क्या मरने के तुरन्त बाद एक नया शरीर मिल जाता है? या फिर कुछ समय के बाद प्राणी नया शरीर धारण कर पाता है? कैसे तय होती है समय की अवधि?

सद्‌गुरु हमें बता रहे हैं कि जिन लोगों की दुर्घटना में मरने होती है, वे लम्बे समय तक बिना शरीर के रहते हैं, जिन्हें भूत-प्रेत कहा जाता है, आइये पढ़ते हैं आगे...

आदित्य: क्या रीति-रिवाज इसीलिए होते हैं, सद्‌गुरु? उन्हें शांत करने के लिए?

Subscribe

Get weekly updates on the latest blogs via newsletters right in your mailbox.
No Spam. Cancel Anytime.

सद्‌गुरु: हां, उसे शांत करने के लिए, क्योंकि वह तब भी जीवंत होता है। उसका प्राणिक-शरीर अभी भी इच्छाएं, लालसाएं लिए घूमता रहता है - इसलिए वह शांत नहीं हो पाएगा। वह उस रूप में एक लंबे समय तक बना रहता है। उसे अपना यह दौर पूरा करना होता है। जब वे किसी दुर्घटना में मरते हैं, तो शुरुआत में वे काफी जीवंत होते हैं। उस दौरान वे बहुत प्रभावी तरीके से महसूस किए जाते हैं। फि र जब प्राण अपनी जीवंतता खो देता है, तब वह बस मंडराता रहता है। इस दौर को छोटा करने के लिए भारतीय संस्कृति में कुछ कर्मकांड और प्रक्रियाएं हैं, ताकि उसे वहां पर मंडराना न पड़े। जो इंसान यह कर्मकांड कराता है, अगर वह उसके बारे में जानता है, तो उस प्राणी के भटकने की अवधि कम कर सकता है। वह उसके शांत होने की प्रक्रिया को तीव्र कर सकता है, ताकि उस प्राण को लंबे समय तक भटकना न पड़े।

पूर्ण जीवन के बाद की मरने

अगर इन प्राणिक और सूक्ष्म शरीरों को एक दूसरा भौतिक-शरीर धारण करना है, तो उनमें एक खास तरह की स्थिरता की जरूरत होती है। जब वे स्थिरता या जीवंतता के निम्न स्तर में होते हैं, केवल तभी प्राणी को दूसरा शरीर मिलता है; वरना उसे यह नहीं मिलता। अगर वह पूरी तरह से जीवंत है, तो वह दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर सकता। उसे पहले शांत होना होगा। जब कोई इंसान एक लंबा और पूर्ण जीवन जी लेता है और शांतिपूर्वक मरता है तो यह माना जाता है कि उसके प्राण ने अपना दौर पूरा कर लिया और सहजता से बंधन से अलग हो गया।

यह कुछ ऐसा ही है जैसे एक पके फल का पेड़ से टपकना। पका फ ल जैसे ही पेड़ से टपकता है, उसका बीज जल्दी ही मिट्टी से मिलकर अपनी जड़ें ढूंढ लेता है। उस बीज के लिए उसका गूदा ही जरूरी खाद बन जाता है। उसी तरह जब एक इंसान अपना जीवन-चक्र पूरा कर के अपने आखिरी क्षण तक पहुंचता है तो हम कहते हैं कि उसकी मरने शांतिपूर्वक हुई। बिना किसी बीमारी या बिना किसी दुर्घटना के जब किसी की स्वाभाविक मरने होती है तो प्राण की जीवंतता एक हद तक शांत हो चुकी होती है, और उसको शरीर से मुक्त होने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ता।

मरने के कुछ समय बाद मिलता है नया प्रारब्ध कर्म

आदित्य: सद्‌गुरु, जब एक इंसान बुढ़ापे की वजह से मरता है, तो हम कहते हैं कि प्राण ने अपनी जीवंतता खो दी। अब अगर हम यह मान लेते हैं कि वह एक दूसरा शरीर धारण करता है, तो क्या इसका मतलब है कि प्राण फिर से जीवंत होना शुरू होता है?

सद्‌गुरु: हां, यह फिर से जीवंतता प्राप्त करता है। शरीर में प्रवेश करने के लिए इसमें निष्क्रियता की एक खास अवस्था का होना जरूरी है। केवल तभी यह एक शरीर को हासिल कर सकता है। एक बार जब प्रारब्ध-कर्म खत्म या अपने आप क्षीण हो जाता है, तब बिना किसी कार्मिक-तत्व के, प्राण अपनी जीवंतता, अपनी गतिशीलता खो देता है। जब प्रारब्ध-कर्म पूरी तरह से खत्म हो जाता है, तब समय के एक छोटे दौर के बाद, प्रारब्ध-कर्म की एक नयी किस्त फि र से प्रकट होनी शुरू हो जाएगी। जैसे ही एक नया प्रारब्ध जाहिर होना शुरू होता है, प्राण अपनी जीवंतता फिर प्राप्त कर लेता है, और तब यह फिर एक शरीर धारण कर लेगा।