पूरी धरती पर गूंजे यह संदेश
15 हज़ार साल से भी पुरानी बात है, जब अदियोगी शिव ने मानव को एक अनमोल उपहार दिया था। सद्‌गुरु का लक्ष्य है- इस उपहार को हर मनुष्य तक पहुंचाया जाए। आज के सद्‌गुरु स्पॉट में जानिए उस अनमोल उपहार के बारे में ...
 
 
 
 

15 हज़ार साल से भी पुरानी बात है, जब अदियोगी शिव ने मानव को एक अनमोल उपहार दिया था। सद्‌गुरु का लक्ष्य है- इस उपहार को हर मनुष्य तक पहुंचाया जाए। आज के सद्‌गुरु स्पॉट में जानिए उस अनमोल उपहार के बारे में ... 

इसी दिन आदि योगी शिव ने योग विद्या देनी शुरू की थी और इसी दिन से वो आदिगुरु के रूप में भी जाने जाते हैं।
हम दक्षिणायन के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह वह समय है जब सूर्य और पृथ्वी का संबंध बदल जाता है - क्योंकी सूर्य की गति उत्तर के बजाय दक्षिणी की ओर हो जाती है। इस समय मानव शरीर के भीतर कुछ खास बदलाव आते हैं। साधना और लक्ष्य तय करने की लिए यह बदलाव बेहद सहायक होते हैं। यही वो समय है, जब किसान अपने खेतों की जुताई शुरू करते हैं। यही वो समय है, जब योगी पृथ्वी के अंश – इस शरीर को साधना से गूंध कर तैयार करना शुरू करते हैं। और यही वो समय है,जब हजारों साल पहले आदियोगी शिव की दिव्य दृष्टि मानव जाति पर पड़ी थी। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा कहलाती है।  इसी दिन आदि योगी शिव ने योग विद्या देनी शुरू की थी और इसी दिन से वो आदिगुरु के रूप में भी जाने जाते हैं। यह मुक्ति और परम तत्व तक पहुंचने की वो संभावना है, जिसके बारे में मनुष्य को पता नहीं था; और आज भी अधिकतर लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके जींस कैसे हैं, आपके पिता कौन थे। आप किन सीमाओं के साथ पैदा हुए या आगे चलकर कैसी और सीमाएं आपके साथ जुड़ गईं। असली चीज है कि अगर आप इन सीमाओं से परे जाने व उसके लिए कोशिश करने को इच्छुक हैं, तो आप इन सभी से परे जाकर परम तक पहुंच सकते हैं।

भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा को हमेशा से ही एक ऐसे दिन के रूप में देखा और मनाया जाता रहा है, जिस दिन मानव जाति के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। लेकिन जिन लोगों ने इस देश पर पीछले 300 सालों तक राज किया,उनकी अपनी ही कुछ योजनाएं थीं। उन्होंने देखा कि जब तक यहां के लोगों की आध्यात्मिक जड़ें गहरी और मजबूत हैं, तब तक आप उन पर राज नहीं कर सकते। आखिर गुरु पूर्णिमा के दिन छुट्टी क्यों नहीं होती? रविवार को ही छुट्टी क्यों होती है? आखिर आप रविवार को क्या करते हैं? पूरे दिन चिप्स खाकर टीवी देखते हैं? आपको तो यह भी नहीं पता कि इस दिन क्या करना चाहिए। लेकिन अगर किसी पूर्णिमा या अमावस्या के दिन छुट्टी हो तो हमें पता होगा कि हम क्या करना है?छुट्टी का दिन वो मौका है, जिसका उपयोग हम अपने कल्याण के लिए कर सकते हैं। कम से कम गुरु पूर्णिमा के दिन तो छुट्टी होनी चाहिए,ताकि लोग इस दिन का महत्व समझ सकें। अगर इंसान को ऐसा महत्चपूर्ण अवसर मिला है तो यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

मैं चाहता हूं कि आप सब इसे आगे बढ़ाएं। इस गुरु पूर्णिमा के दिन ऑफिस मत जाइए।
मैं चाहता हूं कि आप सब इसे आगे बढ़ाएं। इस गुरु पूर्णिमा के दिन ऑफिस मत जाइए। ऑफिस में छुट्टी की दरखास्त भेजिए और कहिए कि ‘आज गुरु पूर्णिमा है, मैं ऑफिस नहीं आ सकता’। अपने सभी दोस्तों से कहें कि वे भी गुरु पूर्णिमा पर छुट्टी लें। अब सवाल ये है कि आखिर आप इस दिन करेंगे क्या? यह पूरा दिन आप अपने कल्याण के लिए समर्पित कीजिए। इस दिन हल्का खाइए। अच्छा संगीत सुनिए; ध्यान कीजिए और पूर्णिमा की रात पूरे चांद को निहारते हुए चांदनी का आनंद लीजिए। यह अनुभव आपके लिए जबरदस्त होगा, क्योंकि दक्षिणायन संक्रांति के बाद की यह पहली पूर्णिमा है। कम से कम दस लोगों को बताइए कि यह दिन कितना महत्वपूर्ण है।

मेरे लिए मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काम ये है, कि पूरी दुनिया इस बात को जाने कि - आदि योगी ने मानवता को कितनी बड़ी और अनमोल संभावना भेंट की है। यह आदियोगी की ही भेंट है, कि अगर आप मेहनत करने के लिए तैयार हों तो - आप अपनी सभी सीमाओं से परे जा सकते हैं। मैं चाहता हूं कि तकरीबन 15,000 साल पहले दिया गया यह एक संदेश इस पूरी धरती पर गूंजे। भले ही लोग अपनी सीमाओं के परे जाने में सफल हों या न हों, लेकिन कम से कम वे इस बात जानें जरूर कि अगर वे अपनी जिंदगी में जरूरी फोकस रख पाते हैं, तो वे इस लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। इसे लेकर हम बहुत से कदम उठा रहे हैं।

 मैं चाहता हूं कि तकरीबन 15,000 साल पहले दिया गया यह एक संदेश इस पूरी धरती पर गूंजे।
इस दिशा में हमारा पहला कदम होगा कि गुरु पूर्णिमा के मौके पर, 12 जुलाई को हम आदि योगी की पहली प्रतिमा का अनावरण करेंगे। यह अनावरण ईशा योग केंद्र में होगा, जिसके लिए आप सभी आमंत्रित हैं। यह मूर्ति 21 फीट लंबी है। अनावरण के बाद यह मूर्ति अमेरिका ले जाई जाएगी, जहां इसे हमारे टेनेसी स्थित आश्रम में स्थापित किया जाएगा। यह तो केवल एक शुरुआत है। हम एक दूसरी मूर्ति भी बना रहे हैं, जो केवल आदियोगी का चेहरा होगा। यह तकरीबन 112 फीट लंबी होगी, जो शायद इस दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा होगा। हम अपने देश के चारों कोनों में ऐसी मूर्तियां स्थापित करना चाहते हैं, जिसमें से एक तो बेशक ईशा योग केंद्र में होगी। बाकि मूर्तियों की स्थापना आप सबको मिलकर करनी होगी।

मैं चाहता हूं कि यह संदेश हर इंसान तक पहुंचे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फिलहाल वो अपने जीवन में कैसे दौर से गुज़र रहे हैं - उनका संघर्ष, निराशा, पागलपन या चाहत - अगर वो मेहनत करने लिए तैयार हैं, तो वो इन सभी से परे जा सकते हैं। मैं चाहता हूं कि यह एक संदेश हर इंसान के दिलो-दिमाग पर अंकित हो जाए। मैं चाहता हूं कि आप सब अपनी कमर कस लें, और आप जो भी कर सकते हैं, वह करें और  इस संभावना को साकार कर दिखाएं।

Love & Grace

 
 
 
 
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