ध्यान किया नहीं जा सकता

सद्गुरु समझा रहे हैं कि ध्यान कोई करने वाली चीज नहीं है, मगर व्यक्ति ध्यान की अवस्था में आ सकता है।
 
 

ध्यान किया नहीं जा सकता!

ध्यान किया नहीं जा सकता। जिन लोगों ने भी ध्यान करने की कोशिश की है, उनमें से ज्यादातर आखिरकार इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसे करना या तो बेहद मुश्किल है या फिर असंभव। और इसकी वजह यह है कि वे उसे करने की कोशिश कर रहे हैं। आप ध्यान नहीं कर सकते, लेकिन आप ध्यानमय हो सकते हैं।

सद्‌गुरु:‘मेडिटेशन’ शब्द को लेकर लोगों के दिमाग में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। सबसे पहली बात तो यह कि अंग्रेजी के मेडिटेशन शब्द का कोई सार्थक मतलब नहीं है। अगर आप बस आंखें बंद कर बैठ जाएं तब भी अंग्रेजी में इसे मेडिटेशन ही कहा जाएगा। आप आंखें बंद करके बहुत से काम कर सकते हैं। इसके कई आयाम हैं। आप जप, तप, धारण, समाधि, शून्य कुछ भी कर सकते हैं। या फिर हो सकता है आप सीधे बैठकर सोने की कला में माहिर हो गए हैं! तो आखिर वह चीज है क्या, जिसे हम मेडिटेशन कहते हैं? आमतौर पर हम ऐसा मान लेते हैं कि मेडिटेशन से लोगों का मतलब ध्यान से होता है। अगर आप ध्यान को मेडिटेशन समझते हैं तो यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप कर सकते हैं। कोई भी ध्यान “कर” नहीं सकता। जिन लोगों ने भी ध्यान करने की कोशिश की है, उनमें से ज्यादातर आखिरकार इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसे करना या तो बेहद मुश्किल है या फिर असंभव। और इसकी वजह यह है कि वे उसे करने की कोशिश कर रहे हैं। आप मेडिटेशन नहीं कर सकते, लेकिन आप मेडिटेटिव या ध्यानमय हो सकते हैं। ध्यान एक तरह का गुण है, यह कोई काम नहीं है। अगर आप अपने तन, मन, ऊर्जा और भावनाओं को परिपक्वता के एक खास स्तर तक ले जाते हैं, तो ध्यान अपने आप होने लगेगा। यह ऐसे ही है मानो आप किसी जमीन को उपजाऊ बनाए रखें, उसे वक्त पर खाद और पानी देते रहें और उसमें अच्छे बीज डाल दें तो निश्चित तौर पर उसमें फूल और फल जरूर लगेंगे। किसी पौधे पर फूल और फल इसलिए नहीं आते हैं, क्योंकि आप ऐसा चाहते हैं। बल्कि इसलिए आते हैं, क्योंकि आपने एक उचित वातावरण और अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दी है। ठीक इसी तरह अगर आप अपने अस्तित्व के चारों आयामों पर अपने भीतर भी जरूरी माहौल पैदा कर लें, तो ध्यान अपने आप आपके भीतर पनपने लगेगा। यह एक खुशबू है, जिसका कोई इंसान अपने भीतर आनंद ले सकता है।

ध्यान और मन

मन को ध्यान पसंद नहीं आता क्योंकि यदि आप शरीर को स्थिर रखेंगे, तो मन अपने आप स्थिर हो जाएगा।यही वजह है कि योग में हठ योग और आसनों पर इतना जोर दिया गया है। अगर आप सिर्फ अपने शरीर को पूरी तरह स्थिर और शांत रखना सीख लें, तो आपका मन भी स्वाभाविक रूप से स्थिर हो जाएगा। मैं चाहता हूं कि आप अपने आप को ध्यान से देखें कि जब आप खड़े होते हैं, बैठते या बोलते हैं, तो आपका शरीर कितनी अनावश्यक हरकतें करता है। अगर आप अपने जीवन को देखें, तो आप पाएंगे कि आधे से अधिक समय इन चीजों में चला जाता है, जिसकी आप खुद परवाह नहीं करते। अगर आप अपने शरीर को स्थिर रखेंगे, तो मन धीरे-धीरे ढहने लगेगा और उसे पता है कि अगर ऐसा हो जाए, तो उसे दास बनना पड़ेगा। ध्यान का मुख्य पहलू यह है कि अभी आपका मन आपका मालिक है और आप उसके दास हैं। जब आप ध्यान करते हैं और अधिक से अधिक ध्यानशील होते हैं, तो आप मालिक और मन आपका दास बन जाएगा। हमेशा यही स्थिति होनी चाहिए। अगर आप नहीं जानते कि मन को दास कैसे बनाना है, तो यह आपको हमेशा हर तरह की मुसीबत में डालता रहेगा। अगर आप उसे खुद पर हुक्म चलाने देते हैं, तो वह एक बहुत बुरा मालिक है। मगर एक दास के रूप में मन बहुत बढ़िया है, वह एक जादुई दास है।