जीवन की गतिशीलता में
शरीर, मन और ऊर्जा से
हम सब बन जाते हैं एक अलग व्यक्ति
अलग हस्ती और अलग अस्तित्व वाले
सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि हर जीवन
पाता है खुद को अलग
केवल गतिशीलता में।
लेकिन निश्चलता में है एकत्व
निश्चलता ही मूल है
गतिशीलता तो बस सतह है।
सतह की आनंदमय अभिव्यक्ति
सिर्फ तभी आनंदमय होती है
जब जड़ें, मूल जीवन की निश्चलता में हों।
क्या हम तभी निश्चल होंगे, जब मरेंगे
या जीवित रहते हुए जानेंगे
मूल जीवन की निश्चलता की सुंदरता।