महाभारत कथा : कृष्ण की मदद से अर्जुन ने जीता द्रौपदी का स्वयंवर

महाभारत की कहानी में द्रौपदी एक बहुत ही मुख्य चरित्र है, जिसके जन्म से लेकर शादी तक - सारी घटनाएं बेहद दिलचस्प है। तो आख़िर ऐसा क्या हुआ था उसके स्वयंवर में?
महाभारत कथा : कृष्ण की मदद से अर्जुन ने जीता द्रौपदी का स्वयंवर
 

द्रुपद ने अपनी बेटी द्रौपदी के लिए स्वयंवर की घोषणा की, जिसमें ऐसी प्रतियोगिता रखी गई कि सिर्फ सर्वश्रेष्ठ योद्धा ही उसे जीत सकता था।

पांचों पांडव भाइयों ने इस स्वयंवर के बारे में सुना। साथ ही भारतवर्ष के सभी क्षत्रियों को इस बारे में पता चला। जो भी योग्य उम्मीदवार थे, उन्हें आमंत्रित किया गया ताकि सबसे बहादुर और कुशल योद्धा द्रुपद का दामाद बन सके। आखिरकार, इस विवाह का मकसद द्रोण और कुरु परिवार से बदला लेना था।

सभी क्षत्रिय योद्धा पहुंचे स्वयंवर में

स्वयंवर का समय आया, तो ये सभी योद्धा वहां इकट्ठा हुए, जिनमें दुर्योधन और कौरव, कर्ण तथा पांडव शामिल थे। पांडव भाई अब भी अपने असली वेश में नहीं थे। कोई नहीं जानता था कि वे अब भी जीवित हैं, सिवाय कृष्ण के, जिन्होंने अपने गुप्तचर भेजकर पता लगवा लिया था कि आग में जलकर कुंती और पांडव भाई नहीं, बल्कि निषाद स्त्री और उसके पांच बच्चों की मृत्यु हुई थी। वह नहीं जानते थे कि पांडव इस समय कहां हैं मगर उनके मन में कोई संदेह नहीं था कि यह खबर मिलने के बाद वे रुक नहीं पाएंगे और निश्चित रूप से प्रतियोगिता में भाग लेंगे।

जब कर्ण आया, तो कृष्ण ने आंखें बंद करके द्रौपदी से कहा, ‘मुझे तुम्हारे लिए डर लग रहा है क्योंकि यह नहीं होना चाहिए। यह शख्स इसमें सफल हो जाएगा।’
कृष्ण के यादव योद्धा स्वयंवर के स्थान के चारों ओर फैल गए ताकि कोई समस्या आने पर मदद कर सकें। हर कोई द्रौपदी का हाथ चाहता था। इसकी एक वजह यह थी कि वह बेहद सुंदर स्त्री थी, दूसरी वजह यह थी कि द्रुपद बहुत शक्तिशाली राजा थे। उनका साम्राज्य बहुत विशाल था, जिसके साथ हर कोई संबंध बनाना चाहता था। प्रतियोगिता के दिन खूब चहल-पहल थी। हर उम्मीदवार ने आकर अपनी किस्मत आजमाई। मगर कई लोग तो यह भी नहीं जानते थे कि इस विशेष धनुष पर प्रत्यंचा कैसे चढ़ाई जाती है। जो लोग किसी तरह प्रत्यंचा चढ़ा पाए, वे सिर्फ घूमती हुई मछली की परछाईं देखकर सीधा तीर नहीं चला पाए।

दुर्योधन ने लक्ष्य भेदने की कोशिश नहीं की

दुर्योधन वहां जाकर खुद चुनौती को जीतना चाहता था, मगर वह मौका गंवाना नहीं चाहता था इसलिए पहले उसने अपने भाई दु:शासन को भेजा ताकि वह चुनौती को आजमाए मगर उसे जीते नहीं। दु:शासन एक अभिमानी और साहसी योद्धा था, उसने जाकर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशिश की मगर सफल नहीं हो पाया। यह देखकर कि उसका भाई इसे नहीं कर पाया, दुर्योधन भी हारने की शर्म से बचने के लिए वहां से चला गया। फिर कर्ण आगे आया, वह इस प्रतियोगिता के लिए आने वाले योद्धाओं में अंतिम था। वह अकड़ के साथ अंदर आया, आराम से धनुष पर प्रत्यंचा चढाई और तीर चलाने के लिए तैयार हो गया। उसे देखकर अर्जुन समझ गया कि वह मछली की आंख भेद सकता है। मगर वह यह भी जानता था कि हालांकि दुर्योधन ने उसे राजा बना दिया है, मगर अब भी उसे एक सूतपुत्र की तरह ही देखा जाता है। इसी तरह कृष्ण ने देखा कि कर्ण का प्रतियोगिता में आना उनकी योजना का हिस्सा नहीं था, और इस भयंकर योद्धा में कामयाब होने की क़ाबिलियत भी थी।

कृष्ण के संकेत का इंतज़ार कर रही थी द्रौपदी

हर बार जब एक नया योद्धा आता, तो द्रौपदी कृष्ण की ओर देखती। वह उनके संकेत की प्रतीक्षा करती कि यह उसके लिए उपयुक्त वर है या नहीं। अब तक हर बार कृष्ण मुस्कुराते हुए इस पूरे तमाशे का आनंद उठा रहे थे। फिर वह जान जाती कि वह उपयुक्त नहीं है। वैसे भी बहुत सारे लोग धनुष पर प्रत्यंचा तक नहीं चढ़ा पा रहे थे, मछली की आंख को भेदना तो दूर की बात थी। लेकिन फिर भी द्रौपदी जिसे चाहे, उसे चुन सकती थी चाहे वह मुकाबले में सफल हुआ हो या नहीं। जब कर्ण आया, तो कृष्ण ने आंखें बंद करके द्रौपदी से कहा, ‘मुझे तुम्हारे लिए डर लग रहा है क्योंकि यह नहीं होना चाहिए। यह शख्स इसमें सफल हो जाएगा।’ द्रौपदी वहां अपने हाथ में वरमाला लेकर खड़ी थी और उसका भाई धृष्टद्युम्न उसके बगल में खड़ा था। जब कर्ण पास आया, तो वह अपने भाई से जोर से बोली, ताकि कर्ण भी यह बात सुन सके, ‘मैं एक सूत से विवाह नहीं करना चाहती।’ उसने ‘सूतपुत्र’ भी नहीं कहा।

धृष्टद्युम्न ने घोषणा की, ‘मेरी बहन एक सूत से विवाह नहीं करना चाहती। इसलिए प्रयास करने का भी कष्ट मत उठाओ।’ पूरी सभा के सामने शर्मिेदा होकर कर्ण ने सिर झुका लिया मगर द्रौपदी को प्रतिशोध की भावना से देखकर कहा, ‘जब मेरा समय आएगा तो मैं तुम्हें नहीं बख्शूंगा।’ वह अपमान में जलता हुआ वहां से चला गया। फिर एक ब्राह्मण युवक का वेश धरे अर्जुन उठकर सामने आया और कहा, ‘अब जबकि कोई क्षत्रिय इस मुकाबले को नहीं जीत पाया है, क्या मैं कोशिश कर सकता हूं?’ धृष्टद्युम्न चकरा गया, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसे एक ब्राह्मण को इसमें शामिल करना चाहिए या नहीं। उसने कृष्ण की तरफ देखा। कृष्ण ने जानबूझकर कोई चीज नीचे गिरा दी और उसे उठाने के लिए नीचे झुके, जिसका अर्थ हां था। धृष्टद्युम्न बोला, ‘हां, यदि आप मुकाबला करना चाहते हों, तो कर सकते हैं। मगर सभी योद्धा विफल हो चुके हैं, आप इसे कैसे कर पाएंगे?’

अर्जुन ने भेद दिया लक्ष्य

ब्राह्मण युवक सामने आया, उसने धनुष की तीन बार परिक्रमा की, उसके सामने दंडवत प्रणाम किया मानो वही उसके भाग्य की चरम परिणति हो। फिर उसने धनुष उठाया, आसानी से उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और परछाईं में देखकर तीर चला दिया। हर योद्धा को मछली की आंख में तीर मारने के पांच मौके मिलने थे। उसने इतनी जल्दी-जल्दी पांच तीर चलाए कि मछली की आंख में तीरों की कतार जाकर लगी और मछली गिर पड़ी। इस प्रतियोगिता को देखने आए ब्राह्मणों और गैर क्षत्रियों की ओर से तालियां गूंज उठी। मगर क्षत्रिय क्रोध में दहाड़ उठे, ‘यह ठीक नहीं है। एक राजकुमारी एक ब्राह्मण से विवाह कैसे कर सकती है? अब एक ब्राह्मण ने मुकाबला जीता है और आर्य धर्म के अनुसार हम ब्राह्मण की हत्या नहीं कर सकते हैं। मगर धृष्टद्युम्न ने ही उसे प्रतियोगिता में शामिल होने दिया। हम उसे मार डालते हैं।’ उन सभी ने अपनी-अपनी तलवारें निकाल लीं।

आगे जारी. . .  कैसे मिले द्रौपदी को पाँच पति?

 
 
 
 
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