मैं था, अब नहीं हूँ, पर रहूँगा
एक पहचान जो दूसरों ने दी, अब नहीं रही, एक होने का अहसाह जो मैंने जाना बस वही है। जब मिट गया, तो जाना मिटना तो हुआ ही नहीं, मैं अनंत हो गया मेरा होना बस एक ख्याल ही था, और ख्यालों का भला अस्तित्व ही क्‍या, हैरान हूँ कि यह आँख इतने समय बंद कैसे रही, और भी हैरान हूँ कि यह आँख रहस्यमय ढंग से खुल कैसे गयी मेरे करने से तो कुछ भी न हुआ, पर देखें यह हुआ है, और होता ही चला जा रहा है। लगता है कहीं ऊंचे से चिल्लाऊं कि कोई सुन ले और इधर आ जाए पर आवाज है कि निकलती ही नहीं, बात है कि कही ही नहीं जाती इस आनंद का, इस रस का, इस मौन का, इस अविरल संगीत का तुम्हें निरंतर निमंत्रण दिए जा रहा हूँ। इसलिए नहीं कि तुम्हें इसे पाना है, बल्कि इसलिए कि यह उपलब्ध है और तुम्हारी पूरी सम्भावना है इसमें होने की, इसे होने की। आ जाओ, आ ही जाओ, अब देर न करो मैं यहाँ फिर-फिर तुम्हें पुकारता ही रहूँगा। कवि - सुभाष
देखो आसमान में।
देखो आसमान में एक कबूतर चढ़ता जा रहा है। दूर उसकी मंजिल है, सीधा उड़ता जा रहा है। भूतकाल में अनेक चोटें जो लगी इसे उनको समेट कर आगे बढ़ता जा रहा है, बढ़ता ही चला जा रहा है। सपने टूटे, अरमान छुटे, बहुत तकलीफ उठाई है। खुद को गिराकर ही तो इसमें अक्ल आई है। आत्म-सम्मान के साथ अब यह खड़ा हुआ है। लक्ष्य को पाने के लिए अब यह अड़ा हुआ है। आंधी आये, तूफ़ान आये, इसको न रोक पाएंगे। इसके हौसले के सामने कोई न टिक पाएंगे। लक्ष्य बना चुका, यह उसको पा जायेगा। अर्जुन की तरह जीत कर दिखलायेगा। कवि -मयंक
मौन से सींच दो...
ये फ़ुहार-सा उठता है क्यूँ? ये ज्वार-सा उठता है क्यूँ? ये मन मेरा विकल विकल धुआँ धुआँ उठता है क्यूँ? छलक-छलक ये नैन मेरे, दर्द भरे रैन मेरे, ये किसकी तलाश है जो, तड़प रहे ये प्राण मेरे, तलाश रही दर-बदर, जीवन का सार हर पहर, अज्ञान हूँ न पाऊँ मैं, तड़प रही मैं हर सहर, कौन हूँ? कहाँ से हूँ? क्यूँ मैं इस धरा पे हूँ? प्रश्न ये मुझे मथ रहे, क्यूँ बेचैन-सी निराश हूँ, ले लो मेरा सर्वस्व तुम, प्राण मेरे खींच लो, जीवन की डोर थाम लो, हे गुरु! मौन से मुझे सींच दो। कवि - श्‍वेता देवांगन
जब मैं धूमिल पड़ा पथ पर, तुम तनिक भी निकट न आए
दीप जब मेरा, अकेला जल रहा था घोर तम से लड़ रहा था तुम अकिंचन लौ की बाती, ठीक करने संग न आये जब मैं धूमिल पड़ा पथ पर, तुम तनिक भी निकट न आये जब भोर की ऊंघी सुबह भी दौड़ मुझको काट खाती सूर्य की अग्नि मुझे, भस्म होने को बुलाती इस वेदना की दुःख घड़ी में बादलों को तुम न लाये जब मैं धूमिल पड़ा पथ पर, तुम तनिक भी निकट न आये क्या थे कारण दूरियाँ इतनी हमारी बढ़ गयी तुम थे कारण या कि देखो भूल मुझसे हो गयी डांटने को मुझे तुम अपने कदम क्यों न बढ़ाये जब मैं धूमिल पड़ा पथ पर, तुम तनिक भी निकट न आये जब कभी हम संग खड़े थे, लोग देखो जल मरे थे हम सभी तो मित्रता के प्रतिमान बन कर ही खड़े थे पर कालचक्र ऐसा क्या घूमा, हम अजनबी बन कर हैं आये जब मैं धूमिल पड़ा पथ पर, तुम तनिक भी निकट न आये। कवि – अमन तिवारी
फिर भी क्यों नही है बदलता ?..
कभी मैं अपनों हाथों की लकीरों से नहीं उलझा, मुझे मालूम है, किस्मत का लिखा भी बदलता है... वक़्त बदलता है, तारीख़ें भी बदलती हैं.. रिश्ते बदलते हैं, मौसम भी बदलता है... बदलती है इंसानों की फितरत, कायनात भी रूख बदलती है... परिवर्तन के इस दौर में, जरूरी है बदलाव... कई कर रहे, गैरों से लगाव, अपनों से बिलगाव... कभी तकलीफ देती है परिवर्तन... कभी लतीफ सी लगती है ये परिवर्तन... मांगती है, ये लहू का बलिदान.. कभी अभिमान तो कभी सम्मान... बदलना है, बदलना होगा ही.. इन रूढ़ियों की बेड़ियो को तोड़ना होगा ही... अकेला ही चल, कारवां तो बन ही जायेगा.. बदलाव की बयार में हर कोई साथ हो जाएगा... अपने जहन में इस बात को ठानो तुम, नियत से बदलती है नियति, इस बात को मानो तुम... कब तक जिओगे, अंधविश्वास की मैली चादर को ओढ़कर... कब तक जिओगे, व्यवहारिकता के पथ को छोड़कर.. कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा.. मुझे मालूम है, किस्मत का लिखा भी बदलता है.. आसान नही है राह.. मगर पास है चाह.. बदलाव की बात, हर कोई है करता... पर मुझे ये समझ नही आ रही... "फिर क्यों नहीं है बदलता?"... "फिर क्यों नहीं है बदलता?"... कवि – प्रभाकर कुमार