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जब आपको यह समझ न आए कि क्या चुनना है, तो हर चीज में अपनी पूर्ण भागीदारी रखें। तब जीवन स्वयं चुनेगा, और वह कभी गलत नहीं होता।
दुनिया में जो हो रहा है, अगर वह वैसा नहीं है जैसा आप चाहते हैं, तो कम से कम आपके भीतर जो हो रहा है, वह तो वैसा होना चाहिए जैसा आप चाहते हैं।
समाज को मानव चेतना को नहीं गढ़ना चाहिए, बल्कि मानव चेतना द्वारा समाज गढ़ा जाना चाहिए।
जो लोग न केवल ज्ञान पाने की, बल्कि शरीर की सीमाओं से परे जाने की आकांक्षा रखते हैं, वे स्वाभाविक रूप से देवी के सात्विक पहलू की खोज करते हैं। सरस्वती उसी पहलू का साक्षात स्वरूप हैं।
कुछ अद्भुत बनाने के लिए किसी विशेष बुद्धि या योग्यता की जरूरत नहीं होती — आप जो करना चाहते हैं, बस उसके प्रति पूरी तरह से समर्पित हो जाइए।
तनाव में आपकी बोध-क्षमता खत्म हो जाती है। शिथिलता में भी बोध-क्षमता नहीं होती। जब आप तीव्र और सहज होते हैं, केवल तभी आप हर चीज को बिल्कुल वैसा देख सकते हैं जैसी वह है।
केवल आपके भौतिक शरीर को सीमा की जरूरत है। आपकी बाकी सभी चीजें असीम हो सकती हैं।
भक्ति एक ऐसी अवस्था है जहां आप खुद मौजूद नहीं होते – जीवन बस एक खास मिठास और सुंदरता बनकर आपके भीतर से बहता है।