हमारे शरीर की प्राण प्रतिष्ठा

सद्गुरु समझा रहे हैं कि प्राण-प्रतिष्ठा का मुख्य उद्देश्य लोगों को प्रतिष्ठित रूपों में बदलना है – वे हाड़-मांस के शरीर के स्थान पर जीवित मंदिर बन सकते हैं।
 
 
 
 

'Sadhguru: तीर्थ एक अलग प्रकार की भाषा, एक अलग प्रकार की बोली है। लोग बोलते हैं ताकि जीवन को किसी रूप में दूसरों तक पहुँचा सकें। तीर्थ भी जीवन को दूसरों तक पहुँचाने का ही एक तरीका है, जीवन को सामने लाने के लिए एक विशेष प्रकार की भाषा। आप किसी चीज़ में मौजूद पांच तत्वों - जल, वायु, धरती, आकाश, अग्नि - को ऐसे प्रयोग में ला सकते हैं, जिस से वही चीज़ अपनी रासायनिक बनावट बदले बिना, बिल्कुल अलग तरह से पेश आएगी।'

दरअसल, यही चीज़ तो ईशा योग केंद्र को सबसे अलग बनाती है। अगर आप हर चीज़ – आकाश, हवा - के आण्विक व्यवहार को बदल सकते हों, तो आप इन पाँचों तत्वों को एक विशेष तरीके तैयार कर सकते हैं, जो कि जीवन के प्रति अनुकूल हो। आप उन्हें इस तरह भी प्रयोग में ला सकते हैं, जहाँ वे जीवन के लिए प्रतिकूल हो उठें।

यही आरोग्य व रोग, शांति व संघर्ष, आनंद व कष्ट, दुःख व परमानंद का अंतर है; बस यही है। ये सभी तत्व - जिस वायु में आप श्वास लेते हैं, जिस जल को आप पीते हैं, जिस भोजन को आप खाते हैं, जिस ग्रह पर आप रहते हैं, ये सब आपके साथ एक अलग तरह से व्यवहार कर सकते हैं। उसी वायु में श्वास लेते हुए तथा वही जल पीते हुए, कुछ लोग अपने लिए रोगों को बुलावा दे रहे हैं तो कुछ लोग आरोग्य पा रहे हैं। अगर आप तत्वों के साथ दुर्घटनावश या अवचेतन भाव से पेश आ रहे हैं, तो वे किसी भी तरीके से पेश आ सकते हैं। इन्हें सजग भाव से प्रयोग में लाने के उपाय भी मौजूद हैं।

तीर्थ, केवल एक भाषा है, जो भीतरी आयाम से बोलती है। अगर आप तीर्थकुंड के जल का परीक्षण करें, तो रसायनिक तौर पर, यह सौ प्रतिशत जल ही है, इसमें कुछ नहीं मिलाया गया पर इसे महसूस करें और देखें - तब यह आपको बहुत अलग लगेगा।

हमारा सारा काम, इस शरीर को उस दिव्य ऊर्जा का ही एक रूप बनाना है। इसे एक प्रतिष्ठित रूप में बदल देना है। जो अभी केवल मांस और हड्डी है, वो एक दिव्य रूप भी बन सकता है। यही तो स्वप्न है – माँस और अस्थियों के शरीरों को चलते-फिरते मंदिरों में बदलना है।