Mahashivarathri 2017
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आदियोगी या पहले योगी को लोकप्रिय संस्कृति में शिव कहकर संबोधित करते हैं

-सद्गुरु

‘शिव’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है, ‘जो नहीं है’। अस्तित्व का आधार व इस ब्रह्माण्ड का बुनियादी गुण विशाल शून्यता ही है। तारामंडल बहुत ही छोटे हैं, पर बाकी सब गहरा अंधकार से भरा शून्य ही है। इसे ही शिव कहा जाता है: ऐसा गर्भ जिससे सब कुछ जन्मा है और ऐसी गुमनामी जिसमें सब कुछ विलीन हो जाएगा। इस तरह शिव की व्याख्या किसी जीव की तरह नहीं, अ-जीव की तरह होती हैै। और पढ़े

एक योगी वही है, जिसे सारे अस्तित्व का अनुभव खुद के रूप में हुआ हो। केवल शून्य ही सब कुछ थाम सकता है। जो योगी अस्तित्व की हर चीज़ का अपनी ही रूप में अनुभव करता है वही अस्तित्व के आधार, शिव का समानार्थी है। योग का विज्ञान आदियोगी से ही आरंभ हुआ। वे मानवीय चेतना को प्रकट करने के लिए शक्तिशाली साधनों को आगे लाए और मनुष्य के तंत्र को उसकी अधिकतम संभावना तक रूपांतरित करने के लिए हर संभव उपाय की खोज की।

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