कैलाश पर्वत – शिव का निवास

सद्गुरु समझा रहे हैं कि कैलाश को शिव का निवास क्यों कहा जाता है, इसलिए नहीं कि वह कैलाश के शिखर पर बैठे हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने अपना सारा ज्ञान इस पर्वत में सुरक्षित रख दिया था।
 
 
 
 

कैलाश पर्वत – शिव का निवास


सद्‌गुरु: कैलाश के अपने अनुभव और समझ को मैं कभी व्यक्त नहीं कर सकता। मेरे लिए वह इतना बड़ा है कि मैं उसके लिए मरने को तैयार हूं। मैं बस इतना ही कह सकता हूं। जब पहले जैन तीर्थंकर ऋषैभदेव कैलाश पर्वत आए, तो उनका एक ध्येय था। उन्होंने कैलाश के बारे में बहुत कुछ सुना था। इसलिए उन्होंने सोचा कि वह इस सारे ज्ञान को समेट कर दुनिया के लिए कुछ करेंगे। जब पहले जैन तीर्थंकर ऋषभदेव कैलाश पर्वत आए, तो उनका एक ध्येय था। उन्होंने कैलाश के बारे में बहुत कुछ सुना था। इसलिए उन्होंने सोचा कि वह इस सारे ज्ञान को समेट कर दुनिया के लिए कुछ करेंगे। वह इस पूरी प्रक्रिया के प्रति ग्रहणशील व्यक्ति थे। कैलाश के संपर्क में आने के बाद, उस ज्ञान को लेकर दुनिया में जाने और कुछ करने की बजाय, उन्होंने इस पर्वत में विलीन होने का फैसला कर लिया। वह उसका एक हिस्सा बन गए। वह इस पूरी प्रक्रिया के प्रति ग्रहणशील मुनि थे। कैलाश के संपर्क में आने के बाद, उस ज्ञान को लेकर दुनिया में जाने और कुछ करने की बजाय, उन्होंने इस पर्वत में विलीन होने का फैसला कर लिया। वह उसका एक हिस्सा बन गए। थोड़ी गहराई में इसका स्वाद चखने वाले किसी भी प्राणी के लिए इस प्रलोभन से बचना मुश्किल है। जब आप इसके संपर्क में आते हैं, तो आप सोचने लगते हैं, ‘यही सब कुछ है, हम क्यों न ऐसा करें?’ बाकी सभी चीजें – हमने अपने लिए जो छोटे-मोटे लक्ष्य तय किए हैं, वे अर्थहीन हो जाते हैं। यह मृत्यु की कामना नहीं है। जब अमर होने का अवसर आपको दिखता है, तो वह एक जबर्दस्त प्रलोभन होता है। जब इतनी भव्य चीज का हिस्सा बनने की संभावना आपके सामने आती है, तो इस प्रलोभन से बचना मुश्किल हो जाता है।

कैलाश पर्वत एक जबर्दस्त आध्यात्मिक पुस्तकालय है। बौद्ध लोग कैलाश को अस्तित्व की धुरी मानते हैं। सुदूर पूर्वी एशियाई देशों से लेकर भारतीय उप-महाद्वीप और मध्य एशियाई देशों तक हर जगह, यहां तक कि मध्य पूर्व जितने दूर के स्थानों में भी कैलाश को सदियों से बहुत पवित्र जगह माना जाता रहा है। पिछले एक-दो सौ सालों में वह जागरूकता कम हुई है क्योंकि उसे बनाए रखने के लिए कोई सक्रिय संस्कृति नहीं है। मगर आज भी लोगों के ऐसे छोटे-छोटे समूह हैं, जो इस बारे में जागरूक हैं।

स्वयं शिव से शुरू करके, बहुत से महान योगियों ने कैलाश में अपना ज्ञान संरक्षित करने का फैसला किया। ऋषभदेव, बोन धर्म के संतों, दो महानतम बौद्ध गुरुओं, अगस्त्यमुनि, नयनमार - सभी ने कैलाश पर्वत को चुना।

हिंदू जीवन शैली में कैलाश को शिव का निवास कहा जाता है। योगिक संस्कृति में हम शिव को ईश्वर की तरह नहीं देखते। हम उन्हें प्रथम योगी या आदियोगी मानते हैं। साथ ही वह आदिगुरु या प्रथम गुरु भी थे। उन्होंने सबसे पहले अपने प्रथम सात शिष्यों, जिन्हें बाद में सप्तऋषि कहा गया, को योगिक विज्ञान का ज्ञान सौंपा। शिव वे महानतम रहस्यवादी या आध्यात्मिक गुरु हैं, जिन्हें हम जानते हैं। ‘शिव का निवास’ कहने का मतलब यह नहीं है कि चट्टानों में खोदने या बादलों में ढूंढने पर वह आपको मिल सकते हैं। इसका मतलब यह है कि वह जो कुछ जानते थे, वह कैलाश पर्वत में एक खास ऊर्जा रूप में सुरक्षित है। उन्होंने इस चोटी को अपने ज्ञान की मचान के रूप में चुना। शिव का ज्ञान और क्षमता, सब कुछ कैलाश में अब भी जीवंत है, जिसे आप प्राप्त कर सकते हैं। स्वयं शिव से शुरू करके, बहुत से महान योगियों ने कैलाश में अपना ज्ञान संरक्षित करने का फैसला किया। ऋषभदेव, बोन धर्म के संतों, दो महानतम बौद्ध गुरुओं, अगस्त्यमुनि, नयनमार - सभी ने कैलाश पर्वत को अपना ज्ञान संरक्षित करने के लिए चुना। दुर्भाग्यवश, धरती के ज्यादातर रहस्यवादी अगर अपना एक या दो फीसदी काम भी अपने आस-पास के लोगों के साथ साझा कर लें, तो वे बहुत भाग्यशाली हैं। बहुतों को इतना करने का भी अवसर नहीं मिलता। इसलिए वे हमेशा अपने काम को किसी ऐसी जगह सुरक्षित रख देने का फैसला करते हैं, जहां इंसानों की बहुत आवाजाही न हो, मगर साथ ही जो लोग जाना चाहें, वे वहां तक पहुंच सकें। कैलाश ऐसी ही जगह है। यह पूरी तरह अगम्य नहीं है, मगर वहां जाना बहुत कठिन है, जिसके कारण बहुत से लोग वहां नहीं जा पाते। भारत में ऐसी कई जगहें हैं।

ऐसी बहुत सी जगहें हैं, जहां रहस्यवादियों ने अपना ज्ञान सौंपा, मगर कैलाश उनमें सबसे विशिष्ट है।

दुर्भाग्यवश, बोध की स्पष्टता से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उसे ग्रहण करने के लिए लोगों को तैयार करना बहुत आसान नहीं है। आप अपने आस-पास के लोगों के लिए जो कुछ करते हैं, वह बहुत सीमित होता है। इसकी वजह सामाजिक प्रतिबंध और लोगों के सामने आने वाली वैयक्तिक समस्याएं – मनोवैज्ञानिक और भौतिक सीमाएं तथा कर्म के बंधन हैं। एक या दो ऐसे लोगों को तैयार करना, जो आपके सारे ज्ञान को ग्रहण करने में सक्षम हों, बहुत दुर्लभ है। बहुत कम ऐसे भाग्यशाली गुरु हुए हैं। बाकियों को सामाजिक नियमों तथा सीमाओं और लोगों की सीमाओं के दायरे में ही काम करना पड़ता है। इसलिए उनके ज्ञान का एक छोटा हिस्सा भी साझा नहीं हो पाता। इस स्थिति में पत्थर बहुत ग्रहणशील होते हैं। ऐसी बहुत सी जगहें हैं, जहां रहस्यवादियों ने अपना ज्ञान सौंपा, मगर कैलाश उनमें सबसे विशिष्ट है। सौंपे गए ज्ञान की मात्रा और विविधता के अर्थ में कैलाश सबसे महत्वपूर्ण है।

तीर्थ यात्रा का मूल उद्देश्य उन विश्वासों को थोड़ा कमजोर बनाना है जो आपने अपने बारे में बना रखें हैं । पहाड़ पर चढ़ाई या पर्वतारोहण जैसे साहसिक कार्य का मकसद हमेशा अपने अंदर उपलब्धि की भावना लाने के लिए होता है ताकि हम खुद को बड़ा महसूस कर सकें मगर तीर्थयात्रा का मकसद खुद को छोटा करना है। यात्रा के दौरान चलने, पहाड़ों पर चढ़ने और प्रकृति की बेहद मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने की प्रक्रिया में हम खुद नगण्य हो जाते हैं। प्राचीन काल में तीर्थयात्राओं की अधिकतर जगहें ऐसी होती थीं, जहां तक पहुंचने के लिए इंसान को बहुत शारीरिक व मानसिक मेहनत और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में इंसान खुद को जितना बड़ा समझता है, उससे कम महसूस करने लगता है। आज हमारे सामने ज्यादा आरामदेह स्थितियां हैं। हम हवाईजहाज से जाते हैं, फिर गाड़ी में बैठते हैं और बस थोड़ा-बहुत पैदल चलते हैं।…

तीर्थयात्रा का मूलभूत विचार प्राचीन समाज के मुकाबले आधुनिक समाजों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। गंतव्य के अर्थों में यह कैलाश तीर्थयात्रा शायद वो सबसे महान यात्रा है, जो हम कर सकते हैं।

शारीरिक तौर पर हम हजार साल पहले जैसे थे, उससे कहीं अधिक कमजोर हो गए हैं। यह विकास की क्रमिक अवस्था नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है, क्योंकि कहीं न कहीं हम उन सुविधाओं और सहूलियतों का ठीक से लाभ उठाना नहीं जानते, जिन्हें इंसान की प्रतिभा ने हमारे जीवन में ला दिया है। हमने इंसानी प्रतिभा से प्राप्त सुविधाओं और सहूलियतों का अपनी खुशहाली के लिए लाभ नहीं उठाया। हमने खुद को और कमजोर बनाने, अपने और अपने वातावरण के लिए अधिक कष्टदायक स्थितियां उत्पन्न के लिए उनका इस्तेमाल किया है। उन सुविधाओं और सहूलियतों के कारण ही धरती या धरती से मिलने वाली चीजें इंसानों के लिए अधिक मुश्किल होती जा रही हैं। तो, तीर्थयात्रा का मूलभूत विचार प्राचीन समाज के मुकाबले आधुनिक समाजों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। गंतव्य के अर्थों में यह कैलाश तीर्थयात्रा शायद वो सबसे महान यात्रा है, जो हम कर सकते हैं।