन सब चीजों पर उनके प्रतिबंध लगाने के बाद ही हम बहुत संकोची और लज्जालु हो गए हैं। मंदिर में नंगे बदन जाने का मकसद ईश्वर या चैतन्य की स्मृति को अपने शरीर में ग्रहण करना था। आप डुबकी लगाकर गीले बदन फर्श पर लेट जाते थे ताकि वह ईश्वर की स्मृति को सोख ले। मन बेशक दूसरे लोगों देखता रहे कि आसपास क्या हो रहा है, मगर शरीर उस स्थान की ऊर्जा को अपने अंदर समा लेता है।

ध्यानलिंग और लिंग भैरवी मंदिरों के प्रवेश द्वार पर दंडवत करते भक्तों की मूर्तियां हैं। यह आपको दिखाने के लिए है कि शरीर, दिमाग से ज्यादा बेहतर तरीके से ईश्वर को ग्रहण कर लेता है। बात बस इतनी है कि इंसान अब नंगे बदन नहीं जा सकते क्योंकि हम बहुत सभ्य हो गए हैं – हम इतने सारे कपड़े पहन लेते हैं कि हमें पता नहीं होता कि शरीर है भी या नहीं। केवल यौन इच्छाओं के उभरने के बाद लोगों को पता चलता है कि उनके पास एक शरीर है।

शारीरिक याददाश्त को कैसे मिटायें

आप गहरी भक्ति या कुछ दूसरे अभ्यासों से अपनी शारीरिक याददाश्त को मिटा सकते हैं। मैंने इस तरह के कुछ भक्त देखे हैं, मगर एक व्यक्ति ने वाकई मुझे प्रभावित किया। एक महिला सुदूर दक्षिण में कन्याकुमारी आई, जो भारत का दक्षिणी छोर है। हम नहीं जानते कि वह कहां से आई थी, मगर अपने चेहरे से वह नेपाल की लगती थी। वह बस इधर-उधर घूमती रहती थी, कभी कुछ नहीं बोलती थी। कुत्तों का एक झुंड हमेशा उसके पीछे-पीछे चलता था। वह सिर्फ इन कुत्तों का पेट भरने के लिए खाना तक चुरा लेती थी और कई बार इसकी वजह से उसे मार भी खानी पड़ती थी। मगर फिर, लोगों ने कभी-कभार उसे लहरों पर तैरते हुए पाया। यह एक तटीय शहर था, जहां तीन समुद्र मिलते हैं। वह तट पर जाती, पानी पर पालथी मार कर बैठती और तैरती रहती। फिर लोगों ने उसकी पूजा करनी शुरू कर दी। जब वह आती थी, तो वे अपना खाना बचा कर रखते थे मगर वे अब उसे पीटते नहीं थे क्योंकि वह कोई विलक्षण महिला थी।

वह पूरी जिंदगी खुली जगहों में ही रही थी। वह सड़क पर या समुद्र तट पर बिना किसी आश्रय के सोती थी। उसके चेहरे पर मौसम के थपेड़ों का पूरा असर था, उसका चेहरा मौसम के असर की वजह से कुछ पुराने मूल अमरीकियों की तरह भी था। उसके जीवन के अंतिम समय में – जब वह 70 साल से अधिक उम्र की थी – एक मशहूर दक्षिण भारतीय संगीतकार ने उसे देखा और उसका भक्त बन गया। वह उसे सलेम, तमिलनाडु ले कर आया और वहां उसके लिए एक छोटा सा घर बनाया। वहां उसके आस-पास कुछ भक्त इकट्ठे हो गए।

आपकी शारीरिक याददाश्त आपकी मानसिक याददाश्त से कहीं अधिक आपके जीवन पर असर डालती है। अभी आप जैसे हैं, वह आपकी शारीरिक याददाश्त से तय होता है, आपकी दिमागी याददाश्त से नहीं।
करीब 15,16 साल पहले मैं सलेम के पास एक हिल स्टेशन पर था। वहां किसी ने मुझे इस महिला के बारे में बताया – उसका नाम मायाम्मा था। तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। उस दिन पूर्णिमा की रात थी। उन्होंने मुझे बताया कि मायाम्मा की समाधि पर एक पूजा होनी है। मैं अपनी पत्नी और बेटी, जो उस समय पांच या छह साल की रही होगी, के साथ शाम को वहां पहुंचा। वह बहुत ही मामूली छोटी सी जगह थी – कंक्रीट की समाधि। जब मैं वहां आया, तो सीधा मेरे चेहरे पर ऊर्जा का आघात हुआ। उस जगह की ऊर्जा विस्फोट की तरह थी। हम घंटों वहां बैठे रहे। बाद में रात के नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था थी। उसका एक भक्त हमें भोजन परोस रहा था। मैंने उस आदमी की शक्ल देखी और मुझे विश्वास नहीं हुआ – वह बिल्कुल उस महिला जैसा लग रहा था। वह एक दक्षिण भारतीय व्यक्ति था, मगर वह एक नेपाली महिला की तरह दिख रहा था। भक्ति के कारण उसका चेहरा करीब-करीब उस महिला जैसा हो गया था।

अगर आप अपनी शारीरिक याददाश्त मिटा दें, तो आपका शरीर वैसा बन जाएगा जो आपके लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है। आपके अंदर सब कुछ पूरी तरह बदल जाएगा। इसका मतलब है कि आप अपनी जेनेटिक विवशताओं से आजाद हो जाएंगे। जब कोई संन्यास लेता है, तो हम उसके माता-पिता और पूर्वजों के लिए एक खास प्रक्रिया करते हैं। आम तौर पर यह प्रक्रिया हम मृत लोगों के लिए करते हैं, मगर संन्यासियों के लिए हम इसे तब भी करते हैं, अगर उनके माता-पिता जीवित हों। ऐसा नहीं है कि हम उनके मरने की कामना करते हैं – इसका मकसद बस इंसान की शारीरिक याददाश्त को मिटाना है।

जब आप 18 साल के थे, तो हो सकता है कि आपने अपने माता-पिता के खिलाफ विद्रोह किया हो, या फिर आपको उनकी बातें तब बिल्कुल पसंद नहीं आती हों, मगर 45 का होने तक, चाहे आपको पसंद हो या नहीं, आपकी बातचीत और बर्ताव उन्हीं की तरह हो जाता है। केवल आपके माता-पिता नहीं, आपके पूर्वजों का भी आप पर असर होता है। आपका व्यवहार उन्हीं से पैदा और नियंत्रित होता है। इसीलिए, अगर आप आध्यात्मिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर हैं, तो पहला कदम अपनी जेनेटिक याददाश्त से खुद को दूर करना है। इसके बिना आप अपने पूर्वजों की विवशताओं से छुटकारा नहीं पा सकते। आपके जरिये वे जीवित रहेंगे और बहुत से तरीकों से आप के ऊपर हावी रहेंगे।

शारीरिक संबंध एक तक ही सीमित रखें

जब शरीर की याददाश्त आप पर इस कदर हावी होती है, तो इस जीवन में उसे कम से कम रखना बेहतर है। आखिरकार, आपको अपने पूर्वजों से मिली लाखों सालों की याददाश्त से भी तो छुटकारा पाना है। आपका पास रेंगने वाला मस्तिष्क है – रेंगने वाले सर्प और छिपकली की तरह, यहां तक कि बिच्छू भी आपमें जीवित होता है। यह न सोचें कि मस्तिष्क मन है – मस्तिष्क शरीर है। कम से कम इस जीवन में, आप इन असरों को सीमित रखना चाहते हैं ताकि आपका शरीर भ्रमित न हो।

जो लोग इस विषय से परिचित थे, उन्होंने आध्यात्मिक प्रक्रियाओं को इस रूप में तैयार किया कि शरीर पूरी तरह अनुकूल बन जाए। दुनिया में हर कहीं यह ज्ञान है कि अगर कोई अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया को लेकर बहुत गंभीर है, तो वह पहली चीज यह करता है कि हर तरह के रिश्तों से दूर हो जाता है। क्योंकि अगर वह कोई शारीरिक रिश्ता बनाता है, तो स्वाभाविक रूप से चीजें पेचीदा हो जाती हैं। या तो वह इतना विवश हो कि उसे उसकी जरूरत हो, आप अभी उसे इसके परे नहीं ले जा सकते, या फिर वह इतना आजाद हो कि उसकी पहचान शरीर से न हो, तभी हम उसे इसकी इजाजत देते हैं, वरना हम आम तौर पर शारीरिक रिश्ता बनाने की इजाजत नहीं देते। लेकिन अगर आपके लिए यह जरूरी है, तो कम से कम एक शरीर तक सीमित रहें। ज्यादा शरीर भौतिक प्रणाली को भ्रमित कर देंगे।


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18 Comments

  • Vinod says:

    क्या बात है सधगुरु आप न कमाल हो

  • Amarinder Singh says:

    क्या बात है सधगुरु आप न कमाल हो

  • Sanjay Jothe says:

    काश इंद्र, वरुण, सूर्य, और कृष्ण को भी सद्गुरु ये ज्ञान दे पाते … उनका जीवन भी बदल सकता था … उन लोगों ने भारी व्यभिचार करके इस देश का बड़ा नुक्सान किया है …

    • Vaibhav Chaturvedi says:

      कुछ लोगो की मानसिकता ही एसी होती हे कि कुछ सीखने के बजाए बजाज दूसरोँ मेँ कमी निकालते हैं मुबारक हो आप भी उनमे से एक है। आप अपनी तुच्छ बुद्धी एवम गिरे हुए मानसिक स्तर से श्री कृष्ण के आचार विचार को समझना चाहते हैं, असल मेँ उसने गलती निकालना चाहते हेैं। आपके लिए इस समय यह जानना बेहद जरुरी हे के आपका दिमाग ओर आपकी नजर मैँ अश्लीलता का चश्मा चढा हुआ है और आप पूरी दुनिया को वही दृष्टिकोण से देख रहे हैं। ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे।

      • Sanjay Jothe says:

        वैभव महाशय, आप एक महान गुरु के शिष्य हैं. आपको क्रोधित होना शोभा नहीं देता, सभ्यता से उत्तर दें. यहाँ सद्गुरु स्पष्ट रूप से एक स्त्री या पुरुष से सम्बन्ध का परामर्श दे रहे हैं. मैं उनकी महान प्रज्ञा से उद्भूत इस नैतिक परामर्श का समर्थन करता हूँ. शायद आप भी करते हैं. अब उनकी सलाह को ध्यान से देखा जाए तो स्वाभाविक रूप से कृष्ण की रासलीला पर और इंद्र के व्यक्तिगत जीवन पर प्रश्न उठेगा ही. ये एक सीधी सी बात है. या तो रासलीला सही हो सकती है या सद्गुरु का यह परामर्श सही हो सकता है. दोनों एकसाथ कैसे सही हो सकते हैं? आप संयत भाषा का प्रयोग करें. और अच्छे साधक होने का प्रमाण उपस्थित करें अन्यथा मेरी बातों का उत्तर न दें.

        शायद आप अभी स्कूल के छात्र हैं और आपका अध्ययन अधिक नहीं है. मैं आपसे निवेदन करूँगा कि कुछ अच्छी किताबों का अध्ययन करें और अपने पूज्य माता पिता से वार्तालाप में शिष्टाचार के संबंध में ज्ञान लें. स्वयं सद्गुरु के विडियो देखिये और उनकी किताबें ठीक से पढ़िए वे कितनी मधुर भाषा का प्रयोग करते हैं. मेरे प्रणाम

        • Raaj Malhotra says:

          dear sanjay ji

          prabhu shri krishan ki raaslila ke bare me aap kya jante hai .kripya kar ke bataye

          prabhu ki lila prabhu hi jante hai aapki buddhi se bahar ki chij hai

          • Sanjay Jothe says:

            भाई साहब … मैं तो गीत गोविंग और भागवत पुराण में वर्णित क्रीडाओं और विवरणों के आधार पर बात कर रहा हूँ. वहां जैसा वर्णन है उसे आप देख लीजिये. सद्गुरु जिस मार्ग की अनुशंसा कर रहे हैं वो वर्णन उस मार्ग के एकदम प्रतिकूल है. इसीलिये भारत में राजनेता, बाहुबली, अधिकारी और सामंत सब के सब अपने लैंगिक और यौनिक अनुशासन को बनाए रखने में असफल रहे हैं. कृष्ण या इंद्र के संबंध में जैसा साहित्य रचा गया है उससे इस देश की नैतिकता को धक्का लगा है. तंत्र के नाम पर जो पञ्च मकार और योनी या लिंग पूजा चलती है वह एक पति या एक पत्नीव्रत के लिए घातक है … मैं किसी का अपमान नहीं कर रहा हूँ…केवल सद्गुरु के तर्क और परामर्श को अन्य बातों के साथ रखकर दिखा रहा हूँ …

          • Jatinder Singh says:

            या फिर वह इतना आजाद हो कि उसकी पहचान शरीर से न हो, तभी हम उसे इसकी इजाजत देते हैं, ye Guru g ka hi sandesh hai….Copy paste kiya hai…

          • Viki Gupta says:

            Sanjay Ji,

            I can see from where you are getting this input. If you learn the concept of western teaching then you will start seeing everything in black and white scenario which falls in logical realm which has great limitation. But when you see spiritual things they are not absolute logical. You can refer the quantum physics which is not logical. Its the mind limitation as you have not opened yourself beyond logic. I hope you open yourself up then start looking for Krishna. It will help you to understand what it means to beyond logic. Your comments is so limited to child like yes and no or right or wrong or day and night. I wish you get beyond your logic. HarI Aum

          • Amit says:

            have you read Srimad Bhagwat Gita ever … what you say about the diseases such as AIDS … you dont believe, dont worry … nature will make you understand ….
            And if you talk about Krishna and Indra … to understand them you have to be at there level … Being a nursery class stupid guy … one cannot understand what goes in PhD … here you are even not admitted to the school … forget about nursery ….

          • Omkar Narayan says:

            >>>
            Sanjay ji, you forgot to read and understand the following line in the article.
            “जब तक कि आप यह नहीं जानते कि इस शरीर को खुद से एक दूरी पर कैसे रखें। जिसने यह दूरी बनानी सीख ली, वैसे इंसान को कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या करता है।” Krishna had learned to keep himself at a distance from his body and mind. I guess that clears the misunderstanding.
            <<<

        • Swapnil says:

          तुम जैसे कुत्तो के लिए मधुर भाषा कि जरुरत नहीं.

          “भले तरी देवू कासेची लंगोटी। नाठाळाच्या माथी हाणू काठी। असे संत तुकाराम महाराज यांनी म्हटले आहे”.

          • Sanjay Jothe says:

            आदरणीय महाशय

            मुझे दुःख है … मुझे ग़लतफ़हमी हुई थी कि यह ब्लॉग सभ्य लोगों का समूह है जहां सुसंस्कृत लोग धर्म और अध्यात्म की चर्चा में रस लेंगे. मुझे सद्गुरु के वक्तव्यों का ओज और तर्क देखकर लगा था कि उनकी शिक्षाओं का अनुशीलन करने वाले लोग सभ्य होंगे. लेकिन यहाँ तो गाली गलौज चल रही है…. ऐसे ही शिष्यों ने सबको डुबोया है…. सद्गुरु आपको सद्बुद्धि दें

            इस ब्लॉग में सिर्फ कम पढ़े लिखे और बुद्धि के दुश्मन ही भरे पड़े हैं… आप ऐसे गंदे और अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने वालों को चेतावनी नहीं दे पा रहे हैं. इस बात का भी दुःख है.

            With Best Regards

            *Sanjay Jothe, *
            (M.A. Development Studies, *IDS, University of Sussex** U.K.)* *Project Consultant,*
            SBA Accreditation Project
            All India Institute of Medical Sciences (AIIMS)
            Bhopal, M.P.- 462024
            Cell No. +91 9926502027

            2015-10-29 19:20 GMT+05:30 Disqus :

          • Swapnil says:

            main is sadguru ka shishya nahi hun. teri bhasha ka prayog maine sare posts me dekha lekin ye dekh ke dukh ho raha hain ke padha likha hokar bhi deo ke bare me gandi baat karta hain to tuze jute to padenge hi is internet par aise durvavahar par.

    • chirag says:

      आसमां की तरफ मुंह कर के थुकने वाले देख तेरे मुंह पे हि गिरा है थुक. क्रष्ण ओर दुसरे देवताओं को कोसने वाले तुमने कितना भला कर लिया भारत माता का.

    • Swapnil says:

      देवी देवतओं क अपमान करता हैं कुत्ते.

      एक गंदे दिमाग वाला कैसे तू पैदा हुआ हैं जो कृष्ण भगवन को ऐसे बोल रहा हैं? इंद्र कि पूजा नहीं होती हैं.

      तू तो सीखकर भी अनपढ़ ही हैं. तेरी शिक्षा व्यर्थ हैं और तेरे जैसे लोगों कि वजह से समाज पीछे हैं.

    • Swapnil says:

      यह सिद्ध करके दिखाओ.

  • Amit Tiwari says:

    मैं संजय जी से सहमत हूँ और नवागन्तुक साधकों से निवेदन हैं कृपया साधना के पथ का सही से पालन करें एवं अपने बौद्धिक छमताओं का विकास करें। अल्पज्ञान अल्पसाधना आपके व्यक्तिगत जीवन के लिए विध्वंसक हैं।

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