सद्‌गुरु और सांप - बचपन से ही रहा है एक करीबे रिश्ता

सांपों के विशेषज्ञ सद्‌गुरु की इन भव्य जीवों से करीबी दोस्ती है।
 
 
 
 

सद्‌गुरु के जीवन में साँप

सद्‌गुरु के जीवन में साँपों की सदा उपस्थिति रही है। कोबरा साँपों को तो सद्‌गुरु विशेष रूप से पसंद हैं!

सद्‌गुरु: दरअसल साँप किसी के भी साथ सहज भाव से रह सकते हैं। भारत में साँप को पूजा जाता है, उनमें से एक वजह यह भी है कि यह कुंडलिनी का प्रतीक है। भारत में, किसी साँप की मृत्यु हो जाए, तो उसका अंतिम संस्कार किया जाता है, क्योंकि शरीर के विकास की बात करें तो बंदरों को मनुष्य के निकट माना जा सकता है पर आत्मा के विकास की बात करें, तो एक साँप और गाय, मनुष्य की आत्मा के बहुत निकट हैं। यही कारण है कि उनकी ऊर्जा ऐसी होती है कि वे आपके हाथों में सहज भाव से रह सकते हैं - अगर आप साँप को देख कर सचेत और उत्तेजित न होंतो। जंगली जानवरों की बात करें तो, भले ही कोई भी जानवर हो, यहाँ तक कि एक कीड़ा भी पकड़े जाने पर, सहज महसूस नहीं करता। यह उसी समय आपको अपनी प्रतिक्रिया देगा। पर साँप ही एक ऐसा जानवर है, जिसे अगर आप बहुत ही कोमलता से अपने हाथों में उठा लें और उत्तेजित न हों, तो वह आपको कोई नुकसान नहीं करेगा।

मैं जंगलों में साँपों का आसानी से पता लगा सकता था। मैं उसे उसकी गंध से खोज लेता और जा कर पकड़ लेता...मैं जानता था कि उस समय, वह ठीक किस चट्टान के नीचे पाया जाएगा।

मेरे अंदर एक तरह का बोध पैदा हो गया था, जो इन दिनों मेरे सिस्टम में नहीं रहा क्योंकि मैं उसे प्रयोग में नहीं ला रहा। मेरे लिए वन में कोई साँप खोजना कठिन नहीं था। मैं उसे सूँघ कर पकड़ लेता। अगर मैं चामुंडी पहाड़ी पर किसी काम से जाता तो मुझे पता होता कि उस एक क्षण में, साँप किस पहाड़ी के नीचे पाया जाएगा। इन दिनों मैं ऐसा नहीं कर पाता, मेरे आसपास बहुत से लोगों और शहरी माहौल का असर रहने लगा है।

जब मैं स्कूल में था तो उसका कैंपस बहुत बड़ा था और कहीं न कहीं से साँप निकलते ही रहते थे। अधिकतर लोगों को साँपों से डर लगता था पर मैं उन्हें पकड़ लेता। मेरे लिए यह बड़ी बात नहीं थी और धीरे-धीरे मैं इसी काम के लिए जाना जाने लगा। जब भी शहर में, कहीं कोई साँप दिखाई देता तो वे उसे पकड़ने के लिए मुझे बुलाते। एक बार, मैं दोपहर को एक ट्यूबलाइट कारख़ाने से बुलावा आने पर गया। उन्होंने वहाँ एक बड़ा कोबरा देखा था और बीस-पच्चीस लोगों का काम ठप्प पड़ गया था। वहाँ भारी हलचल मची थी, मैंने जा कर उस कोबरा को पकड़ लिया, जो करीबन 12 फ़ीट लंबा रहा होगा। मैंने उसे पलंग के नीचे रखे जार में डाल कर, अपना पालतू बना लिया।

फिर एक दिन, मेरे पिता मेरे कमरे में आए तो उन्हें कुछ आवाज़ सुनाई दी। वे नीचे झुके और यहाँ-वहाँ देखा, उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर उन्होंने मेरे पलंग के नीचे देखा और डर के मारे चिल्ला उठे। जब मैं घर आया तो वे मारे गुस्से के बौखलाए हुए थे। वे बुरी तरह से डर गए थे और सारा घर सोफों और कुर्सियों पर खड़ा था, जबकि साँप तो अभी जार में ही बंद था। उन्होंने मुझे उसे छोड़ कर आने को कहा पर मैंने उसे छत पर रख दिया। वह साँप करीबन तीन साल तक मेरे साथ रहा। इसके बाद मैंने उसे फार्म में छोड़ दिया।

एक बार, जब मैं करीब सत्रह साल का था, मैं चट्टानों के पास खड़ा था कि अचानक मुझे एक नाग दिखाई दिया। मैंने उसे उठाया तो पता चला कि दरअसल वह एक नहीं बल्कि दो नाग थे। वह उनके मिलन की ऋतु नहीं थी पर किसी वजह से वे दोनों साथ लिपटे हुए थे। तो जब मैंने एक को उठाया तो दूसरा अलग हो कर, मेरे पैर पर गिर गया और मुझे चार बार काटा। मैंने अपनी साइकिल उठाई और सबसे पास दिखने वाले घर में जा पहुँचा, मैंने घर की मालकिन से कहा, ”मुझे एक नाग ने काट लिया है। क्या आप मुझे एक जग काली चाय बना कर दे सकती हैं?“ मैंने चार-पाँच कप चाय पी और घर वापिस आ गया। मुझे थोड़ी नींद सी आ रही थी। मैंने सोचा, ”जो हुआ सो हुआ, अब इस बारे में बात करने से क्या होगा?“ इसलिए मैंने अपनी माँ से कहा, ”बहुत थक गया हूँ इसलिए सोने जा रहा हूँ।“ और मैं सोने चला गया। मुझे लगा कि मेरे लिए तो सुबह होगी ही नहीं। जब अगली सुबह उठा तो पलकें भारी थीं और जोड़ो में हल्की जकड़न महसूस हो रही थी पर मैं जाग गया था, और अब आपके सामने मौजूद हूँ!

कई बार वे रात को गरमाहट पाना चाहते तो उनमें से एक, मेरे कंबल में घुस आता।

एक ऐसा भी समय था, जब मेरे सोने के कमरे में चारों ओर बीस नागों का बसेरा था। वे हर जगह दिखाई देते। उनके साथ रहने के लिए आपको एक तरह की सजगता और सर्तकता बरतनी पड़ती है। वे बहुत ही कमाल के होते हैं पर आपका एक ग़लत क़दम और आप जानते हैं कि क्या हो सकता है। मैं उस समय एक फार्म में रह रहा था। मैं उन्हें यूँ ही अपने सोने के कमरे में घूमने देता। कई बार वे रात को गरमाहट पाना चाहते तो उनमें से एक नाग, मेरे कंबल में घुस आता। जब आप इस तरह जीते हैं, तो आप हर काम को हौले-हौले करना और जीना सीख जाते हैं। आप अचानक झटके से कुछ नहीं करते और आप अपने शरीर की हर माँसपेशी को बहुत सावधानी और सजगता के साथ संभलकर इस्‍तेमाल करना सीखते हैं। वरना आपके लिए जीना मुश्किल हो सकता है। यह अभ्यास आपके जीवन में बहुत काम आता है।

यहाँ तक आज भी, मेरे घर में कुछ दोस्त रहते हैं। उनमें से एक मेरे बाग में रहता है, जो करीबन बारह फ़ीट लंबा है। जब हमने घर के आसपास चारीदीवारी बनाने के बारे में सोचा, तो हमने तय किया कि पश्चिमी दीवार में एक छेद रखवा देंगे ताकि वह अपनी मर्जी से आना-जाना जारी रख सके। पर उसकी शान तो देखो, उसे इस छेद से रेंग कर आना मंज़ूर नहीं है, वह हमेशा बड़े दरवाजे़ से ही घर में आता है!