आध्यात्मिक बनना चाहते हैं तो उतार दें अपना सुरक्षा कवच

योग ध्‍यान

सद्‌गुरुसद्‌गुरु हमें जुनून और करुणा में अंतर बताते हुए कहते हैं कि करुणा ऐसी स्थिति हैं जहां आपका जीवन के हर रूप के साथ बेहिचक जुड़ाव होता है। जानते हैं कि कैसे खुद को सुरक्षित रखने की हमारी मूल प्रकृति ही हमें करुणा का अनुभव करने से रोकती है

जब एक इंसान खुद के बारे में और सिर्फ  अपनी भलाई से ऊपर उठकर सोचने लगता है, तो वहीं अपने आप में एक मंदिर होता है। दरअसल,

पवित्रता किसी मूर्ति के चलते नहीं आती, पवित्रता किसी विश्वास के चलते भी नहीं आती, पवित्रता तब आती है, जब हम किसी न किसी रूप में खुद को जीवन-यापन की अपनी प्रवृत्ति से ऊपर उठाते हैं।
मानव मन का सिर्फ एक ही बुनियादी सवाल है – ‘मुझे क्या मिलेगा,’ अगर इस सोच को एक किनारे रख दिया जाए तो हर इंसान पवित्र है।

जुनून हममें कई कारणों से आता है, जैसे निजी दिलचस्पी या फिर कोई चीज हमें आकर्षित करती है और उसके बाद हम उसे लेकर जुनून से भर जाते हैं। जुनून की प्रकृति कुछ ऐसी है कि जब आप किसी व्यक्ति, वस्तु या किसी प्रक्रिया को लेकर जुनून में होते हैं, तब आपके लिए सिर्फ आप और वह व्यक्ति, चीज या प्रक्रिया ही मायने रखती है, बाकी सारी चीजें आपके अनुभव से बाहर हो जाती हैं। जुनून की प्रकृति ही ऐसी है, इसकी अपनी सुंदरता है, लेकिन ये आपको बाकी चीजों से अलग कर देता है।

जीवन के साथ बेहिचक जुड़ाव ही करुणा है

जुनून हमेशा विशिष्ट होता है, यह आपका होता है। जब आपका जुनून किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठकर थोड़ा परिपक्व हो जाता है और सबको समाहित करने लगता है तो यह करुणा बन जाता है। करुणा दया नहीं है, न ही किसी को भीख देना या दान करना करुणा है। अपने आसपास के जीवन के साथ बेहिचक जुड़ाव ही करुणा है। तब सवाल ‘क्या’ या ‘कौन’ का नहीं रह जाता, आप बस अपने आसपास जीवन के हर पहलू से जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। इस प्रक्रिया में आप जो कार्य करते हैं, उससे आपकी मानवीय क्षमता इस कदर खिल उठती है कि आप ऐसी चीजें करने लगते हैं, जो दूसरों को चमत्कार लगती हैं।

जब इंसान बिना किसी भेदभाव के जीवन के साथ शामिल होने की अवस्था में पहुंचता है, तब आप पाएंगे कि उसके काम से लोग उसे सुपर ह्यूमन समझने लगते हैं
। बात यहां सुपर ह्यूमन बनने की नहीं है, बल्कि बात यह महसूस करने की है एक ह्यूमन होना ही सुपर है। अगर आप एक भव्य और शानदार जीवन जीना चाहते हैं, अपनी जरूरतों में उलझा कष्टदायक जीवन न जीकर एक सही मायने में शानदार जीवन जीना चाहते हैं तो आपको अपनी व्यक्तित्व की चारदीवारी को मिटाना होगा। तभी आप जीवन को उसकी पूरी विशालता में देख व समझ पाएंगे। हम लोग जिस योग की बात कर रहे हैं, उसका आधार यही है।

पिछले दिनों मैं चेन्नई में कुछ बेहद खास लोगों के साथ था। उन लोगों की तरफ से मेरे सामने एक सवाल आया, ‘हमारी टेक्नोलॉजी अपने शिखर पर पहुंच चुकी है, हमारी अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ रही है, लेकिन लगता है कि आध्यात्मिक प्रक्रिया थम गई है।’ आध्यात्मिक प्रक्रिया थमी नहीं है, दुनिया आज पहले से ज्यादा आध्यात्मिक हो रही है। दरअसल आध्यात्मिकता का मतलब एक अनजाने स्रोत की तरफ ऊपर की ओर देखना नहीं है, और न ही आध्यात्मिकता का मतलब किसी एक ग्रंथ को अपने सिर पर लेकर घूमना है। इसी तरह, आध्यात्मिकता का मतलब किसी परंपरा या संस्कृति का पालन करना भी नहीं है। आध्यात्मिकता वह प्रक्रिया है, जहां आप अपनी भौतिक व मनोवैज्ञानिक सीमाओं को खत्म कर जीवन को इस तरह छूते हैं, जैसा करने के बारे में दुर्भाग्यवश अधिकांश लोग सोच भी नहीं सकते।

आध्यात्मिक प्रक्रिया अलग-अलग रूपों में विकसित होगी

जब आप बिना यह सोचे कि सामने कौन है, वह दुनिया के किस हिस्से से आता है, उसकी आपके लिए क्या अहमियत है, वे आपके अपने हैं या नहीं है, आप अपनी तरफ से अपना सबसे बेहतर करते हैं, तो यह गतिविधि भी आपको स्वाभाविक तौर पर आध्यात्मिकता की ओर ही ले जाती है। तो मैं उन लोगों को बता रहा था कि, ‘आपको लगता है कि आध्यात्मिक प्रक्रिया थम गई है, क्योंकि आज आध्यात्मिक राह पर चल रहे लोग वैसे नहीं दिखते, जैसा आप सोचते हैं कि उन्हें दिखना चाहिए। आपकी आध्यात्मिकता की सोच भारतीय कैलेंडर से आई है, बहुत पुराने अतीत से आई है। आप देखेंगे कि आध्यात्मिक प्रक्रिया अलग तरीकों से घटित हो रही है, ऐसे तरीकों से जिन्हें आप पहचान भी नहीं सकते, क्योंकि कौन आध्यात्मिक है और कौन आध्यात्मिक नहीं, इसे लेकर आपकी धारणा पहले से तय है।’

आपके मन में धारणा है कि अगर कोई आध्यात्मिक है, तो उसको एक खास तरह के कपड़े पहनने होंगे, कुछ खास तरह की किताबें पढऩी होंगी, ऐसी भाषा में बात करनी होगी, जिसे कोई न समझता हो। जबकि ऐसा नहीं है।
आप आध्यात्मिकता को बड़ी आसानी से घटित होते हुए देखेंगे, बहुत ही सामान्य तरीके से, यह हर वक्त घटित हो रही है। जब भी कोई इंसान गुजर-बसर की अपनी प्रवृत्ति से ऊपर उठकर दूसरे आयाम को छूता है, और उसी आयाम में आरूढ़ होकर काम करता है तो यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।

इसे साकार करने के लिए सबसे पहले हमें एक माहौल तैयार करने की जरूरत है, हमें एक ऐसी दुनिया तैयार करने की जरूरत है, जहां लोग आत्म-रक्षण की अपनी प्रवृत्ति को एक तरफ रख सकें। हमें अपने घरों में, अपने स्कूलों में, अपने काम करने की जगहों पर, सामान्य जगहों पर ऐसा माहौल तैयार करने की जरूरत है, जहां लोगों को अपने साथ सुरक्षा कवच ले जाने की जरूरत न हो। अगर हम ऐसा माहौल बनाने में सफल हो गए तो हम एक ऐसे समय और दौर की तरफ बढ़ेंगे, जहां करुणा का सागर लहराएगा, जहां ध्यान का सोता फूटेगा, जहां दुनिया में जबरदस्त आध्यात्मिक प्रक्रिया प्रवाहित होगी, क्योंकि आज मानव मन जिस तरह से इन सबके लिए तैयार है, वैसा पहले कभी नहीं था।


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