सद्गुरु
इस बार के स्पॉट में सद्‌गुरु एक साधक के प्रश्‍न का उत्तर दे रहे हैं। साधक जानना चाहता है कि काफी सारा समय इशा योग केंद्र से बाहर बिताने के बाद भी सद्‌गुरु योग केंद्र में रहने वाले साधकों का मार्गदर्शन कैसे करते हैं...

प्रश्‍न:

सद्‌गुरु, आपने कहा था कि आप अपनी बाहरी गतिविधियों को कम करके आश्रम से जुड़े आध्यात्मिक कामों पर ज्यादा ध्यान देंगे। क्या आप इस बारे में कुछ और रोशनी डाल सकते हैं?

 

सद्‌गुरु:

यह काम तो हम पहले ही कई तरीके से कर ही रहे हैं। मैंने अपनी बाहरी गतिविधयों को नहीं घटाया है, सच कहूं तो ये लगातार बढ़ ही रही हैं। लेकिन ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें हम धीरे-धीरे कदम-दर-कदम इसके लिए तैयार कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश चीजों को भौतिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, यह सहज रूप अपने आप हो सकती हैं। आपके अंदर सिर्फ एक चीज को छोड़कर कोई और कमी नहीं है। और वह कमी है कि आपने खुद को अपनी सीमाओं को अर्पित कर दिया है।आश्रम में कुछ ब्रम्हचारी काफी गंभीर साधना में लगे हुए हैं। हालांकि उनकी साधना के फलीभूत होने में कुछ वक्त लगेगा, लेकिन गहन साधना की प्रक्रिया जारी है। जब ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरह की गहन साधना में अपने आप को इस तरह कि साधना में स्थापित करने लगेंगे, तो हम लोग कई ऐसे दूसरों के लिए भी काफी कुछ कर सकते हैं - जो लोग शारीरिक व मनोवैज्ञानिक तौर पर काफी स्थिर हैं. और काफी समय से आश्रम में रह रहे हैं।

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ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस ओर प्रेरित करने के लिए हमने साल 2010 में अमेरिका में नब्बे दिन का ‘अनादि’ कार्यक्रम आयोजित किया था। वहां हमने जो भी कुछ किया था, वह अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण है। एक बड़े समूह के लिए ऐसी कोशिशें व आयोजन कम ही होते हैं। उनमें से कुछ लोगों ने काफी अच्छे से साधना की है, लेकिन आज की दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है कि लोग हर चीज में दो-दो दिन पर अपने विचार बदलते रहते हैं। उनमें दीर्घ काल या टिकने जैसा कोई भाव नहीं है। आदि शंकराचार्य ने कहा था- ‘निश्‍चलतत्वं जीवन मुक्तिः’। इसका मतलब हुआ कि किसी भी चीज या बिंदु पर अटल ध्यान या निश्चल ध्यान व्यक्ति को परम मुक्ति की ओर ले जाता है। यह ध्यान सिर्फ भगवान या स्वर्ग से संबंधित नहीं है। यह किसी भी चीज की ओर हो सकता है! अगर आप निश्चल होकर एक फूल पर ध्यान लगाएं तो यह घटित हो जाएगा। अगर आप निश्चल होकर एक चींटी पर ध्यान लगाएंगे, यह घटित हो जाएगा। किसी भी चीज पर ध्यान लगाएं, लेकिन यह निश्चल होना चाहिए। आपको अटल प्रेम में होने की जरूरत नहीं है, आप निश्चल होकर क्रोध भी कर सकते हैं, यह घटित होगा। आपका ध्यान किसी सुखद या अच्छी चीज की तरफ है या खराब चीज की तरफ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस आपका ध्यान निश्चल होना चाहिए। चीजें घटित होंगी। हालांकि आज के दौर में लोग के किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित न कर पाने को एक योग्यता के तौर पर लेने लगे हैं।

उन नब्बे दिनों के दौरान ‘अनादि’ में जो कुछ हुआ, उसका मैंने काफी कौतूहल के साथ निरीक्षण किया। मैंने देखा कि उन्हें क्या करने के लिए कहा गया था और कैसे उन्होंने किया, किस स्तर की साधना तक वे वहां पहुंचे और कैसे अच्छे खासे लोगों के विचार उस चीज के बारे में लगातार बदलते रहे, जिसके बारे में उन्हें अच्छी तरह पता था कि यह उनके लिए पूरी तरह से काम करेगी। अगर कोई चीज आपके लिए काम नहीं कर रही है तो उसकी चिंता मत कीजिए, उसे छोड़ दीजिए। लेकिन अगर किसी चीज ने आपके लिए जबरदस्त काम किया है और आप लगातार उसके बारे में विचार बदलते रहेंगे तो फिर आप इस बात पर भी ध्यान दें कि ऐसा करके आप अपनी अध्यात्मिक प्रगति में छोटे कदम उठा रहे हैं या बड़े कदम। पश्चिमी देशों में अपने विचार बदलने को बड़ी बात माना जाता है। वहां किसी भी चीज के प्रति अपना समर्पण न दिखाना आजादी की निशानी माना जाता है।

भारत की शहरी आबादी भी इस मामले में कोई खास पीछे नहीं है, उनमें भी यह आदत तेजी से घर कर रही है। भारतीय शहरी भी इसी मानसिकता में दिखाई देते हैं। आदि शंकराचार्य ने कहा था- ‘निश्चलतत्वम जीवन मुक्तिः’। इसका मतलब हुआ कि किसी भी चीज या बिंदु पर अटल ध्यान या निश्चल ध्यान व्यक्ति को परम मुक्ति की ओर ले जाता है। यह ध्यान सिर्फ भगवान या स्वर्ग से संबंधित नहीं है। यह किसी भी चीज की ओर हो सकता है! अगर कोई चीज उनके लिए अच्छी होगी तो भी वे इसपर टिक कर नहीं रह सकते। अगर आप लगातार बदलाव की मनोस्थिति में रहते हैं तो फिर हमें भी आपको परेशान नहीं करना चाहिए, क्योंकि चीजें इस तरह से काम नहीं करतीं। अगर हमें आपको जीवंत योग क्रिया न देकर कोई अन्य कामचलाउ अभ्यास सिखाना होता, तो हम उस अभ्यास या प्रक्रिया को कागज के एक टुकड़े पर लिखकर आपको थमा देते। लेकिन अगर कोई चीज हम अपने भीतर से आप तक पहुंचाना चाहते हैं तो उसमें जीवन-ऊर्जा लगती है। यह कोई आपका जीवन नहीं है कि जिसे अस्थिर रह कर आप बर्बाद कर रहे हैं, ऐसा करके आप मेरा जीवन बर्बाद कर रहे हैं। जिसे मैं मामूली बात नहीं समझता। सवाल है कि ऐसी जगह कोई चीज फेंकी ही क्यों जाए, जहां वह उग ही नहीं सकती? किसी भी मूल्यवान बीज को किसी पत्थर पर क्यों फेंका जाए? मैं एक उपजाऊ जमीन में उस बीज को बोना चाहूंगा। क्या आप इसके लिए मुझे दोषी ठहरा सकते हैं? अगर मैं उर्वर मिट्टी देखूंगा तो उस पर सारे बीज फैला दूंगा, लेकिन उन्हें पत्थर पर फैलाने का सवाल ही नहीं उठता।

इसीलिए हम चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे हैं, ताकि देख सकें कि कौन कैसा है फिर उसी हिसाब से हम आगे बढ़ेंगे। आप चाहें कोई भी हों, आप आश्रम में या नहीं हैं, मैं आपसे से मिला हूं या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां तक कि अगर मैं आपका नाम तक नहीं जानता, लेकिन आप अपनी साधना पूरी तरह से कर रहे हैं और अपने सिस्टम को तैयार कर रहे हैं तो समय आने पर हम खुद ब खुद आपका ध्यान रखेंगे। इसके लिए हमें इसके बारे में आपसे बात करने की भी जरूरत नहीं है। आप बस अपना सिस्टम तैयार कीजिए, बाकी सब हम देंख लेंगे।

अगर आपने खुद को खोलने की कोशिश की है, अगर आप खुद को खुद से अलग करने में सफल हो गए तो मैं आपको खाली हाथ नहीं रहने दूंगा और न ही आपकी कोशिश बेकार होने दूंगा। इसे लेकर आपको किसी तरह की चिंता नहीं होनी चाहिए। आपके अंदर सिर्फ एक चीज को छोड़कर कोई और कमी नहीं है। और वह कमी है कि आपने खुद को अपनी सीमाओं को अर्पित कर दिया है। आप अपने दिमाग और अपने शरीर की आदतों को अपने अंदर स्थापित न करें। बाकी सारा काम मैं करूंगा। यह मेरा वादा है, जिससे मैं पलट नहीं सकता।