आध्यात्मिक खोज – आपको प्रेम की तलाश है या परम की?
एक खोजी शेरिल सिमोन ने अपनी रोचक जीवन-यात्रा को ‘मिडनाइट विद द मिस्टिक’ नामक किताब में व्यक्त किया है। इस स्तंभ में आप उसी किताब के हिंदी अनुवाद को एक धारावाहिक के रूप में पढ़ रहे हैं। पेश है इस धारावाहिक की अगली कड़ी जिसमें सद्‌गुरु ने उनसे सवाल पूछा कि वे प्रेम खोज रही हैं या फिर परम…:
 
आध्यात्मिक खोज – आपको प्रेम की तलाश है या परम की?
 

सफलता पाकर भी तृप्ति नहीं मिलती

मैंने जीवन के अपने सारे अनुभवों के बारे में सोचा - खुशी और हंसी-ठिठोली के इतने सारे पल। मैंने उस पल को भी याद किया जब मैंने यह महसूस किया था कि मुझे अपने व्यवसाय में सफलता मिलने वाली है।

आप अक्सर अपनी चीजों का आनंद इसलिए ले पाती हैं, क्योंकि आपको लगता है के ये विशेष या अनोखी हैं। यह वास्तविक आनंद नहीं है। 
बिलकुल कंगाली की हालत से निकलकर आखिर मैं खुद का घर खरीदने, अपनी पसंद के रेस्तराओं में जाने, यात्रा करने और अपनी पसंद की हर चीज करने लायक हो गयी थी। मुझे लगा कि मैंने सफलता पा ली है। लेकिन यह कभी भी पर्याप्त नहीं लगा। मेरे जीवन की अच्छी-से-अच्छी भव्य वस्तु ने भी मुझे पूरी तरह कभी संतोष नहीं दिया। सद्‌गुरु कहने लगे, ‘अधिकतर होता यह है कि बहुतों को कोई चीज पा लेने पर सफलता का आभास होता है, क्योंकि हर कोई उनको नहीं पा सकता। केवल इसी कारण से उनको विशेष माना जाता है। यदि दुनिया में हर कोई अरबपति होता तो आप अरबपति होने के पीछे इतना नहीं भागतीं। आप अक्सर अपनी चीजों का आनंद इसलिए ले पाती हैं, क्योंकि आपको लगता है के ये विशेष या अनोखी हैं। यह वास्तविक आनंद नहीं है। जब आप उस मुकाम पर पहुंच जाएं जहां आपको लगे कि ये सारी चीजें, चाहे वे कुछ भी हों, आपको सही मायनों में आनंद नहीं देतीं तब आप योग के लिए तैयार हैं। इसी कारण से पतंजलि योगसूत्र के आरंभ में कहते हैं, ‘और अब योग’। हम जीवन से होकर अनछुए ही गुजर जाते हैं। हम हमेशा एक सुखदायी सड़क पर चलना चाहते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं। चलिए हम सुखदायी सडक़ पर चलें, लेकिन आप अपना मन उसमें न डुबोयें।

भीतरी जीवन मुक्ति चुनना चाहता है

यदि आपका भाग्य आपके अपने हाथ में है तो आप बंधन चुनेंगी या मुक्ति? 

भले ही हममें से अधिकतर लोग शरीर की मृत्यु के बाद भी किसी चीज के होने में विश्वास रखते हैं फिर भी हम सबके शरीर ही हमारी पहचान हैं।
  आप मुक्ति चुनेंगी, क्योंकि हर जीव की सबसे गहरी लालसा उन प्रक्रियाओं से मुक्त होने की होती है जिनको हम जीवन और मृत्यु के नाम से जानते हैं। जब आपका भाग्य आपकी सचेतन अवस्था में चलेगा तो आपका अगला कदम अपने-आप बढ़ जाएगा, क्योंकि आपके भीतर के जीवन के पास बंधन नहीं मुक्ति चुनने का विवेक है। आप खुद को हर ओर से बंधनों में इसलिए जकड़ लेती हैं, क्योंकि आपका भाग्य अचेतन अवस्था में रचा जा रहा है।’ मैंने सिर हिलाया पर मेरा मन अपने विचारों में भटकने लगा था। मैंने समझ लिया कि मैं हमेशा ही अपने तन और मन से पहचानी जाती रही हूं। भले ही हममें से अधिकतर लोग शरीर की मृत्यु के बाद भी किसी चीज के होने में विश्वास रखते हैं फिर भी हम सबके शरीर ही हमारी पहचान हैं। मैं यह समझ तो पा रही थी, लेकिन इस समझ ने मेरी अनुभूति को नहीं बदला था।

मैंने सद्‌गुरु की कुछ मदद करनी चाही

मेरे मन के भटकने से पहले ही हम उत्तरी कैरोलिना पर्वतों के मोड़ तक पहुंच गये थे।  

सद्‌गुरु से भाग्य के बारे में मुझे और भी बहुत-कुछ पूछना था, पर मैं साथ ही यह भी निश्चित करना चाहती थी कि वे जब तक यहां रहें, मैं उनके अधिक-से-अधिक काम आ सकूं।
  सद्‌गुरु से भाग्य के बारे में मुझे और भी बहुत-कुछ पूछना था, पर मैं साथ ही यह भी निश्चित करना चाहती थी कि वे जब तक यहां रहें, मैं उनके अधिक-से-अधिक काम आ सकूं। इसलिए मैंने पूछा, ‘आप इस सप्ताह क्या करेंगे? क्या मैं कोई मदद कर सकती हूं?’ ‘क्या आप खाना बढ़िया बनाती हैं?’ उन्होंने पूछा और हंस पड़े। मैंने मुंह बनाकर स्वीकार किया, ‘नहीं। मैं थोड़ी-सी चीजें मिला-जुला कर कुछ पका लेती हूं, लेकिन मैं इसको खाना बनाना नहीं कहती।’ मैं निश्चित रूप से उनके लिए खाना बनाने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी। खास तौर से इसलिए क्योंकि मैं जानती थी कि उनकी सहायिका लीला, जो हमसे मेरे पहाड़ों वाले घर में दोपहर को मिलने वाली थीं, यह काम बहुत बढ़िया ढंग से कर सकती थीं। ‘फिर तो आप मेरे ज्यादा काम की नहीं हो सकतीं,’ वे बोले और फिर हंस पड़े। ‘नहीं, क्या मैं सचमुच आपके काम में किसी तरह की मदद कर सकती हूं? क्या आपको कोई चीज चाहिए?’ मैंने पूछा। मुझे ठीक से मालूम नहीं था कि उनका काम किस तरह का है। सच कहूं तो मुझे कोई संकेत चाहिए था। मैंने सुन रखा था कि उनके काम का मिस्टिकल हिस्सा अत्यंत महत्वपूर्ण है और उस बारे में वे बहुत कम चर्चा करते हैं।

सद्‌गुरु के कामों के अलग-अलग आयाम हैं

मैंने आशा नहीं की थी कि वे मुझे समझाएंगे लेकिन एक लंबी चुप्पी के बाद वे बोले, ‘शेरिल, आप कह सकती हैं कि मेरा परिवार बहुत विशाल है।

इसके अलावा लोग मुझसे केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन ही नहीं, बहुत-सी दूसरी मदद भी चाहते हैं। बहुत-से बीमार लोग भी हैं जिनको मुझे देखना होता है। 
  वे सारी दुनिया में फैले हुए हैं और कभी-कभी उनको देखरेख की जरूरत होती है। उनमें से कई सारे अपने सुख-चैन के लिए मेरे भरोसे रहते हैं। इसके और भी कई पहलू हैं जो आपके तार्किक मन के लिए कुछ अधिक साबित होंगे। आपको जानकर अचंभा होगा कि मैंने, मुझसे मिले लोगों से अधिक, बिना मिले लोगों को दीक्षा दी है। यहां भौतिक दूरी मायने नहीं रखती। इसके अलावा लोग मुझसे केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन ही नहीं, बहुत-सी दूसरी मदद भी चाहते हैं। बहुत-से बीमार लोग भी हैं जिनको मुझे देखना होता है। कभी-कभी जरूरत पड़ने पर मैं रूपांतरण की प्रक्रिया के दौरान लोगों की मदद करता हूं।’ जब सद्‌गुरु अपनी बात पूरी कर चुप हो गये तो मैं सोचने लगी कि यह सब वाकई मेरी समझ से बाहर है। मैं उनके बारे में सब-कुछ जान लेती तो कितना अच्छा होता! लेकिन लग रहा था कि वे इस बारे में कुछ और नहीं बोलना चाहते। इसलिए विषय बदलकर मैंने पूछा कि लीला को उनकी सहायिका बनने का ऐसा सौभाग्य कैसे मिल पाया कि वे उनके साथ इतना समय बिता पा रही हैं?’

सद्‌गुरु के सहायक स्वयंसेवियों का स्वभाव

‘वास्तव में अपनी यात्राओं में मुझे शांति चाहिए,’ उन्होंने कहा, ‘मुझे किसी के साथ की जरूरत नहीं होती। मैं अकेला होने पर ही अपने चरम पर होता हूं, लेकिन मेरा काम लोगों के साथ निरंतर गहरे जुड़ाव का है।

मैं उन व्यक्तियों को चुनता हूं जिन्होंने कुछ हद तक शांति को अपने अंदर समा लिया है या जिनमें संपूर्णता का एक भाव है ताकि उन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत न हो।
पूरा दिन मेरे साथ बहुत लोग होते हैं और उनके जीवन के साथ पूरी गहराई से जुड़ने में मुझे कोई हिचक नहीं होती, क्योंकि मुझे उलझनों का कोई भय नहीं होता। लोगों के साथ मेरा जुड़ाव संपूर्ण होता है। जब मैं निजी जगहों पर होता हूं तब कुछ लोगों को मेरे आसपास रहकर मेरी सहायता करने की अनुमति होती है। मैं उन व्यक्तियों को चुनता हूं जिन्होंने कुछ हद तक शांति को अपने अंदर समा लिया है या जिनमें संपूर्णता का एक भाव है ताकि उन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत न हो। हमारे सुर यों मिले होते हैं कि एक भी शब्द कहे बिना कई काम होते चले जाते हैं। कई मायनों में उन्होंने खुद को मेरा हिस्सा बना लिया है। मेरे आसपास होने पर भी उनके अंदर की बहुत कम हलचल के कारण मेरा एकांत बना रहता है। सुर मिले होने के कारण बिना किसी निर्देश या स्पष्टीकरण के वे सारे काम सही-सही कर लेते हैं।

सद्‌गुरु ने अधिकतर समय एकांत में बिताया

आप अपना स्थान और आतिथ्य मुझे दे रही हैं। पर मुझे खेद है कि मैं इसका आनंद लेने के लिए बहुत समय नहीं दे पाऊंगा। मैं अपना अधिकतर समय एकांत में ही बिताऊंगा। हां, शाम के समय मैं आप दोनों के साथ रहने की कोशिश करूंगा।’ उनकी बातों ने रहस्य को और बढ़ा दिया था। मैं समझ नहीं पाई कि क्या बोलूं। मैं मौन बैठी अपने अंदर शांति का अनुभव करती रही। घर पहुंचने तक, बाकी बचे थोड़े-से समय हम चुप बैठे रहे। घर के अहाते में पहुंचने पर मैंने डैशबोर्ड पर लगी घड़ी देखी। हम अनुमानित समय से पूरे पैंतालीस मिनट पहले ही पहुंच गये थे।

शेरिल, आप प्रेम ढूंढ़ रही हैं या परम?

जब सद्‌गुरु ने कार रोककर इंजन बंद किया तो एयरपोर्ट पर किसी की भेंट की हुई ‘रूमी ऐंथोलॉजी’ पुस्तक डैशबोर्ड से गिर गई।

एक पल के लिए मैं चौंक गयी। क्योंकि हवाई अड्डे पर यह प्रश्न पूछने पर उन्होंने जवाब नहीं दिया था। मैंने समझा था कि शायद उन्होंने नहीं सुना, लेकिन मीलों पार घंटों बाद उन्होंने वह प्रश्न झट से उठा लिया मानो समय बीता ही न हो।
 जैसे ही मैंने पुस्तक उठाई, आगे कुछ घटने का अहसास हुआ। शायद पुस्तक के गिरने से उनको बैगेज क्लेम के पास पूछा मेरा प्रश्न याद आ गया था - क्या प्रेम ही वह परम साध्य है जिसको कोई चाह सकता है? - क्योंकि सद्‌गुरु ने बहुत धीरे से मुझसे पूछा, ‘शेरिल, आप प्रेम ढूंढ़ रही हैं या परम?’ एक पल के लिए मैं चौंक गयी। क्योंकि हवाई अड्डे पर यह प्रश्न पूछने पर उन्होंने जवाब नहीं दिया था। मैंने समझा था कि शायद उन्होंने नहीं सुना, लेकिन मीलों पार घंटों बाद उन्होंने वह प्रश्न झट से उठा लिया मानो समय बीता ही न हो। मैंने उनके सवाल पर थोड़ा गौर करने के बाद कहा, ‘सद्‌गुरु, मैं परम को तो नहीं समझती, पर प्रेम क्या है मैं जानती हूं। और अगर जीवन में इससे अधिक कुछ है तो वह मुझे पाना है।’ उन्होंने सिर हिलाया और कहा, ‘हां, इससे अधिक है, बहुत-बहुत अधिक है।’

 
 
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