सद्‌गुरुइस बार के स्पॉट में सद्‌गुरु उम्र के पड़ावों की विशेषताओं के बारे में बता रहे हैं, और यह भी बता रहे हैं कि कैसे हमें इन चीज़ों से लगाव हो जाता है...

 

आयु और शाश्‍वतता -
आयु होती है शरीर की
और शाश्‍वतता है विषय आत्मा का।

वो जो हैं उलझे हुए
शरीर की गुत्थियों में,
चाह रखते हैं,
चिरकालिक यौवन की।

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अगर कोई बढ़ती आयु को रोक देना चाहता है -
तो क्या यह बचपन की मजबूरी है,
या किशोरावस्था की विवशता है?
या फिर मध्य उम्र की प्रौढ़ता?
ओह क्या कोई नहीं करता कदर
बुद्धि की परिपक्वता की,
जो बुजुर्गों का विशेषाधिकार है।

शैशव की कोमलता,
किशोरावस्था की नवीनता,
प्रौढ़ावस्था का नपा-तुला तरीका।
इन सबसे ऊपर है
आत्मा की परिपक्वता
जो जुड़ी नहीं है मृदुल देह से
ना ही सुन्दर कोमल त्वचा से
जो जुड़ी है सिर्फ
आध्यात्मिकता की बीज से।

निस्संदेह सबका अपना समय है
सबकी अपनी जगह है
पर जीवन का सौन्द्रर्य निहित है
आत्मा के खिलने में ही।