इस दुनिया में जिसने किसी भी तरह का आध्यात्मिक पागलपन दिखाया, उसे हमेशा सताया गया है। मंसूर अल-हलाज भी ऐसे ही सूफी संत थे। जानिए उनकी शख्सियत के कुछ पहलुओं कोः

सद्गुरु सभी तरह के समाज हमेशा ही भक्तों से सशंकित, भयभीत रहे हैं क्योंकि ऐसे लोग किसी तर्क के अनुसार नहीं चलते। भक्त अपने आप में बहुत सुन्दर होते हैं, लेकिन वे सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होते, क्योंकि अगर आप को भक्त होना है, तो आप में एक ख़ास स्तर का दीवानापन होना चाहिए। ये पागलपन भी बहुत सुंदर होता है, लेकिन होता तो पागलपन ही है।

अगर कुछ पागलपन न हो, तो फिर कुछ नया नहीं हो सकता। अगर कुछ नया होना है, तो तर्क को हटना होगा। क्या इसका मतलब यह है कि आप पागल हो जायेंगे ? सामान्य रूप से, हम जिसे पागलपन कहते हैं, वो मानसिक रोग होता है। मानसिक रोग इसलिये नहीं होता कि तार्किक सोच ख़त्म हो गई है। तर्क मौजूद तो होता है, लेकिन वो अनुचित हो जाता है। एक मानसिक रोगी यही सोचता है कि उसका तर्क एकदम सही है। उसे ऐसा लगता है, कि दूसरे लोग तर्क का इस्तेमाल नहीं कर रहे। वो किसी और की बात पर ध्यान देने की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता। जब आप ऐसा सोचने लगते हैं, "हर कोई गलत है, सिर्फ मैं ही सही हूँ", तो यह मानसिक रोग की पहली निशानी है। अगर आप अपने मन से बाहर होंगे तो आप पूरी तरह से समझदार हो जाएंगे, आप वैसे हो जायेंगे जैसे मंसूर थे -- जो ज़्यादातर लोगों की समझ से बाहर है।

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ऐसा नहीं है कि मानसिक रोग में तर्क नहीं होता, ये बस थोड़ा टेड़ा-मेड़ा तर्क होता है। आत्मज्ञान तर्क से परे होता है -- उसमें कोई तर्क नहीं होता। जब कुछ भी नहीं होता, तब सब कुछ आपमें से प्रवाहित होता है, सब कुछ आप की पहुँच में होता है।

आम तौर पर, अंग्रेजी में मानसिक रोग का वर्णन ऐसे होता है कि वो मन से बाहर चला गया है। लेकिन प्रश्न ये है कि अगर आप अपने मन से बाहर हैं, तो आप मानसिक रोगी कैसे हो सकते हैं ? मानसिक रोग हमेशा मन में होता है। आप मानसिक रोगी तभी हो सकते हैं जब आप मन में होते हैं। अगर आप अपने मन से बाहर होंगे तो आप पूरी तरह से समझदार हो जाएंगे, आप वैसे हो जायेंगे जैसे मंसूर थे -- जो ज़्यादातर लोगों की समझ से बाहर है।

जब आप के आसपास के लोग नहीं समझते कि आप क्या कर रहे हैं, तब समाज आप को सतायेगा, आप पर अत्याचार करेगा। अगर आप अपना मन, शरीर या भावनायें किसी तरह की पागलपन की अवस्था में रखेंगे, तो तुरंत ही आपका समाज से मेल होना बंद हो जाएगा। यही कारण है कि आपकी ऊर्जाओं का आपके विकास में सबसे आगे होना बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी ऊर्जा किसी भी सामाजिक व्यवहार में शामिल नहीं होती। तो आपकी ऊर्जा चाहे जिस भी तरह के पागलपन में हो, आप फिर भी अपने मन, भावनाओं और शरीर का समाज से मेल बनाए रख सकते हैं। अगर आप की ऊर्जा दीवानी हुई जा रही है लेकिन मन स्थिर है, तो आप अपने अंदर, पूर्ण रूप से, मदहोशी में और दीवानेपन की अवस्था में होंगे लेकिन बाहरी रूप से बिलकुल स्थिर, व्यवस्थित और अच्छे रहेंगे।

तो, अगर आप चाहते हैं कि आप सामान्य माने जाने वाली चीज़ों की सीमाओं से परे जाएं, और फिर भी समाज से मेल बनाए रखें, तो ये महत्वपूर्ण हो जाता है कि आप अपने शरीर, मन, भावना और ऊर्जा चारों को ठीक-ठाक, तैयार रखें, सिर्फ तभी आप पूरी तरह से और हद से ज़्यादा आनंदमय रहेंगे, और फिर भी आप जो काम कर रहे हैं, उसके लिये पूरी तरह काबिल और प्रभावशाली भी होंगे -- जो आज की दुनिया में सबसे ज़्यादा जरूरी है।

अगर आप की ऊर्जा दीवानी हुई जा रही है लेकिन मन स्थिर है, तो आप अपने अंदर, पूर्ण रूप से, मदहोशी में और दीवानेपन की अवस्था में होंगे लेकिन बाहरी रूप से बिलकुल स्थिर, व्यवस्थित और अच्छे रहेंगे। आज की दुनिया में आध्यात्मिक प्रक्रियाएं संचालित करने का ये सबसे अच्छा तरीका है।