आज़ादी अपना धर्म चुनने की

सर्व धर्म स्तम्भ
सर्व धर्म स्तम्भ

धर्म के नाम पर सदियों से विश्व की तमाम संस्कृतियों को बदलने और अपने अधीन करने की कोशिशें होती रही है। आइए जानते हैं इस विषय पर सद्‌गुरु के विचार:

मेरा मानना है कि हर इंसान को अपने धर्म का चुनाव अपने विवेक और अपने भीतर की खास जरूरत के आधार पर करना चाहिए। धर्म का चुनाव उन्हें अपने पास पैसा न होने, शिक्षा न होने, या भोजन न होने की वजह से या इन जैसी चीजों से प्रभावित होकर नहीं करना चाहिए। किसी को भी इन बातों के आधार पर कोई धर्म अपनाने का फैसला नहीं करना चाहिए। मैं किसी खास धर्म से नहीं जुड़ा हुआ हूं और किसी भी धर्म विशेष से अपनी पहचान नहीं बनाता। अगर कोई इंसान सचमुच आध्यात्मिक राह पर चल रहा है, तो वह कभी भी किसी खास वर्ग या धर्म से अपनी पहचान नहीं बना सकता।

किसी गरीब या भूखे से जाकर यह कहना कि मैं तुम्हें खाना दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरे भगवान की पूजा करनी होगी, यह बेहद भद्दी व गलत बात है।
दुनिया के सभी धर्म लोगों के लिए उपलब्ध होने चाहिएं। फिर लोगों को अपनी पसंद के हिसाब से उनका चुनाव करने दें। मुझे लगता है कि किसी को भी इस धर्म या उस धर्म में परिवर्तित करने की जरूरत नहीं है और न ही इंसान के लिए किसी धार्मिक-दल से जुड़ना जरूरी है। आजकल आप जिसे धर्म के रूप में देख रहे हैं, वह धर्म नहीं है। सही मायने में धर्म शब्द का अर्थ है, अपने भीतर की ओर उठाया हुआ एक कदम। धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे आप सडकों या चौराहों पर करते हैं। दरअसल, यह तो अपने भीतर करने वाली चीज है। जब यह वाकई एक आंतरिक प्रक्रिया है, तो फिर किसी को जबरन या बहला-फुसला कर परिवर्तित करने या अपना दल बनाने की कोई जरूरत नहीं है और न ही अपने दल में सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए बेचैन होने की जरूरत है। फिर यह काम चाहे जो भी दल या संप्रदाय कर रहा हो, यह अनुचित है। मैं एक सामान्य बात कर रहा हूं, किसी खास संप्रदाय की नहीं।

आज धर्म व धर्म के प्रचार-प्रसार के नाम पर लोग सारी सीमाएं तोड़ कर संस्कृतियों को जड़ से मिटाने में लगे हैं। एक बार जब कोई संस्कृति उखड़ जाती है, तो उससे जुड़े अधिकांश लोग जीवन में अपने आचार-विचार को खो देते हैं। इस तरह के बलपूर्वक परिवर्तन से दुनिया के जो देश व समाज बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, उनमें ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी और उत्तरी अमेरिका में रेड-इंडियन मुख्य हैं। उन लोगों के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया, उनकी संस्कृति के साथ जो हुआ, वह अपने आप में वाकई दुखद है। भारतीय संस्कृति बेहद समृद्ध और सशक्त है। यह अपने आप में कई संस्कृतियों को समेट सकती है, कई धर्मों को शामिल कर सकती है। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। धर्म को फैलाने के नाम पर किसी को इस समूची संस्कृति को मिटाने की जरूरत नहीं है। भारतीय संस्कृति दुनिया की सबसे रंग-बिरंगी संस्कृतियों में से एक है। भले ही यह बेहद बिखरी हुई लगे, फिर भी बहुत सुंदर है। इसे आप रातों रात नहीं बना सकते हैं। इसे इस तरह से विकसित होने में हजारों साल लगे हैं।

जब कोई समुदाय जोर-जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन कराने लगता है और यह कहने की हद तक चला जाए कि ’अगर तुम इसमें विश्वास करते हो तो तुम हमारे धर्म में हो, अगर तुम इसमें विश्वास नहीं करते तो तुम्हारी हत्या कर दी जाएगी’ तो फिर वह कहीं से भी धर्म नहीं रह जाता। तब वह बस एक राजनैतिक दल बन जाता है। अपने यहां कई तरह के राजनैतिक दल हैं, उसी तरह से धार्मिक-दल भी बन गए हैं।

मैं केवल किसी संस्कृति को अनावश्यक रूप से बिगाडने के खिलाफ हूं।

इस तरह के बलपूर्वक परिवर्तन से दुनिया के जो देश व समाज बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, उनमें ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी और उत्तरी अमेरिका में रेड-इंडियन मुख्य हैं।
अगर कोई इंसान गरीबी को कम करने की बात करता है, अगर वह गरीबी को लेकर चिंतित है और उसके भीतर की करुणा उन लोगों को भोजन देने, शिक्षा देने के लिए प्रेरित करती है, तो उसे स्थानीय ढांचे में बिना कोई छेड़छाड़ किए, यह सब करना चाहिए। इसके लिए उन्हें स्थानीय व देशी ढांचे का इस्तेमाल करना चाहिए। भले ही देशी संस्कृति चाहे जैसी हो, आप उसी का इस्तेमाल करके शिक्षा दें, भोजन दें, समृद्धि पैदा करें, लेकिन संस्कृति को मिटा कर यह सब करना ठीक नहीं है।

किसी इंसान को किसी खास धर्म में परिवर्तित करने के लिए, चाहे वह उसे पसंद करे या ना करे, उसे शिक्षा, पैसा व दूसरी चीजों का लालच देने की क्या जरूरत है? किसी गरीब या भूखे से जाकर यह कहना कि मैं तुम्हें खाना दूंगा, लेकिन तुम्हें मेरे भगवान की पूजा करनी होगी, यह बेहद भद्दी व गलत बात है। इसकी बिलकुल जरूरत नहीं है। अगर उसकी इच्छा किसी दूसरे भगवान की पूजा करने की है, तो उसे करने दें। मैं ऐसे कई हिंदुओं को जानता हूं, जिनके घरों में ईसा मसीह, मोहम्मद साहब से जुड़ी बहुत सी धार्मिक प्रतिमाएं व प्रतीक हैं, क्योंकि हिंदू संस्कृति किसी भी चीज का विरोध नहीं करती। यह चीजों को खुद में शामिल करती है। यह अच्छी बात है कि हमारे देश में अधिकतर लोग ऐसे ही हैं, जो इस दल या उस दल से नहीं जुड़ते।


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