मैं और शिव

यह कविता 'मैं और शिव' सद्‌गुरु के आंतरिक साम्राज्‍य की एक झलक प्रदान करती है ...
 
 
 
 

मैं और शिव

शिव और मैंने है मिलकर
लगाई एक भीषण आग

रखते हैं एक दूसरे को
हम उष्ण और खुशहाल

इस उष्णता का आनंद ले सकते हैं
कई करोड़ और भी इंसान

बनाएंगे हम एक पावन स्थान
जहां जानेगा हर कोई
इस उष्णता को।


Love & Grace