होली – खुद को अधिक से अधिक जीवंत बनाने का उत्‍सव
क्या कुछ रंगो से ख़ुद को और दूसरों को गिला कर लेना ही होली है? या फिर इसका कोई और भी अर्थ है? जानते हैं वसंत ऋतू के इस त्यौहार के बारे और पुरानी चीज़ों को जलाने की परम्परा के बारे में।
 
होली – खुद को अधिक से अधिक जीवंत बनाने का उत्‍सव
 

सद्‌गुरु : आज होली है। इसका मतलब यह पहचानना है कि जीवन दरअसल बहुत उल्लासमय प्रक्रिया है। मगर इंसान यह नहीं जानता कि वह अपनी दिमागी क्षमताओं, ख़ास तौर पर दो सबसे बुनियादी क़ाबिलियत - याददाश्त और कल्पना को कैसे संभाले। इसलिए हर वह चीज जो लोगों को याद नहीं रखनी चाहिए, उन्हें वे याद रखते हैं और जिन चीजों को याद रखना चाहिए, उन्हें भूल जाते हैं। वे हर तरह की कल्पनाएं करते हैं जो उन्हें नहीं करनी चाहिए, और किसी ऐसी चीज की कल्पना नहीं कर पाते जो उनके जीवन को सुंदर बना सकती है। जो लोग होली के बारे में नहीं जानते, उनके लिए यह जानकारी है कि इस दिन देश भर में लोग एक-दूसरे पर रंग फेंकते हैं। वे खुद को रंग से सराबोर कर लेते हैं। इस दिन लोग सिर से पांव तक अलग-अलग रंगों में रंगे होते हैं, जो यह दर्शाता है कि जीवन का मूल तत्व है, उल्लास।

पुरानी गैरजरूरी चीज़ों को जलाना होगा

होली का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं।

इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं।
इसका मकसद पुराने कपड़ों को जलाना नहीं, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और उल्लासमय जीवन के रूप में शुरुआत कर सकें। आज वही दिन है, और आज ही आप सब बहुत गंभीरता से मेरी और देख रहे हैं! भारत में यह वसंत के मौसम का आखिरी हिस्सा होता है, जिस समय फूलों का एक दूसरा दौर आता है। मगर दुर्भाग्य से इस साल (वर्ष 2017) सूखे के कारण पिछले छह-सात सालों में पहली बार पहाड़ भूरे दिख रहे हैं। पच्चीस साल पहले वे भूरे दिखते थे, फिर हमने इस पहाड़ पर पौधे लगाए। मगर पिछले छह, सात, आठ सालों में वह कभी भूरा नहीं दिखा। वह हमेशा हरा-भरा रहा है। इस साल करीब पांच महीनों से बारिश न होने के कारण यह भूरा हो गया है। मगर खास तौर पर जब पौधों में फूल नहीं आ सकते, तो इंसान को कुछ मदद करनी चाहिए। पौधे पोषण की कमी के कारण फूल नहीं खिला सकते। आप तो कुपोषित नहीं हैं! तो आपको इसकी भरपाई करनी चाहिए। अगर सूखे के कारण पौधों में फूल नहीं खिल सकते, तो आपको अपनी मुस्कुराहटों और खुशी और उल्लास से उसकी भरपाई करनी चाहिए क्योंकि जब प्रकृति विफल होती है, तो इंसान को कोशिश करनी चाहिए।

खुद को लगातार भाषण देना बंद करना होगा

बहुत से लोगों के साथ दिक्कत यह है कि वे लगातार खुद को भाषण देते रहते हैं।

आपमें से कई लोगों की पत्नी या पति नहीं हैं, मगर फिर भी आप हर समय अपने ही भाषण में डूबे रहते हैं। इसे कहते हैं, अपनी मदद करना!
सत्संग में बैठकर भी वे हमेशा मेरी बात नहीं सुन रहे होते, वे भाषण का एक पैरलल कार्यक्रम चला रहे होते हैं, चाहे वह दिन या रात का कोई भी समय हो। एक रात ऐसा हुआ, शंकरन पिल्लै घर जा रहे थे। सुबह के दो बज रहे थे। वे सीधा भी नहीं चल पा रहे थे। यह कमबख्त धरती गोल है, इस पर सीधा कैसे चलें? तो वह थोड़ा लड़खड़ा रहे थे। रात की गश्त पर मौजूद पुलिसवाले ने उनको रोककर कहा, ‘अरे तुम्हारे पैर सीधे नहीं पड़ रहे हैं, इस वक्त तुम कहां जा रहे हो?’ शंकरन पिल्लै बोला, ‘मैं एक भाषण सुनने जा रहा हूं।’ पुलिसवाला बोला, ‘पागल हो, सुबह के दो बजे कौन भाषण देता है?’ शंकरन पिल्लै ने कहा, ‘आप मेरी बीवी को नहीं जानते। चाहे मैं किसी भी समय लौटूं, मुझे भाषण सुनाती है।’ आपमें से कई लोगों की पत्नी या पति नहीं हैं, मगर फिर भी आप हर समय अपने ही भाषण में डूबे रहते हैं। इसे कहते हैं, अपनी मदद करना!

विचारों को छोड़ने का सरल तरीका

लगातार अपनी ही बकवास में डूबे रहने का यह काम बंद करना चाहिए। अधिकांश लोगों को यह असंभव लगता है। इसकी वजह यह है कि उन्होंने अपने विचारों से अपनी पहचान बनाना बंद नहीं किया है।

अगर आप सिर्फ यह समझ लें, ‘मेरे मन में जो चल रहा है, वह असल में मेरा नहीं है,’ फिर आप देखेंगे कि वह कुछ समय के लिए चक्कर काटता रहेगा और फिर उड़ जाएगा।
 एक बार जब आप उससे अपनी पहचान जोड़ लेते हैं, तो आप उसे नहीं रोक सकते। उसे रोकने की कोई जरूरत नहीं है, आपको बस उससे अपनी पहचान खत्म करनी है क्योंकि आपके विचारों की विषय-वस्तु बाहर से आई है। आपके विचारों की विषय वस्तु आपकी अपनी नहीं है, उधार की है। अगर आप सिर्फ यह समझ लें, ‘यह मेरी नहीं है’ आपको बस यही करना है, आपको उसे छोड़ना नहीं है। अगर आप सिर्फ यह समझ लें, ‘मेरे मन में जो चल रहा है, वह असल में मेरा नहीं है,’ फिर आप देखेंगे कि वह कुछ समय के लिए चक्कर काटता रहेगा और फिर उड़ जाएगा। आप उससे अपनी पहचान इस कदर जोड़ लेते हैं कि वह आपका हो जाता है और आपको लगता है कि वह एक बुद्धिमानी भरा विचार है, जबकि वह मूर्खतापूर्ण होता है।

हर किसी को वह मूर्खतापूर्ण लगता है मगर आपको वह बुद्धिमानी भरा नजर आता है। चाहे वह आपका जीवन अस्त-व्यस्त कर दे, चाहे वह आपको एक जगह न बैठने दे- अगर परमानंद में न सही तो कम से कम शांति में, मगर फिर भी आपको लगता है कि वह बुद्धिमानी भरा विचार है। अगर आप यह भी नहीं जानते कि सहज कैसे रहें, तो यह कोई बुद्धिमानी नहीं है। आप सहजता से जीना भी नहीं जानते, इसे आप बुद्धिमानी कैसे कह सकते हैं? इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं है। यह जीने का सबसे मूर्खतापूर्ण तरीका है। लेकिन आप उसमें इतना रमे हुए हैं, कि उसे छोड़ नहीं सकते। आज होली है, पुराने को जला डालने का समय। बारिश की कमी के कारण वसंत का मौसम दिख नहीं रहा है, इसलिए आप अपने भीतर वसंत लाइए। जीवंतता के अलग-अलग स्तर होते हैं। वसंत, होली का समय है, हम चाहते हैं कि आप अधिकतम जीवंतता के साथ रहें। मैंने यह नहीं कहा कि उसमें शोरगुल होना चाहिए, अधिकतम जीवंतता होनी चाहिए। इस साल फूल नहीं हैं, तो आपको उसकी भरपाई करनी है क्योंकि आपके पास बस यही चीज है – जीवंतता। आपके पास बस यही एक चीज है, बाकी सब आपकी बकवास है।

 
 
 
 
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