क्या मोबाइल और व्हाट्स एप्प ध्यान करने में बाधक हैं?
बहुत से साधकों को लगता है कि मोबाइल जैसे साधन उनके ध्यान को भटकाते हैं। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है? अगर हाँ, तो क्या करना चाहिए?
 
क्या मोबाइल और व्हाट्स एप्प ध्यान करने में बाधक हैं?
 

अगर आपको लगता है कि आपका फोन आपका ध्यान भटकाता है तो कल्पना कीजिए कि आप आदियोगी की तरह कैलाश पर बैठे हैं, जहां शून्य से भी 15 डिग्री कम तापमान है। ये कहीं ज्यादा ध्यान भटकाने वाला है। मोबाइल फोन तो आपकी सुविधा के लिए है। तकनीक की मदद लेने का मकसद अपनी गतिविधियों को आसान बनाना है ताकि आप अपने जीवन को विस्तार दे सकें। अगर आप अपना काम जल्दी खत्म कर लेंगे तो आपके पास ध्यान व साधना के लिए ज्यादा समय होगा।

एसटीडी के दिन कितने थकाऊ होते थे

आपको याद होगा कि कुछ दशक पहले तक अपने यहां लंबी दूरी की कॉल करना कितना मुश्किल व थकाऊ काम हुआ करता था।

नब्बे के दशक में जब हम ईशा फाउंडेशन बनाने के शुरुआती दौर में थे, उन दिनों मैं लगातार सड़कों पर ही होता था, शहर-शहर, गांव-गांव घूमता रहता था। 

नब्बे के दशक में जब हम ईशा फाउंडेशन बनाने के शुरुआती दौर में थे, उन दिनों मैं लगातार सड़कों पर ही होता था, शहर-शहर, गांव-गांव घूमता रहता था। उस समय हफ्ते में एक दिन मैं फोन करने के लिए चुनता था। उस दिन मुझे देश और विदेश में पचास से सौ कॉल करने होते थे। जब मैं तय करता कि आज मेरा ‘कॉल डे’ है तो मैं किसी गांव या कस्बे में रुकता और किसी बूथ पर चला जाता, जिन पर मोटे अक्षरों में नीले रंग से ‘एसटीडी’ लिखा रहता था।

 

सबसे पहले मैं उस बूथ के मालिक के पास जाकर कुछ हजार रुपये जमा करता। उसके बाद मैं फोन करना शुरू करता। सारे फोन निपटाने तक डायलिंग फोन के नंबर घुमा-घुमाकर मेरी उंगलिया घायल हो चुकी होतीं। इतना ही नहीं, वो काले फोन बेहद बदबूदार होते थे और उस बदबू भरे छोटे से बूथ में देर तक रहना कहीं से भी सुखकर नहीं होता था। आज तो हमें नंबर मिलाने के लिए हाथ को भी तकलीफ देने की जरूरत नहीं पड़ती। अगर मैं किसी का नाम ले लूं तो सैल फोन उसे कॉल लगा देगा।

मोबाइल और व्हाट्स एप्प परेशानी नहीं हैं

इन सुविधाओं का आंनद लेने की बजाय आप इनकी शिकायत कर रहे हैं।

 समस्या यह नहीं है कि हमारे पास सुविधाएं है, समस्या चेतना की कमी की है।

 अब यह सब एक समस्या इसलिए हो गया है, क्योंकि आप जब कोई काम करना शुरू करते हैं तो आपको पता ही नहीं होता कि कब रुकना है। यहां तक कि आसान से आसान चीजों के साथ भी यही होता है। अगर आप खाना शुरू करते हैं तो आपको पता ही नहीं होता कि आपको कब रुकना है। समस्या यह नहीं है कि हमारे पास सुविधाएं है, समस्या चेतना की कमी की है। जो चीजें हमारे जीवन को बेहतर व आसान बना सकती हैं, अपनी नासमझी के चलते हम उन्हें मुसीबत में बदल रहे हैं।

 

क्या आज यह संभव है कि वाट्सएप बज रहा है और हम शांत होकर स्थिर बैठ सकते हैं? बिल्कुल – आप अपने फोन को बंद कर दीजिए। आपके दखल के बिना भी यह दुनिया अच्छी तरह से चलती रहेगी। आपको इस चीज का अहसास तब होगा कि जब आप अपना फोन बंद कर देंगे। अगर आपको इस बात का अहसास हो गया तो आप कई चीजें समझदारी के साथ करेंगे।

अगर आप इस दुनिया से बहुत उलझते नहीं हैं, तो लोग आपके साथ खुश रहेंगे। लेकिन अगर आप इसमें बहुत ज्यादा उलझे रहेंगे तो लोग आपके मरने के बाद खुश होंगे। पसंद आपकी है। जब मैं कहीं से निकलता हूं तो आमतौर पर मैं किसी को बताने की कोशिश नहीं करता, लेकिन चंद लोग फिर भी किसी न किसी तरह से हवाई अड्डे पर पहुँच ही जाते हैं। मैं उनसे कहता हूं, ‘आप सब मेरे जाने पर इतने खुश क्यों हैं?’ इतना सुनते ही वे रोने लगते हैं। तब मैं उन्हें समझाता हूं, ‘अरे ठीक है भाई, मैं समझ गया।’ तो पंसद आपकी अपनी है – या तो आप लोगों के उस समय खुश होने का इंतजार करें, जब आप मरें या फिर आप अभी खुशियां बिखेरें।

 
 
 
 
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