खेल कम कर सकता है समाज में फैली हिंसा

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Sadhguruअगर मैं हारना नहीं चाहता तो संघर्ष करना होगा, हिंसा होगी, लेकिन खेल की जो मूल बातें हैं, वे हिंसा को खत्म कर देती हैं और यह भाव जगाती हैं कि अगर मैं हार गया तो कोई बात नहीं।

प्रश्न: खेलों में प्रतियोगिता का भाव भी होता है। सद्‌गुरु, क्या आपको लगता है कि समाज में बढ़ रही हिंसा और आक्रामकता के भाव को खेल एक तरीके से कम करने में मदद कर सकता है?

सद्‌गुरु: यह चीजों को देखने का पश्चिमी मनोवैज्ञानिक तरीका है। उन्हें लगता है कि हर इंसान के भीतर एक तरह की हिंसा होती है और उसे उस हिंसा को बाहर निकालना होता है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा मानना है कि जब आप छोटी-छोटी चीजों को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर हो जाते हैं, तब धीरे-धीरे आप अपने आपको हिंसक अवस्था में पहुंचा देते हैं। यह कहना सही नहीं है कि हिंसा हर इंसान के भीतर दबी होती है, लेकिन अगर आप एक खास किस्म के माहौल में लगातार रह रहे हैं तो कुछ समय के बाद आप उस अवस्था में पहुंच जाएंगे जहां हिंसा की भावना पैदा हो जाएगी। क्या आपको लगता है कि कोई नवजात या छोटा बच्चा हिंसा करना चाहता है या उसके भीतर हिंसा मौजूद है? नहीं, लेकिन धीरे-धीरे अगर आप उसे कुछ खास किस्म के पूर्वाग्रहों की ओर धकेलते रहेंगे, तो धीरे-धीरे उसके भीतर हिंसक आदतें विकसित होती जाएंगी।

क्या आपको लगता है कि कोई नवजात या छोटा बच्चा हिंसा करना चाहता है या उसके भीतर हिंसा मौजूद है? नहीं, लेकिन धीरे-धीरे अगर आप उसे कुछ खास किस्म के पूर्वाग्रहों की ओर धकेलते रहेंगे, तो धीरे-धीरे उसके भीतर हिंसक आदतें विकसित होती जाएंगी।

तो ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हिंसा आपके भीतर ‘इनबिल्ट’ होती है और आपको उसे बाहर निकालना होता है। ऐसी कोई बात नहीं है। बात बस इतनी है कि हिंसा की संभावना तभी हो सकती है अगर दो लोग हैं। इसके लिए जरूरी नहीं कि दस लोग हों। ज्यादातर वक्त जब दो लोग होते हैं, तो हिंसा शाब्दिक हो सकती है। यह शारीरिक तभी हो सकती है, जब आप इसे बढऩे देंगे। लोगों को लगता है कि शारीरिक हिंसा ही हिंसा है, लेकिन मेरा मानना है कि अगर कोई किसी की तरफ कठोरता के साथ देख भी रहा है तो वह भी हिंसा ही है। यही आगे चलकर शारीरिक हिंसा में तब्दील हो सकती है। अगर मैं आपको कठोर नजरों के साथ देख रहा हूं तो हो सकता है कि कुछ समय के बाद आपको पीट भी दूं, बस यह समय की बात है। यह कैसे होगा? आपके पास होने से। अगर आप चले जाते हैं, तो हम आपको नहीं पीटने वाले, लेकिन अगर आप हमारे इर्द गिर्द ही मंडराते रहे तो हो सकता है हम आपको पीट दें, क्योंकि हमने अपने भीतर जरूरी शर्तें पहले ही पूरी कर ली हैं।

मान लें फुटबॉल का विश्वकप चल रहा है। महज बाइस लोग बॉल के साथ खेल रहे हैं। आधी से ज्यादा दुनिया बैठकर यह सब देख रही है। क्यों देख रही है? क्या बॉल की वजह से? क्या किक की वजह से? नहीं, यह खेल की तीव्रता ही है जिसे लोग देखना चाहते हैं।

आप खेल और हिंसा के संबंधों के बारे में बात कर रहे हैं। मान लें फुटबॉल का विश्वकप चल रहा है। महज बाइस लोग बॉल के साथ खेल रहे हैं। आधी से ज्यादा दुनिया बैठकर यह सब देख रही है। क्यों देख रही है? क्या बॉल की वजह से? क्या किक की वजह से? नहीं, यह खेल की तीव्रता ही है जिसे लोग देखना चाहते हैं। इस तीव्रता को खिलाड़ी और दर्शकों दोनों के भीतर खेल अपने आप ही ले आता है, लेकिन इसमें एक तरह के त्याग का भाव भी है। ‘अगर मैं हार गया’ . . . तो कोई बात नहीं। अगर मैं हारना नहीं चाहता तो संघर्ष करना होगा, हिंसा होगी, लेकिन खेल की जो मूल बातें हैं, वे हिंसा को खत्म कर देती हैं और यह भाव जगाती हैं कि अगर मैं हार गया तो कोई बात नहीं। मैं जीतना चाहता हूं, लेकिन अगर हार गया तो भी कोई बात नहीं, अगर आप अपने जीवन में इस बात को उतार लें तो आप एक शानदार इंसान बन सकते हैं।

यह कहना सही नहीं है कि हिंसा हर इंसान के भीतर दबी होती है, लेकिन अगर आप एक खास किस्म के माहौल में लगातार रह रहे हैं तो कुछ समय के बाद आप उस अवस्था में पहुंच जाएंगे जहां हिंसा की भावना पैदा हो जाएगी।


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