शिव लिंगों और भक्ति के लिए बनें मंदिरों में क्या अंतर है?
लिंगों से जुड़े कई सवाल अक्सर लोगों के मन में उठते रहते हैं, जैसे कि क्या वे भारत में ही होते हैं? क्या सभी लिंग एक जैसे होते हैं? उनमें और दूसरे मंदिरों में क्या अंतर है? आइए इन्हीं सवालों का जवाब जानते हैंः
 
शिव लिंगों
 

प्रश्नः सद्‌गुरु, भारत में हर ओर लिंग दिखाई देते हैं। ध्यानलिंग अन्य लिंगों से किस तरह अलग है? क्या दुनिया के बाकी हिस्सों में भी लिंग हैं या यह विज्ञान केवल भारतीय संस्कृति तक ही सीमित है? आप यह भी कहते हैं कि यह एक धार्मिक प्रतीक नहीं है। ऐसा कैसे? ध्यानलिंग की रचना के पीछे क्या विज्ञान है?

सद्‌गुरु : लिंग को बनाने का विज्ञान एक अनुभव से जन्मा विज्ञान है, जो हजारों सालों से यहां मौजूद है। परंतु पिछले आठ-नौ सौ सालों में, खासतौर पर जब भारत में भक्ति आंदोलन की लहर फैली, तो मंदिर निर्माण का विज्ञान खो गया। एक भक्त के लिए अपनी भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता। उसका रास्ता भावनाओं का है। यह उसकी भावनाओं की ही ताकत होती है जिसके दम पर वह सबकुछ करता है। विज्ञान को किनारे करके वे मनचाहे तरीके से मंदिर बनाने लगे। यह एक लव-अफेयर होता है। एक भक्त जो जी में आए कर सकता है। उसके लिए सब जायज है क्योंकि उसके पास एक ही चीज है, वह है अपनी भावनाओं की ताकत। इसी वजह से लिंग रचना का विज्ञान भी खत्म होने लगा। वर्ना यह एक बहुत गहन विज्ञान था। यह एक सब्जेक्टिव(भीतरी) साईंस है। इसे कभी लिखा नहीं गया क्योंकि लिखने से इसके गलत समझे जाने की पूरी संभावना थी। विज्ञान की जानकारी के बिना अनेक लिंगों की स्थापना की गई।

अलग-अलग तरह के मंदिर

भक्तों द्वारा बनाए गए मंदिर वे स्थान हैं जहां लोगों में भाव पैदा होते हैं। केवल कुछ ही लोग सच्चे भक्त होते हैं। अधिकतर लोग भक्ति को कुछ मनचाहा पाने की करेंसी के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। दुनिया की अंठानवे प्रतिशत प्रार्थनाओं में भक्तों की माँगों के सिवा कुछ नहीं होता। ‘यह दे दो, वह दे दो। मेरी रक्षा करो।’ यह केवल जीवन बचाने और चलाने की बात है, इसमें कोई भक्ति-भाव नहीं है, इसमें कहीं कोई प्रार्थना का भाव भी नहीं है। ये बस जीवन यापन के बारे में है, बस आपने तरीका बदल दिया है।

आम तौर पर वैज्ञानिक आधार वाले लिंग वही हैं, जिन्हें सिद्धों व योगियों ने, वैज्ञानिक प्रक्रिया से तैयार किया। इनका मकसद मोक्ष है। उनका कंपन हमेशा के लिए है। अक्सर उन्हें मंत्रों के जाप द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था, जिनका एक खास मकसद और खास गुण होता था। शायद आपको पता नहीं होगा, दक्षिण भारत में प्रकृति के पांच तत्वों के लिए पांच लिंग हैं। ये पांच लिंग, पूजा के लिए नहीं, साधना के लिए बनाए गए हैं।

पंच तत्वों की साधना

योग की सबसे बुनियादी साधना है भूतशुद्धि। पंचभूत, प्रकृति के पांच तत्व हैं जिनसे आपका शरीर बना है। ये हैं - अग्नि, धरती, जल, वायु व आकाश। ये एक निश्चित तरीके से भौतिक देह के रूप में प्रकट होते हैं।

अगर कोई आध्यात्मिक साधना करना चाहे, तो उसे एक जीवंत गुरु की नजदीकी मिल सकती है। इसी उद्देश्य से ध्यानलिंग को रचा गया है।
आध्यात्मिक साधना का अर्थ है कि आप इस भौतिक प्रकृति से, इन पांच तत्वों से परे जाना चाहते हैं। आपके हर अनुभव पर इन तत्वों की गहरी पकड़ होती है। अगर इनसे पार जाना है तो आपको योग का बुनियादी अभ्यास करना होगा जिसे भूतशुद्धि कहते हैं। हर तत्व के लिए एक अभ्यास है, जिसे अपनाने के बाद आप उससे मुक्त हो सकते हैं। भूतशुद्धि अभ्यास के लिए ही उन्होंने पाँच अलग-अलग लिंगों की रचना की। धरती, जल, वायु, आकाश व अग्नि - हर एक के लिए अलग लिंग बनाए गए। उन लिंगों के लिए विशाल और अद्भुत मंदिरों की रचना हुई, जिनमें जा कर साधना की जा सकती थी। अगर आप जल की साधना करना चाहें तो आपको तिरुवनईकवल जाना होगा, आकाश तत्व की साधना के लिए चिदंबरम जाना होगा। इसी तरह अलग-अलग तत्वों की साधना के लिए अलग-अलग मंदिर जाना होगा। मंदिर ऐसे ही होने चाहिए, जिनमें किसी खास उद्देश्य के लिए ऊर्जा को खास तरह से रचा गया हो। ये मंदिर पूजा के लिए नहीं, साधना के लिए बनाए गए थे। भारतीय मंदिर प्रार्थना के लिए बने ही नहीं थे, उनमें पूजा नहीं होती थी। ये आजकल ही लोग ऐसा करने लगे हैं कि पाँच रुपए दे कर, ईश्वर से पता नहीं क्या-क्या मांगते रहते हैं। पारंपरिक तौर पर आपसे कहा जाता था कि अगर आप मंदिर जाएँ तो उस स्थान पर कुछ देर बैठें क्योंकि वे ऊर्जा के केंद्र हैं। यह एक तरह से पब्लिक चार्जिंग सेंटर हैं। आप हर रोज सुबह दुनियावी कामों को शुरु करने से पहले, नहाकर कुछ समय मंदिर में बैठते हैं, वहां की ऊर्जा ग्रहण करते हैं और खुद को ऊर्जान्वित करते हैं। फिर आप अच्छी तरंगों के साथ संसार में कदम रखते हैं।

संसार के अन्य स्थानों पर लिंग

अद्भुत बात यह है कि पूरी दुनिया में लिंग हैं। अफ्रीका में टेराकोटा के लिंग हैं जिन्हें तंत्र साधना के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ग्रीस में एक लिंग है जिसको ‘नेवल ऑफ़ द अर्थ’ कहते हैं। यह पूरी तरह से मणिपूरक है। इसे निश्चित तौर पर भारतीय योगियों ने बनाया होगा। किसी ने वहां मणिपूरक लिंग की प्रतिष्ठा की, क्योंकि वहां का राजा विजय, संपन्नता व कल्याण चाहता होगा। उन्होंने उस उद्देश्य के लिए एक साधन तैयार कर दिया। अधिकतर मंदिरों के निर्माण का पैसा राजा से मिलता था इसलिए मणिपूरक मंदिर बने, लेकिन कुछ राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने इन बातों से परे कुछ पाना चाहा, उन्होंने अनाहत लिंग बनवाए, जिन्हें आत्मलिंग भी कहा जाता है। ये आत्मलिंग प्रेम और भक्ति, और पूरी तरह से विसर्जित हो जाने के लिए होते हैं। अनाहत लिंग हर तरह के लोगों की पहुंच में होता है। कई मूलाधार लिंग हैं जो बहुत ही आधारभूत व बलशाली हैं, जिन्हें तंत्र विद्याओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आपको असम और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में ऐसे लिंग दिखेंगे। कुछ रहस्यमयी मंदिर हैं जो छोटे हैं पर गुप्त साधनाओं के लिहाज से गहरी क्षमता रखते हैं। लेकिन ज्यादातर लिंग मणिपूरक होते हैं।

सबसे ज्यादा विकसित प्राणी का ऊर्जा शरीर

इस समय, देश के अधिकतर लिंग केवल एक या दो चक्रों को ही दर्शाते हैं। अक्सर एक ही चक्र को दर्शाते हैं क्योंकि एक ही चक्र के लिए बना लिंग, खास मकसद के लिए बहुत ही बलशाली होता है। इनकी प्रतिष्ठा मंत्रों से की जाती है।  

ग्रीस में एक लिंग है जिसको ‘नेवल ऑफ़ द अर्थ’ कहते हैं। यह पूरी तरह से मणिपूरक है। इसे निश्चित तौर पर भारतीय योगियों ने बनाया होगा।
ध्यानलिंग एक ऐसा लिंग है जिसमें सातों चक्र हैं और इसकी प्राणप्रतिष्ठा की गई है, यानी इसकी प्रतिष्ठा प्राण से की गई है। सातों चक्र एक साथ लाना अपने-आप में बड़ी चुनौती थी। अगर मैं सातों चक्र के लिए सात अलग लिंग बनाना चाहता तो वह काम काफी आसान होता, लेकिन उनका वैसा असर नहीं होता। ध्यानलिंग का मतलब है, सबसे सबसे ऊंचे प्राणी का ऊर्जा शरीर, या आप कह सकते हैं कि यह उस सबसे ऊंचे देव, शिव का ऊर्जा शरीर है।

एक और बात, शायद संसार में पहली बार, ध्यानलिंग की देखभाल में स्त्री और पुरुष, दोनों को शामिल किया गया है। इससे पहले स्त्रियों को ऐसा काम कभी नहीं करने दिया गया। लेकिन आज, महिने में चौदह दिन - पूरा शुक्ल पक्ष, यानी पूर्णिमा तक - महिलाएँ ध्यानलिंग की देखभाल करती हैं। अगले चौदह दिन - पूरा कृष्ण पक्ष, यानी अमावस्या तक - पुरुष ध्यानलिंग की देखरेख करते हैं। मेरा मानना है कि यह समाज के लिए बड़ा उपहार होगा कि वह इन परंपराओं से परे जा सके। अगर कोई आध्यात्मिक साधना करना चाहे, तो उसे एक जीवंत गुरु की नजदीकी मिल सकती है। इसी उद्देश्य से ध्यानलिंग को रचा गया है। लोग आ कर बैठते हैं और चले जाते हैं, ठीक है, लेकिन जो लोग साधना करना चाहते हैं, वे उस ऊर्जा के साथ आत्मीयता हासिल कर सकते हैं जो अक्सर लोगों को नहीं मिल पाती। लोगों के लिए ऐसा अवसर उपलब्ध होना, बहुत ही दुर्लभ है।  

 
 
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