‘मैं’ का विस्तार ही चेतना का विस्तार है

'मैं' का विस्तार ही चेतना का विस्तार है?
'मैं' का विस्तार ही चेतना का विस्तार है?

अध्यात्म का एक अर्थ है, पूरी तरह चेतन हो कर जीवन बिताना। कैसे जानें कि हमारी चेतना विकसित हो रही है? ज्यादा से ज्यादा चेतन होने पर कौन से गुण खिलने लगते हैं?

प्रश्न : हम यहां जो भी काम कर रहे हैं, अपने को बेहतर बनाने की दिशा में जो भी कदम उठा रहे हैं, इसका मानव-चेतना को विकसित करने से क्या सम्बन्ध है?

सद्‌गुरुसद्‌गुरु : ‘चेतना’ या ‘चेतनता’ एक ऐसा शब्द है जिसका बहुत ही गलत अर्थों में प्रयोग किया जाता है। लोगों ने इसे न जाने किन-किन अर्थों में प्रयोग कर डाला है। तो सबसे पहले तो मैं चेतना शब्द का अर्थ बताना चाहूंगा। आखिर चेतना है क्या?
आप बहुत सारी चीजों से मिलकर बने हैं। जब आप एक जीवन के रूप में यहां बैठते हैं तो इसका मतलब है कि इस धरती की एक निश्चित मात्रा यहां मौजूद है, सत्तर फीसदी से ज्यादा पानी की मौजूदगी है, हवा भी है, अग्नि भी है और आकाश भी। इसके अलावा एक मौलिक प्रज्ञा होती है, जो इन सभी चीजों को एक खास तरीके से एक साथ जोड़ती है और इनसे एक जीवन का निर्माण करती है। एक तरह की प्रज्ञा ही है जो मिट्टी को पेड़ बना रही है, पक्षी बना रही है, कीड़ा बना रही है, इंसान बना रही है, हाथी बना रही है। एक ही पदार्थ से एक के बाद एक न जाने कितनी चीजें बनती जा रही हैं।

जिस वजह से यह सब संभव हो रहा है, उसे हम आमतौर पर चेतना कह देते हैं। हम इस शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं? क्योंकि केवल सचेतन व जागरूक रहकर ही आप यह जान सकते हैं कि आप जिंदा हैं या नहीं।

अपनी इंद्रियों की सीमाओं को इस तरह बढ़ाना कि अगर आप यहां बैठे हैं, तो पूरा का पूरा जगत आपको अपना हिस्सा महसूस हो, यही योग है। यही चेतना का विकास है।
अगर आप बेसुध हैं, तो आपको पता नहीं होता कि आप जीवित हैं या नहीं। अगर आप गहरी नींद की अवस्था में हैं तो भी आप यह नहीं जानते कि आप जीवित हैं या नहीं। अगर आप जीवन को महसूस करते हैं, उसकी जीवंतता का अनुभव करते हैं, तो इसकी वजह सिर्फ  यही है कि आप सचेतन हैं।

तो इसे हम चेतना कह रहे हैं। अब हम इस चेतना को विकसित करना चाहते हैं। आप इसे उठा नहीं सकते, आप इसे नीचे भी नहीं ला सकते, लेकिन चेतना विकसित करने को हम दूसरे अर्थ में प्रयोग करते हैं। अगर आप यहां अपने शरीर के साथ जबर्दस्त पहचान स्थापित करके बैठे हुए हैं, तो आपकी सीमाएं बिल्कुल साफ  हैं। यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूं। इस स्थिति में आप एक बिल्कुल अलग अस्तित्व हैं। इंसान के भीतर या किसी और प्राणी के भीतर भी यह एक तरह का बस जीवित रहने का तरीका है। इसमें आप कौन हैं, उसकी सीमाएं पूरी तरह से तय हैं। यह मेरा शरीर है, यह तुम्हारा शरीर है। यह मैं हूँ और यह तुम हो। दोनों के एक होने का कोई तरीका नहीं है।

हम यहां बैठे हैं। हम एक ही हवा में सांस ले रहे हैं। इस हवा में बहुत सारा पानी भी है, नमी है। हम हवा और पानी हमेशा एक-दूसरे से अदल-बदल रहे हैं, आपस में एक दूसरे को साझा कर रहे हैं। हमें इसमें कोई समस्या नहीं है, क्योंकि हमारी पहचान इनसे नहीं है। हमने तो अपनी पहचान अपने इस शरीर के साथ स्थापित की है, इसलिए हमें इसी से समस्याएं हैं। यह मैं हूं, किसी को इस सीमा के अतिक्रमण की इजाजत नहीं है।

तो जिसे हम चेतना कह रहे हैं, वह दरअसल आपके अस्तित्व का बहुत ही सूक्ष्म पहलू है और इसे हर कोई साझा करता है। एक ही प्रज्ञा है जो मेरे भीतर, आपके भीतर या किसी और के भीतर भोजन को मांस में बदल रही है। एक ही प्रज्ञा है। वह अलग-अलग लोगों में अलग-अलग नहीं है। तो अगर लोग अपने शरीर से पहचान स्थापित करने के बजाय अपने भीतरी आयाम से अपनी पहचान स्थापित करें तो ‘मैं’ और ‘तुम’ का उनका भाव हल्का होता जाता है और उन्हें ‘मैं’ और ‘तुम’ एक ही नजर आने लगते हैं। इसका अर्थ है कि सामाजिक संदर्भ में चेतना का विकास हुआ है। योग शब्द के अर्थ है मिलन। अगर इसकी अभिव्यक्ति बहुत ही साधारण तरीके से, शारीरिक स्तर पर हो, तो उसे हम कामुकता यानी सेक्सुअलिटी कहते हैं। अगर इसकी अभिव्यक्ति भावनात्मक रूप से हो जाए तो उसे हम प्रेम कह देते हैं। अगर इसे एक चेतन अभिव्यक्ति मिल जाए तो इसे योग कह दिया जाता है।

हम कहते हैं कि हम चेतना को विकसित कर रहे हैं। लेकिन असल में हम चेतना को विकसित नहीं कर रहे हैं। हम तो बस आपके अनुभव को गहराई प्रदान कर रहे हैं ताकि आप और अधिक सचेतन हो सकें। हम सभी थोड़े बहुत सचेतन हैं और इसीलिए हम जानते हैं कि हम जीवित हैं। सवाल बस यह है कि हम कितने सचेतन हैं, हमारी चेतना का स्तर क्या है? ऐसा नहीं है कि आपको अपनी चेतना को बढ़ाना है, चेतना तो मौजूद है, आपको तो बस उस तक अपनी पहुंच को बेहतर करना है, जिससे आप उसे अनुभव कर सकें। यह हमेशा मौजूद है। अगर यह काम न कर रही होती तो आप इस सांस को जीवन में परिवर्तित नहीं कर सकते थे, भोजन को जीवन में नहीं बदल सकते थे। आप जीवित हैं इसका मतलब है कि आप सचेतन हैं। बात बस इतनी है कि उस चेतना तक आपकी पहुंच नहीं है या है तो बहुत कम है। जैसे-जैसे आपकी पहुंच बेहतर होती है, आपकी सीमाओं का विस्तार होता है। अगर आपने अपनी चेतना के साथ अपनी पहचान स्थापित कर ली, तो आप हर किसी में अपना ही अक्स देखेंगे, सबको ‘मैं’ ही महसूस करेंगे। योग का मतलब भी यही है।

योग शब्द का अर्थ है मिलन। इंसान मिलन के इस भाव को बहुत तरीकों से महसूस करने की कोशिश कर रहा है। अगर इसकी अभिव्यक्ति बहुत ही साधारण तरीके से, शारीरिक स्तर पर हो, तो उसे हम कामुकता यानी सेक्सुअलिटी कहते हैं। अगर इसकी अभिव्यक्ति भावनात्मक रूप से हो जाए तो उसे हम प्रेम कह देते हैं। अगर इसे मानसिक अभिव्यक्ति मिल जाए तो इसे लालच, महत्वाकांक्षा, विजय या सामान्य रूप से ‘शॉपिंग’ भी कह देते हैं। अगर इसे एक सचेतन अभिव्यक्ति मिल जाए तो इसे योग कह दिया जाता है, लेकिन मूल प्रक्रिया, मूल इच्छा वही है।

इसका मतलब यह है कि आप अपने में किसी ऐसी चीज को समाहित करना चाहते हैं, जो आपका हिस्सा नहीं है। आप दूरियों को, सीमाओं को नष्ट कर देना चाहते हैं। आप मैं और तुम के बीच के अंतर को खत्म कर देना चाहते हैं।

हम कहते हैं कि हम चेतना को विकसित कर रहे हैं। लेकिन असल में हम चेतना को विकसित नहीं कर रहे हैं। हम तो बस आपके अनुभव को गहराई प्रदान कर रहे हैं ताकि आप और अधिक सचेतन हो सकें।
बात चाहे सेक्सुअलिटी की हो, महत्वाकांक्षा की हो, प्रेम की हो या किसी को जीत लेने की, आप यही तो कर रहे हैं। जो आपका नहीं है, आप उसे भी अपना हिस्सा बना लेना चाहते हैं और यही योग है। योग का अर्थ है कि आप हर चीज के साथ एक हो गए हैं। दूसरे शब्दों में, आप जो हैं, उसकी सीमाओं को आपने तोड़ दिया है। इस बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय हम यह देख रहे हैं कि आपके भीतर ऐसा अनुभव कैसे पैदा किया जाए जो भौतिक से परे हो।

शांभवी महामुद्रा इसी मकसद के लिए है। यह आपको उस दिशा में ले जाती है। आप शरीर के साथ जुड़े हुए होते हैं, लेकिन आप उन पहलुओं का अनुभव करना शुरू कर देते हैं, जो आपकी शारीरिक सीमाओं से परे हैं। आप  शरीर में हैं, लेकिन आपको वे अनुभव हो रहे हैं, जो शरीर नहीं हैं। जीवन के आपके अनुभव आपके इस शरीर तक सीमित नहीं हैं। जीवन को आप एक बड़ी सी घटना के रूप में देखने लगते हैं। चेतना का विकसित होना यही है। हमारे शरीर को बनाने वाले पदार्थों को देखिए। यह सब कुछ समय पहले तक इस धरती में ही तो था। अब ये शरीर बन गया। जो कल तक आपका नहीं था, आज उसे आप अपने हिस्से के रूप में महसूस कर रहे हैं। जो भोजन कल आपकी थाली में था और आप उसे अपने से अलग मान रहे थे, वही भोजन जब आपने खा लिया तो वह आपका हिस्सा बन गया। कहने का मतलब है कि जो आपका हिस्सा नहीं है, आप उसे भी अपने हिस्से के रूप में महसूस कर सकते हैं, बस इसके लिए आपको उसे अपनी सीमाओं के भीतर समाना होगा। आप इस पूरे जगत को तो अपने भीतर नहीं समा सकते। आपको अपनी सीमाओं का विस्तार करना होगा। अपनी इंद्रियों की सीमाओं को इस तरह बढ़ाना कि अगर आप यहां बैठे हैं, तो पूरा का पूरा जगत आपको अपना हिस्सा महसूस हो, यही योग है। यही चेतना का विकास है। हम यह सब दार्शनिक तरीके से नहीं कर रहे हैं, हम आदर्श की बातें भी नहीं कर रहे हैं, हम तो यह सब तकनीकी प्रक्रिया के जरिये कर रहे हैं जिससे कि हर कोई इसका अनुभव कर सके।

सवाल उठता है कि तकनीक ही क्यों ही क्यों? दरअसल तकनीक का यह गुण होता है कि उसे जो कोई भी सीखने की कोशिश करता है, यह उसी के लिए काम करना शुरू कर देती है। बस आपको इसे सीखने की जरूरत है। आपको इसमें आंखें बंद करके भरोसा नहीं करना है, न ही इसकी पूजा करनी है, आपको इसे दिमाग में लेकर भी नहीं चलना है, आपको बस इसे प्रयोग करने का तरीका सीखना है और यह आपके लिए कम करने लगेगी। जो कोई भी इसे प्रयोग करना सीख लेता है, यह उसी के लिए काम करना शुरू कर देती है, चाहे वह कोई भी हो। इसीलिए कहा जाता है कि योग एक तकनीक है। आपको बस इसे इस्तेमाल करने का तरीका सीखना है।


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