तब ब्रह्मोपदेश दिया जाता था
भारतीय संस्कृति में शिक्षा की शुरुआत हमेशा कुछ शुरुआती रस्मों के बाद होती थी, क्योंकि शिक्षा को शक्ति की तरह से देखा जाता है। शिक्षा शुरू करने से पहले बच्चे एक खास प्रक्रिया से गुजरते थे, जिसे ब्रह्मोपदेश कहते हैं।
 
 

 तब आनुभविक तौर से बच्चे की जिंदगी में यह भाव पैदा किया जाता था, जिससे उसके मन में इस दुनिया की हर चीज के प्रति जिम्मेदार का भाव पैदा हों। शिक्षा की शुरुआत इसके बाद ही होती थी।

ब्रह्मोपदेश की प्रक्रिया में जो बुनियादी मंत्र बच्चे को सिखाया जाता था, वह है 'अहम ब्रह्मास्मि' जिसका अर्थ है 'मैं ब्रह्म हूं'। दरअसल, जब आप कहते हैं कि 'मैं ब्रह्म हूं' तो इसका मतलब है कि आप कह रहे हैं कि मैं हर चीज के लिए जिम्मेदार हूं।
अगर किसी में क्षमता है, साथ ही वह अनियंत्रित और निरंकुश है और उसके दिल में प्रेम भी नहीं है, तो यह बड़ी खतरनाक स्थिति होती है। ऐसी हालत में आप अडोल्फ हिटलर जैसे हो सकते हैं। दुनिया में बड़ी तादाद में अडोल्फ हिटलर हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि उनमें से ज्यादातर अक्षम हैं। उनके भीतर उस तरह की सांगठनिक क्षमता नहीं है, जैसी जर्मनी के अडोल्फ हिटलर में थी। आपके भीतर भी एक अडोल्फ हिटलर है जो हर किसी पर राज करना चाहता है, लेकिन सौभाग्य से आप उतने समर्थ नहीं हैं। तो जब क्षमता और समर्थ किसी ऐसे इंसान के अंदर आ जाती है जिसमें न तो कोई भाव है और न जो किसी की परवाह करता है तो वह बेहद खतरनाक स्थिति हो जाती है।

भारतीय संस्कृति में शिक्षा की शुरुआत हमेशा कुछ शुरुआती रस्मों के बाद होती थी, क्योंकि शिक्षा को शक्ति की तरह से देखा जाता है। शिक्षा शुरू करने से पहले बच्चे एक खास प्रक्रिया से गुजरते थे, जिसे 'ब्रह्मोपदेश' कहते हैं। इस प्रक्रिया में जो बुनियादी मंत्र बच्चे को सिखाया जाता था, वह है 'अहम ब्रह्मास्मि' जिसका अर्थ है 'मैं ब्रह्म हूं'। दरअसल, जब आप कहते हैं कि 'मैं ब्रह्म हूं' तो इसका मतलब है कि आप कह रहे हैं कि मैं हर चीज के लिए जिम्मेदार हूं। तब आनुभविक तौर से बच्चे की जिंदगी में यह भाव पैदा किया जाता था, जिससे उसके मन में इस दुनिया की हर चीज के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा हों। शिक्षा की शुरुआत इसके बाद ही होती थी।

सशक्त होने से पहले आपके भीतर इस जगत की हर चीज के प्रति अच्छी भावनाएं होनी चाहिए, नहीं तो आप एक खतरनाक इंसान बन जायेंगे।
पुराने समय में ऐसा मानकर चला जाता था कि शिक्षा की शक्ति सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए, जो ब्रह्मोपदेश की प्रक्रिया को पूरा कर चुके हैं। यह अच्छी बात थी, लेकिन फिर बाद में ब्रह्मोपदेश भी जाति आधारित हो गया। इस चलन के बाद ही कुछ ऐसा होने लगा कि सिर्फ ब्राह्मण ही शिक्षा ग्रहण करने लगे। बाकी लोग अशिक्षित ही रह गए। अब ऐसी कोई बात नहीं रह गई थी कि शिक्षा उन लोगों को ही दी जाए, जो उसके लायक हैं। यह बात बीत चुकी थी। इसकी जगह अब नया चलन आ गया था जिसके मुताबिक अगर आपका जन्म किसी खास परिवार में हुआ है तो आप अपने आप शिक्षा के अधिकारी हैं। बाद की पीढ़ियों के लोगों ने इस तरह का चलन शुरू कर दिया। एक अच्छा तरीका जो अच्छे मकसद के साथ शुरू किया गया था, वही बाद में शोषण का जरिया बन गया।

सशक्त होने से पहले आपके भीतर इस जगत की हर चीज के प्रति अच्छी भावनाएं होनी चाहिए, नहीं तो आप एक खतरनाक इंसान बन जायेंगे। आज संसार में यही हो रहा है। हर कोई शिक्षित है, लेकिन यह शिक्षा सभी के लिए कल्याणकारी साबित नहीं हो पा रही है। इसके बजाय आज यह दुनिया को डरा रही है। दुनिया को अनपढ़ लोग नहीं, बल्कि पढ़े लिखे लोग ही डरा रहे हैं। बिना सोच विचार के हुआ सशक्तिकरण इस दुनिया के लिए बेहद खतरनाक है।

 
 
 
 
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